तुम मुझे यूं भूला ना पाओगे हां तुम मुझे

तुम मुझे यूं भूला ना पाओगे हां तुम मुझे
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तुम मुझे भूल नहीं पाओगे और यदि भूलने की कोशिश की तो हम बार बार याद भी दिलाते रहेंगे। यह भारतीय राजनीति में उलटफेर करने वाला एक डायलॉग जेएनयू में छात्र नेता कन्हैया कुमार ने जेल से छूटने के बाद दिया था। यह आज भी प्रासंगिक बना हुआ है।

चुनाव भी बड़ी अजीब खेल है। हर पल इसका रंग क्रिकेट से भी ज्यादा रंग बदलता रहता है। जब लगता है कि सामने वाली टीम की जीत सुनिश्चित है तभी कोई नया विकेट गिर जाता है।

क्रिकेट की भाषा में नहीं समझे तो यूं समझिये कि जब लगता है कि विरोधी टीम के गोलपोस्ट पर गोल होने वाला है तभी उस पक्ष को गोलकीपर के शाट से इस तरह के खाली गोल पोस्ट पर गेंद चली आती है।

यानी कुल मिलाकर पल में तोला और पल में माशा जैसी हालत हो जाती है।

सिर्फ इतने से बात चलती तो शायद हमलोग हजम भी कर लेते। लेकिन दिक्कत इस बात की है कि कौन सा खिलाड़ी अंतिम समय तक किस टीम में शामिल रहेगा, यह तय करना भी दिनोंदिन कठिन होता चला जा रहा है।

अपने नवजोत सिद्धू को ही ले लीजिए। कभी भाजपा की तरफ से उन्हें सुनने के लिए भीड़ लग जाती था।

आज कांग्रेस की तरफ से भाजपा को ही कोस रहे हैं।

वैसे बेचारे इनदिनों अपने इमरान भाई की प्यार में बहुत जूते खा रहे हैं।

उन्हें छोड़िये अपने शतरु भइया को देखिये।

कभी भाजपा की जनसभाओं में भीड़ जुटाने के लिए जिसके नाम का प्रचार होता था, वह आज पानी पी पीकर भाजपा को नहीं तो उसके सबसे बड़े नेता को अवश्य कोस रहा है।

अब तो सुना है कि अपने कवि वर भी कमल फूल थामने को बेताब हो रहे हैं।

बेचारो गुपचुप तरीके से राजनाथ सिंह से मिलने गये थे।

दुश्मनों ने इसकी न सिर्फ खबर फैला दी बल्कि किसलिए गये थे, इसका खूब प्रचार भी कर दिया।

हो सकता है कि किसी और काम से ही गये हों लेकिन अभी तक तो यही समझा जा रहा है कि आम आदमी पार्टी का बड़ा खिलाड़ी अब भाजपा की जर्सी पहनकर मैदान में उतर सकता है।

इसी वजह से कुछ बातें ऐसी होती हैं जो भारतीय राजनीति में पिछले तीन दशक से लगातार होती आ रही हैं।

शायद इसी वजह से यह गीत याद आ रहा है।

यह गीत फिल्म “पगला कहीं का” का है।

इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी ने और संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने।

इसे मोहम्मद रफी साहब ने अपना स्वर दिया है।

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे

हाँ तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे
संग संग तुम भी गुनगुनाओगे
हाँ तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे
हो तुम मुझे यूं …
वो बहारें वो चांदनी रातें
हमने की थी जो प्यार की बातें
वो बहारें वो चांदनी रातें
हमने की थी जो प्यार की बातें
उन नज़ारों की याद आएगी
जब खयालों में मुझको लाओगे
हाँ तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे

तुम मुझे यूं …

मेरे हाथों में तेरा चेहरा था
जैसे कोई गुलाब होता है
मेरे हाथों में तेरा चेहरा था
जैसे कोई गुलाब होता है
और सहारा लिया था बाहों का
वो शाम किस तरह भुलाओगे
हाँ तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे

तुम मुझे यूं …

मुझको देखे बिना क़रार ना था
एक ऐसा भी दौर गुज़रा है
मुझको देखे बिना क़रार ना था
एक ऐसा भी दौर गुज़रा है
झूठ मानूँ तो पूछलो दिल से
मैं कहूंगा तो रूठ जाओगे
हाँ तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे
जब कभी भी …

अब झारखंड लौटें तो नजर आता है कि कहां रघुवर दास और सुदेश महतो में 36 का रिश्ता था।

अचानक क्या खेल हुआ कि समझौता होने की खबर आ गयी।

सुना है कि भाजपा ने दरियादिली दिखाते हुए गिरिडीह सीट आजसू के लिए छोड़ने का प्रस्ताव दिया है।

अगर वाकई ऐसा है तो अपने पुलिस वाले पांडेय बाबा का क्या होगा।

सुना था भाई साहब ने बकोरिया सहित अन्य झमेलों से मुक्ति पाने के लिए पहले से ही वीआरएस का एप्लिकेशन दे रखा है।

वह खुद भी तो भाजपा की टिकट पर दूसरे पांडेय का पत्ता काटकर चुनाव लड़ने की तैयारी में थे।

कहीं अइसा तो नहीं है कि बाबा अब आजसू के खेमे में शामिल होकर चुनाव मैदान में कूद पड़ेंगे।

लेकिन इतना तो जाहिर हो गया कि कौन किस पार्टी के खेल रहा है, इसे समझ पाना दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है।

जब कभी किसी को भूला देने की बारी आती है वह अचानक सर उठाकर खड़ा हो जाता है।

अब सिंहभूम में देखिये अपने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ही भूला देने में शामिल किये गये मधु कोड़ा के कांग्रेस में शामिल होने से परेशान हैं।

जाहिर है कि अगर मैडम मैदान में उतर गयीं तो अपने गिलुवा जी को लोहे के चने चबाने पड़ जाएंगे।

अब बताइये कौन किसको कैसे भूला सकता है।

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