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तुम्हे याद होगा कभी हम मिले थे मुहब्बत की राहों में मिलके चले थे

तुम्हे याद होगा कभी हम मिले थे हर कोई दोहराना चाहता है। आखिर

परेशानी और परिस्थिति दोनों ही कुछ ऐसी है कि लोगों को पुराने

दोस्त याद आ ही जाते हैं। यह अलग बात है कि जब तक पावर में थे

तो कौन सा, कैसा दोस्त, का चेहरा बनाते रहे। नतीजा था कि पुरानी

जान पहचान वालों ने इज्जत बचाने की खातिर किनारा कर लिया।

अब तो सड़कों पर टुकुर टुकुर ताकते फिरते हैं कि कोई जाना पहचाना

चेहरा दिख जाए और  सलाम भर ठोंक दे। अरे यार जैसा किये हो वैसा

ही तो भर रहे हो। फिर परेशानी किस बात की। पावर में थे तो खूब मूंछ

ऐठ रहे थे। अब लोग अगर तुम्हारी मूंछ उखाडऩे पर आमादा है तो

इसमें उससे अधिक तो तुम्हारी गलती है

दिल्ली का चुनाव चल रहा है वहां पर नजर टिकाये रहो। कहीं से कुछ

दाल गल गयी तो फायदे में रहोगे। देखे नहीं एक आइपीएस अफसर थे

अजय कुमार। पहले बाबूलाल जी का हाथ पकड़कर सांसद बने। फिर

पल्टी मार कर सीधे प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बन बैठे। लोग कहते हैं

कि सीधे राहुल गांधी से बात किया करते थे। वहां फिर गद्दी गयी तो

आनन फानन में खेमा बदलकर अरविंद केजरीवाल के साथ हो लिये।

अपने मनोज तिवारी को ही देख लो। फिल्मों में थे तो भोजपुरी के

सुपर हिट स्टार बने हुए थे। वहां से वास्तुबिहार के ब्रांड एंबेसेडर बने।

अब दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हैं लेकिन लोग उन्हें लगातार

रिंकिया के पापा कहकर ही पुकारना पसंद करते हैं। यह तो अच्छी बात

है कि दिल्ली की पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है। वरना भाई लोग तो

अपने तिवारी जी का भुरकुस निकालकर ही दम लेते।

तुम्हे याद होगा गीत जल्दी दोहराने की नौबत आयी

आजकल मौसम ही कुछ ऐसा है कि पुराने गीतों को दोहराने की नौबत

आ ही जाती है। अभी चंद दिनों पहले ही इस गीत की चर्चा की थी

लेकिन हालात कुछ ऐसे हो गये कि फिर से उसी गीत को याद करना

पड़ रहा है। यह फिल्म सट्टा बाजार का गीत है। इसे लिखा था गुलशन

बाबरा ने और संगीत में ढाला था कल्याणजी आनंदजी ने। इस गीत को

स्वर दिया था हेमंत कुमार और लता मंगेशकर ने। गीत के बोल इस

तरह हैं।

तुम्हे याद होगा कभी हम मिले थे 
तुम्हे याद होगा कभी हम मिले थे

मुहब्बत की राहों में मिल के चले थे
भूला दो मुहब्बत में हम तुम मिले थे
सपना ही समझो के मिल के चले थे

डूबा हूँ ग़म की गहराइयों मे
सहरा हैं यादों का तनहाइयों में
सहरा हैं यादों का तनहाइयों में

कहीं और दिल की दुनिया बसा लो
क़सम है तुम्हें वो क़सम तोड़ डालो
क़सम है तुम्हें वो क़सम तोड़ डालो

नई दिल की दुनिया बसा न सकूँगा
जो भूले हो तुम वो भुला न सकूँगा
जो भूले हो तुम वो भुला न सकूँगा

अगर ज़िंदगी हो अपनी ही बस में
तुम्हारी क़सम हम न भूलें वो क़समें
तुम्हारी क़सम हम न भूलें वो क़समें

तुम्हे याद होगा.. .. .. ..

सीएए और एनआरसी के लेकर दो तरह के पकवान बन रहे हैं। शाहीन

बाग में बिरयानी पक रही है तो अपने अमित शाह जी इसका पुलाव

बना रहे हैं। इसके बीच प्याज से लेकर आज तक का असली सवाल

पता नहीं कहां गुम हो गया है। मुद्दों को बार बार घूमाकर गुमा देने की

यह चाल भले ही अपनी धार खो रही है लेकिन लोगों को बातों की

जुगाली करने का मौका जरूर दे जाती है। मेरे एक परिचित है अनवर।

एक पान की दुकान पर जब भी वह खड़े नजर आते हैं, मुझे देखते ही

सीएए और एनआरसी पर ही सवाल दागते हैं। मैं उनसे प्याज का भाव

पूछता हूं तो कह देते हैं कि अब घट रहा है।

दिल्ली के दंगल के बाद बंगाल का बवंडर होगा

अब दिल्ली निपटेगा तो पश्चिम बंगाल में दीदी से भी निपटना होगा।

लोकसभा चुनाव के समय तो लगता था कि ममता दीदी निपट रही है।

लेकिन उसके बाद से पता नहीं क्या खेल हो रहा है कि हर रोज नेताओं

और कार्यकर्ताओं की वहां तृणमूल में घर वापसी हो रही है। वरना क्या

शारदा और क्या नारदा, जो जहां फंसा है, उसके रिकार्ड को पुलिस के

पास पहले से ही मौजूद हैं। सीबीआई जिन बातों को नहीं तलाश पा रही

है, उन तथ्यों का खुलासा होना पता नहीं भाजपा को परेशान करेगा या

राहत देगा।

लगे हाथ झारखंड की भी थोड़ी चर्चा कर लें तो तुम्हे याद दिलाना

चाहूंगा कि पिछली बार कांग्रेस के लोभ की वजह से ही सरकार अस्थिर

हुई थी। इस बार भी कांग्रेस का चेहरा कुछ वैसा ही नजर आ रहा है।

लेकिन हेमंत सोरेन को छोटी मछली समझना कांग्रेस की भूल होगी।

साथ ही यह तय है कि दोबारा यहां वही गलती दोहराने पर अन्य राज्यों

में फिर से उस पर कोई भरोसा नहीं करेगा।

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