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तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे.. .. ..

तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे, यह गीत इंडियन पॉलिटिक्स में बहुत आम इस्तेमाल

के लायक है। कौन कब किस तरफ होगा, इसका अंदाजा पहले से लगा पाना मुश्किल है।

जो आज है वह कल इधर होगा या नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। मसलन पश्चिम

बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और पंजाब की प्रमुख विरोधी दल अकाली दल को ले

लीजिए। वर्षों तक भाजपा के साथ रहे। सरकार में भी शामिल रहे, जब अपने हित की बात

आयी तो सारी दोस्ती गयी भाड़ में, अपना अपना रास्ता अलग कर लिया। रास्ता अलग

क्या किया बंगाल में तो सीधी भिड़त हो गयी, जो शायद अब भी गाहे बगाहे नजर आ जाती

है। किसान आंदोलन के मुद्दे पर भाजपा के अंदर भी एक अलग ही धारा बह रही है भले वह

अभी सबकी नजरों के सामने नहीं आया हो। लेकिन इतना साफ हो गया है कि दिल्ली

दरबार और योगी के बीच भी अब सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। दोनों अपने अपने मौके की

तलाश में हैं। लेकिन अब आते हैं बिहार की राजनीति पर। राजग में कौन गुट है और कौन

गुट नहीं हैं, इसे अभी तय कर पाना कठिन हो गया है। राजग में शामिल दल लोक

जनशक्ति पार्टी चिराग पासवान के नेतृत्व में राजग की दूसरी सहयोगी जदयू के मुखिया

नीतीश कुमार के खिलाफ आग उगलते थे। सुशासन बाबू बोलते कम हैं और करते ज्यादा

है। इसलिए मौका पाते ही ऐसी चाल चली कि लोजपा ही दो फाड़ हो गयी है। अब कौन याद

दिलाता है कि तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे। अब तो लोजपा का एक गुट नीतीश

कुमार की तरफ जाता हुआ दिख रहा है। दूसरी तरफ नीतीश के खिलाफ बयान देने वाले

चिराग का इस्तेमाल खत्म होने के बाद भाजपा चुपचाप किनारे खड़ी तमाशा देख रही है।

चिराग के झमेले में अब भाजपा सिर्फ तमाशबीन

मानों उसके इसकी कोई जानकारी ही नहीं हो। वरना चुनाव के वक्त भी बार बार नीतीश

कुमार के खिलाफ बयान देने वाले चिराग को भाजपा ने एक शब्द भी नहीं कहा था। उसका

चुनावी नतीजा क्या हुआ, सभी के सामने है। आपस की लड़ाई में दोनों ही बिखर गये और

भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर सामने आ गयी। लेकिन तुम्हे याद होगा कभी हम मिले

थे तो अब पूर्व सीएम जीतन राम मांझी भी गुनगुनाते हुए नजर आते हैं। उनका लालू प्रेम

रह रहकर उबाल मार रहा है। जमानत पर बाहर आते ही लालू प्रसाद एक्टिव हो गये हैं,

जैसा की उम्मीद थी। उनका लगातार अन्य लोगों से संपर्क में होना बिहार में राजनीतिक

गर्मी पैदा करता चला जा रहा है। उसका नतीजा क्या होगा, अभी कहना मुश्किल है लेकिन

लालू और नीतीश कुमार की चालों को समझ लेना भी कोई आसान काम नहीं है। मांझी

और मुकेश सहनी के तेवर देखकर मजबूरी में नीतीश कुमार अब कांग्रेस के विधायकों को

यह गीत सुनाने लगे हैं कि तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे। इसी बात पर एक पुरानी

फिल्म का गीत याद आने लगा है। फिल्म सट्टा बाजार के लिए इस गीत को लिखा था

गुलशन बाबरा ने और संगीत में ढाला था कल्याणजी आनंदजी की जोड़ी ने। इस युगल

गीत को लता मंगेशकर और हेमंत कुमार की जोड़ी ने गया था। गीत के बोल इस तरह हैं

तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे

तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे
मुहब्बत की राहों में मिल के चले थे

भूला दो मुहब्बत में हम तुम मिले थे
सपना ही समझो के मिल के चले थे …

डूबा हूँ ग़म की गहराइयों में
सहरा हैं यादों का तनहाइयों में
सहरा हैं यादों का तनहाइयों में

कहीं और दिल की दुनिया बसा लो
क़सम है तुम्हें वो क़सम तोड़ डालो
क़सम है तुम्हें वो क़सम तोड़ डालो …

नई दिल की दुनिया बसा न सकूँगा
जो भूले हो तुम वो भुला न सकूँगा
जो भूले हो तुम वो भुला न सकूँगा …

अगर ज़िंदगी हो अपनी ही बस में
तुम्हारी क़सम हम न भूलें वो क़समें
तुम्हारी क़सम हम न भूलें वो क़समें …

किसे याद रहता है, यह देखने वाली बात होगी। क्योंकि कोरोना लॉकडाउन से लगातार

मिल रही रियायतों के बीच हम सभी का आचरण कुछ ऐसा है मानों हमने पहले के

अनुभवों से कोई सबक ही नहीं लिया है। फिर से वही गलती पर गलती दोहराये जा रहे हैं।

दूसरी तरफ एक्सपर्ट बार बार कह रहे हैं कि अगर तीसरा लहर कोरोना की इस देश में

आयी तो बहुत बड़ी आफत आयेगी। सारी सरकारें अपने अपने तरीके से अपने ईलाज की

व्यवस्था को मजबूत करने में जुटी हैं। लेकिन हम पब्लिक हैं कि हमने पहले के सबक से

कुछ नहीं सीख लेने की ठान रखी है।

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