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मैंरे पैरों में घूंघरू बंधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले







मैंरे पैरों में घूंघरू बंधा दे तो फिर मेरी चाल देख ले गाने की चर्चा झारखंड के चुनावी मौसम में दोबारा होने लगी है।

आदर्श आचार संहिता लगा है इसलिए वर्तमान का उल्लेख किये बिना ही यह कहा जा सकता है कि राज्य के प्रथम

मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की सरकार के गिरने के दौरान तत्कालीन हैवीवेट नेता इंदर सिंह नामधारी ने पहली बार

इस गीत का राजनीतिक इस्तेमाल किया था।

दरअसल जदयू और अन्य विधायकों की नाराजगी के बीच श्री नामधारी ने यह बात सिर्फ इस मकसद से कही थी

कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो वह कुशलता के साथ इस जिम्मेदारी का पालन कर सकते हैं।

लेकिन राजनीतिक दिशा कुछ और ही थी। जिसकी वजह से भाजपा नेतृत्व ने अर्जुन मुंडा को श्री मरांडी के

स्थान पर मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया। इसके बाद से गाहे बगाहे इस गीत की चर्चा होती ही रहती है।

अब झारखंड में चुनाव कुछ ऐसा चल रहा है कि भाजपा के एक गुट को छोड़कर बाकी सब यही गीत मन ही मन

गा रहे हैं। सिर्फ एक बड़े नेता ने दोबारा से इस गीत को सार्वजनिक तौर पर गाने का साहस दिखलाया है।

फिलहाल नाम का उल्लेख शायद गलती होगी क्योंकि यह भी आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन हो सकता है।

इसलिए इस पर सोशल मीडिया के माध्यम से अपना अपना शोध खुद जारी रखें और किसी अच्छे निष्कर्ष

पर पहुंचे।

जिस गीत की चर्चा हो रही है, वह फिल्म संघर्ष का गीत है। इस गीत को लिखा था शकील बदांयुनी ने और

संगीत में ढाला था नौशाद ने। इसगीत को मोहम्मद रफी ने मस्त अंदाज में राजकुमारी के साथ गाया था।

मैंरे पैरों में गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

दिल पाया अलबेला मैं ने, तबीयत मेरी रंगीली
हाय
आज खुशी में मैं ने भइया, थोड़ी सी भंग पी ली
मेरे पैरों में, हाय, मेरे पैरों में घुँघरू बंधा दे
तो फिर मेरी चाल देख ले

ज़रा जम के भइय्या
मोहे लाली चुनर, मोहे लाली चुनरिया ओढ़ा दे
तो फिर मेरी चाल देख ले
मैंरे पैरों में. . .
क्या चाल है तोरी? जरा झूम ले गोरी
अ-हा, वाह

हाले डोले किसी की नथनी झूमे किसी का झूमका
हर पारी दिल थाम ले अपना ऐसा लगाऊँ ठुमका
कैसे भला?

ऐसे डिंग के टिकट फुरर् के टिकट आ
जब हो किसी की ब्याह सगाई मेरी जवानी ले अंगड़ाई
कोई मेरी भी शादी करा दे तो फिर मेरी चाल देख ले
मैंरे पैरों में. . .

कोई घूँघट वाली मेरे दिल पे चलाये छुरियाँ
कोई नैनों वाली छोड़े नैनों से फुलझड़ियाँ
रूप है लाखों और इक दिल है आपे में रहना भी मुश्किल है
कोई अखियों से दारू पिला दे तो फिर मेरी चाल देख ले

जरा नैन मिला के जरा दिल लगा के!
एक नजर से दिल भरमाये दूजी से ले जाये
तीखी नजर तू ऐसी मारे जो देखे लुट जाये
सारी दुनिया तुझपे दीवानी मैं भी तो देखूँ तेरी जवानी
ज़रा मुखड़े से घुँघटा हटा दे
तो फिर मेरी चाल देख ले

मोहे लाली चुनर, मोहे लाली चुनरिया ओढ़ा दे
तो फिर मेरी चाल देख ले

अब कौन अपनी चाल दिखाने को बेताब हुआ जा रहा है, इस पर अगर गहराई से रिसर्च किया जाए तो एक नहीं

कई चेहरे नजर आते हैं।

झारखंड के बारे में मोटा भाई ने तो पहले ही एलान कर रखा है

अपने रघु भइया के बारे में तो मोटा भाई पहले से ही बता गये हैं कि भाजपा को बहुमत मिली तो वही अगले
सीएम रहेंगे। लेकिन पार्टी के अंदर जो चर्चा चल रही है, उसके मुताबिक पार्टी को बहुमत मिलने के बाद भी
अगर जमशेदपुर से रघु भइया चुनाव हार गये तो आगे क्या होगा।

सरयू का पानी इतना गहरा नजर आने लगा है कि भाजपा के अच्छे खां भी इसमें तैरने से कतरा रहे हैं।
रघुवर को सरयू पार लगाने खुद नरेंद्र मोदी जी को आना पड़ रहा है।

दूसरी तरफ अपने हेमंत भइया एक सीट की जीत पक्की होने के बाद भी बेचारी लूइस मरांडी को परेशान करने
दुमका पहुंच गये हैं। पता नहीं इस बार मैडम की गाड़ी पार लगेगी या नहीं।

लोहरदगा में कांग्रेस और भाजपा के बीच दो कांग्रेस के अध्यक्षों के टकराव में असली प्रतिष्ठा तो अपने धीरज
भइया की सांसत में अटकी हुई है। खुद भाजपा वाले भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं।
इसलिए यहां आज क्या कुछ गुल खिला है, वह तो मतों की गिनती में भी पता चल पायेगा।

यह अच्छी बात है कि चुनाव की शुरुआत हो चुकी है तो जैसे जैसे गाड़ी आगे बढ़ती ही जाएगी। इन नेताओं को
भी तो पांच साल में एक बार मेहनत करने का मौका मिलता है। इसलिए सबको टाइट रखिये।

ताकि उन्हें भी पता चले कि आंटा- चावल का भाव आखिर इंडियन पॉलिटिक्स में क्या होता है।



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