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योग विद्या विशेषज्ञ ने कहा विश्व मे आध्यात्मिक पक्ष का विकास नहीं के बराबर

  • डॉ. परिणीता सिंह

योग विद्या है, जिसके द्वारा शारीरिक एवं मानसिक

समस्याओं का निराकरण  नहीं बल्कि जीवन को नैतिक

और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी सार्थक बनाता है। योग

शब्द की उत्पत्ति “युज” धातु से हुई है, जिसका अर्थ है “एक

होना”। यहां एकीकरण का तात्पर्य मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं

आध्यात्मिक पक्षो का सम्मिलित होने से है। आज विश्व वैज्ञानिक एवं भौतिक दृष्टि से

परिपूर्ण है, परंतु आध्यात्मिक पक्ष का विकास नहीं के बराबर है, जिस कारण कई सुविधाएं

होने के बावजूद भी शारीरिक एवं मानसिक रोग उत्पन्न हो रहे हैं। मानसिक विकार एवं

विकृति के कारण मनो दैहिक रोग का जैसे जाल सा फैल रहा है। जितने भी सामाजिक,

राजनीतिक संस्थाएं हैं, वैसे सभी योग विद्या के चिकित्सात्मक पक्ष पर ही बल दे रहे हैं,

जिससे बीमारियां तो खत्म हो रही है, परंतु सर्वांगीण व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पा रहा

है। इन दिनों योग विद्या के व्यवहारिक पक्ष से भी सिर्फ कुछ क्रियाओं जैसे आसन

प्राणायम पर ही बल दिया जा रहा है। जिस कारण योग अपनी यौगिक शास्त्रीय अवधारणा

में से अलग होता जा रहा है। जबकि संपूर्ण व्यक्तित्व के लिए कई यौगिक क्रियाओं का

समावेश आवश्यक है। यौगिक शास्त्रों में योग के व्यवहारिक एवं सैद्धांतिक पक्षों को

भलीभांति समझाया गया है।

योग विद्या की रचना प्राचीन ऋषि मुनियों की सृष्टि है

ऋषि-मुनियों ने मानवता की असीम दुख पीड़ा के उन्मूलन एवं आनंद तथा शांति की

प्राप्ति के अनेकों उपाय बताएं है। जिसके द्वारा शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं का

निवारण की नहीं बल्कि जीवन को नैतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी सार्थक

बनाया जा सकता है। संपूर्ण व्यक्तित्व की प्राप्ति के लिए मानस विज्ञान को जानना

समझना अति आवश्यक है, जिसमें मन के स्वरूप, मन की कार्यप्रणाली एवं मन का

विस्तार संबंधी विषय अत्यंत गहन रूप से ग्रंथों में उपलब्ध है। जिसके द्वारा शारीरिक,

मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिकता का विकास किया जा सकता है।  यह योग

विद्या आध्यात्मिकता का जागरण अज्ञानता को समूल समाप्त करती है, जिससे मनुष्य

वास्तविक स्वरूप का आनंद अनुभव करता है और सदा उन्मुक्त एवम् स्वतंत्र रहता है।

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