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हां तुम मुझे यूं भूला ना पाओगे जब कभी सुनोगे गीत मेरे .. .. ..

हां तुम मुझे यूं भूला ना पाओगे। सीधे प्वाइंट पर आते हैं। मेरा इशारा किसान आंदोलन की

तरफ है। इतने दिन बीत गये और सरकार की तरफ से नरमी का रुख नहीं दिखना कई

सवाल खड़े करता है। अरे भाई जिसके फायदे के लिए कर रहे हो तो उसे यह बात समझ में

क्यों नहीं आ रही है। अगर समझने को तैयार नहीं है तो छोड़ दो बिल को। आंदोलन खत्म

करो और वार्ता के लिए बुला दो। आप फायदा समझाना और वह अपनी दिक्कतें बतायेगा।

कोई न कोई रास्ता बीच का निकलेगा। कमसे कम इतने दिनों से ठंढ के मौसम में सड़कों

पर बैठे किसान घर तो लौट पायेंगे। यह जिद किस काम का जो देश के अन्नदाताओँ को

परेशान करे। अगर दूसरे किसानों को लगेगा कि यह तीनों कृषि बिल उनके फायदे के लिए

है और पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान गलत कर रहे हैं, तो वे सामने आयेंगे।

अब तो कृषि बिल के समर्थन मं जो किसान नेता नजर आये हैं, वे किसान कम और

भाजपा के पदाधिकारी ज्यादा हैं। इसलिए इस मुद्दे पर अब जिद सही नहीं है।

पता नहीं भाजपा वाले अपने बड़े नेताओं को यह बात क्यों नहीं बता पा रहे हैं कि आंदोलन

वाले इलाकों में उनका चलना फिरना अब कठिन हो गया है। गांव वाले जब तक खदेड़ रहे

हैं। कुछ लोगों पर तो रोड़ेबाजी तक हो गयी। आखिर कोई तो पॉजिटिव काम हो। लेकिन

यह साबित हो गया कि समझदारी से अगर किसान मोर्चे पर डट जाए तो सरकार के लिए

आज भी बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है। इतने दिनों तक का शांतिपूर्ण

आंदोलन पूरे देश को एक राजनीतिक सबक भी दे रहा है।

हां तुम मुझे का उल्लेख कई कारणों से सही भी है

सही इसलिए भी नहीं है क्योंकि इस बात का मूल्यांकन नहीं हो पाया है कि जिन राज्यों के

किसान दिल्ली की सीमा पर नहीं आये हैं, उनके दिलों मे क्या कुछ चल रहा है। वरना

व्यवहार में जो फायदे आप गिना रहे हो क्या वे वास्तव में लागू किये जा सकते हैं। मसलन

बिहार में गेहू उगाने वाला किसान क्या पंजाब में अधिक कीमत पर गेहूं बेच सकता है।

इसलिए अब लगे हाथ यह भी बताते चलो कि आखिर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ देश के

चंद पूंजिपतियों के रिटेल कारोबार के करार का मसला क्या है। किसान को चुनावी नारा

बनाने भर से परेशानी दूर होने वाली नहीं है। ग्रामीण भारत आज भी अपने मताधिकार में

किसान और उससे जुड़े मुद्दों पर ध्यान देता है। भाजपा को पिछले लोकसभा चुनाव में

मिली प्रचंड बहुमत का एक कारण किसानों के खाते में सीधे पैसा आना भी रहा है, इसे

भूलाना नहीं चाहिए। इसी बात पर एक पुरानी फिल्म का गीत याद आने लगा है। पगला

कहीं का नाम के इस फिल्म के इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी ने और संगीत में

ढाला था शंकर जयकिशन की जोड़ी ने। इसे मोहम्मद रफी ने पूरे मन से गाया भी था।

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

हां तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे, हां तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनाओगे

हां तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे, हो तुम मुझे यूँ …
वो बहारें वो चांदनी रातें, हमने की थी जो प्यार की बातें

वो बहारें वो चांदनी रातें, हमने की थी जो प्यार की बातें
उन नज़ारों की याद आएगी, जब खयालों में मुझको लाओगे

हां तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे, हो तुम मुझे यूँ …
मेरे हाथों में तेरा चेहरा था, जैसे कोई गुलाब होता है
मेरे हाथों में तेरा चेहरा था, जैसे कोई गुलाब होता है

और सहारा लिया था बाहों का, वो शाम किस तरह भुलाओगे
हां तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे, हो तुम मुझे यूँ …

मुझको देखे बिना क़रार ना था, एक ऐसा भी दौर गुज़रा है
मुझको देखे बिना क़रार ना था, एक ऐसा भी दौर गुज़रा है

झूठ मानूँ तो पूछलो दिल से, मैं कहूंगा तो रूठ जाओगे
हां तुम मुझे यूं भुला ना पाओगे,

जब कभी भी सुनोगे गीत मेरे, संग संग तुम भी गुनगुनाओगे
हां तुम मुझे यूं .. .. ..

अब थोड़ी अमेरिका की सैर कर लें। मुझे याद है पहले भारत में कानपुर में एक धरती पकड़

जी हुआ करते थे। हर चुनाव में खड़े हो जाते थे। अब डोनाल्ड ट्रंप की हालत देखकर मुझे

उसी धरती पकड़ की याद आ रही है। डोनाल्ड ट्रंप भी कुर्सी पकड़ हो गये हैं। पता नहीं क्यों

कुर्सी से चिपके रहने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। अब तो लगता है कि वहां के लोग

आखिर में उनको धकिया कर निकाल देंगे। तो भइया कोई तुमको भूला देने की कोशिश

शुरु कर दे उससे पहले बेहतर है कि सुधर जाइये

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