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यस बैंक की घटना को यूं ही नजरअंदाज नहीं कर सकते

यस बैंक की निकासी पर अचानक से रोक लगी तो शेयर बाजार उलटने लगा। आनन

फानन में केंद्रीय वित्त मंत्री सहित अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों के उच्चाधिकारियों के बयान भी

आ गये कि ग्राहकों को परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। उनका पैसा पूरी तरह सुरक्षित

है। सिर्फ इस त्वरित बयान की वजह से संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है। सामान्य सी

बात है कि एक निजी बैंक के अचानक डूब जाने जैसी स्थिति की असली वजह क्या रही।

और जल्दबाजी में बयान देने की यह कार्रवाई क्यों। इतनी जल्दबाजी तो अन्य कई ऐसे

मामलों में नहीं नजर आयी थी, जिसमें लोगों की उम्मीद थी कि उन मुद्दों पर सरकार की

तरफ से कोई बयान आयेगा। यस बैंक की वित्तीय हालत अगर बिगड़ी है तो यह तथ्य भी

सामने आना चाहिए कि इन बैंकों के काम काज पर नजर रखने वाली संस्था यानी रिजर्व

बैंक ऑफ इंडिया इतने दिनों तक क्या कर रही थी। यह प्रमाणित सत्य है कि जिन बैंकों के

शेयर होते हैं, उन्हें नियमित तौर पर अपनी वित्तीय स्थिति की जानकारी भी देनी होती

है। इसलिए पूर्व में बैंक की वित्तीय स्थिति के बारे में भारतीय रिजर्व बैंक का बयान अगर

गलत था तो ऐसा क्यों था। सारी सरकारें बार बार यह दलील देती हैं कि यह जनता का

पैसा है। तो जनता को सच जानने का पूरा अधिकार भी है। जब कभी जनता सच जानने

का सवाल करती है तो अधिकांश सरकारों को ऐसे सवाल नागवार लगते हैं। यस बैंक के

बारे में बिना अधिक पेचिदगी के ऐसा माना जा सकता है कि इस बैंक ने ऐसे लोगों को कर्ज

दिये हैं, जिनकी अदायगी समय पर नहीं हो पा रही है।

आरबीआइ को पहले से होगी इसकी पूरी जानकारी

साथ ही इस कर्ज के एवज में मिलने वाला ब्याज भी समय पर नहीं मिलने से बैंक की

वित्तीय स्थिति कमजोर होती चली गयी। जाहिर है कि यह स्थिति एक दिन में तो पैदा

नहीं हुई होगी। इसलिए सरकार को अब ग्राहकों को आश्वासन देने के साथ साथ यह भी

बताना चाहिए कि आखिर किन कंपनियों और लोगों को यस बैंक ने दिल खोलकर कर्ज

दिया था। यस बैंक बनने की कहानी भी दिलचस्प है। साल 2004 में राणा कपूर ने अपने

रिश्तेदार अशोक कपूर के साथ मिलकर इस बैंक की शुरुआत की थी।लेकिन 26/11 के

आतंकवादी हमले में अशोक कपूर की मौत हो गई। उसके बाद अशोक कपूर की पत्नी मधु

कपूर और राणा कपूर के बीच बैंक के मालिकाना हक़ को लेकर लड़ाई शुरू हो गई। मधु

अपनी बेटी शगुन गोगिया को बैंक के बोर्ड में बतौर डायरेक्टर शामिल कराना चाहती थीं,

जबकि बोर्ड के मेंबर इसके लिए राजी नहीं थे। फिर ये जंग अदालत में पहुँची और कई साल

तक चलती रही। अदालत में जीत मिली राणा कपूर को और 30 अगस्त 2018 को रिज़र्व

बैंक ने राणा कपूर को अगले आदेश तक एमडी और सीईओ के रूप में बने रहने की मंज़ूरी

दे दी। अगस्त 2019 में जहाँ यस बैंक के एक शेयर की क़ीमत 404 रुपये थी, वहीं शुक्रवार

को ये 5.65 रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुँच गया। यानी सात महीनों में कुल

मिलाकर शेयर के दाम 85 प्रतिशत गिर गए और यस बैंक की मार्केट वैल्यू 7943 करोड़

रुपये घट गई। 2018-19 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में बैंक को 1500 करोड़ रुपये से

अधिक का घाटा हुआ। जब से बैंक अस्तित्व में आया था, ये उसका सबसे बड़ा घाटा था।

आरोप ये भी लगा कि बैंक ने जान बूझकर अपने खातों में घाटे के इस आंकड़े को छिपाया

था।

यस बैंक की अपनी हिस्सेदारी घटाना भी संकेत था

राणा कपूर और उनके रिश्तेदार लगाकार बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाते रहे। अक्टूबर

2019 में राणा कपूर और उनके ग्रुप की हिस्सेदारी घटकर पौने पाँच फ़ीसदी के क़रीब आ

गई। इन घटनाक्रमों से इस बात को समझा जा सकता है कि राणा कपूर और उनके लोग

यह अच्छी तरह समझ रहे थे कि शेयर बाजार में इस बैंक के शेयरों में फंसा पैसा निकाल

लेने में ही भलाई है। रिजर्व बैंक को भी इसकी भनक होगी लेकिन वह चुप्पी साधे क्यों रहा,

इस बड़े सवाल का जवाब मिलना चाहिए। अंदरखाने से जो सूचनाएं आ रही हैं उसके

मुताबिक यस बैंक का कर्ज नहीं चुकाने वाला बड़ा ग्राहक इंडिया बूल्स भी है। 2017 में बैंक

की 6,355 करोड़ रुपये की रकम को बैड लोन में डाल दिया था। इसलिए यस बैंक के मामले

में अब सरकार और खास तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक को यह बताना होगा कि आखिर वे

कौन से नीतिगत भूल थे, जिनकी वजह से एक बार फिर जनता का पैसा गलत निवेश में

डूब गया है। बार बार बड़े घरानों को दिये कर्ज को एनपीए खाते में डालने का यह

गोरखधंधा अब बंद होना चाहिए


 

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