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भारत के इतिहास का सबसे गंदा चुनाव देख रहे हैं हम




  • ज्वलंत विषय

  • न कोई मर्यादा न संस्कृति न संस्कार: बेशर्मी की सारी हदें पार

  • चुनाव महाभारत की रणनीति: चक्रव्यूह में फंसी दीदी

पंडित मुस्तफा आरिफ

भारत के इतिहास का सबसे घटिया चुनाव देश की जनता न सिर्फ देख रही है बल्कि उसे

महसूस भी कर पा रही है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में हो रहा है। यूँ

कहा जाएं की वोट मांगने की जगह वोट लूटने या कबाड़ने का प्रपंच चल रहा है तो कोई

ग़लत नहीं हैं। एक भी नेता ऐसा नहीं हैं, जिन्हें हम मर्यादित या सभ्य कह सकें। झूठ

बोलने की सारी सीमाएँ हमारे आदर्श और विश्वसनीय नेता खुले आम पार कर रहैं है।

विडंबना ये है कि इस उच्छृंखलता का स्त्रोत वो राजनैतिक दल हैं जो खुद को संस्कृति

संस्कार, सभ्यता और राष्ट्रीयता का संरक्षक कहता है। बिलकुल होली रंगपंचमी का

माहोल है ये चुनाव। एक बार हुड़ढंग लीला में घसीट लिया तो फिर उसका रंगा जाना तय

है। कुएं में भांग घुली हुई है। भारत के इतिहास में देश में 70 वर्ष पूर्व का अशिक्षित मतदाता

नहीं हैं, 2021 का मतदाता हैं। जो मतदान का अधिकार और अर्थ भलीभाँति जानता है,

राजनैतिक आस्था से अलग हटकर चर्चा करनें पर वो भ्रमित और अंधकार में हैं। उसे वोटों

की लूट खसोट में भारत का भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा है। सारे देश की नजर

पश्चिम बंगाल पर टिकी हुई हैं। जहां ममता बनर्जी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहीं हैं,

भाजपा ने उनके सारे सिपहसालार छीन कर चक्रव्यूह में घेर लिया है। हिंदू मुस्लिम दोनों

कार्डों पर भाजपा के नियंत्रण से, विचलित दीदी चक्रव्यूह को भेद कर कैसे बाहर निकलती

हैं, ये देखना है। 

2021 के शुरूआती महीनों के चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में सभी राजनैतिक दलों ने

सभी मर्यादाओं को तिलांजली दे दी है। देश की जनता ने ऐसा घटिया चुनाव प्रचार जिसमें

राजनैतिक एजेंडा सिर्फ जन भावना भड़काना हैं, पहली बार देख रहीं हैं।

भारत के इतिहास में पहली बार ऐसी बेशर्मी भी दिखी

उसे नेताओं की बेशर्मी के दर्शन खुले आम हो रहैं हैं। जबकि इससे पहले बिहार सहित जिन

राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए हैं, वहां भी आपसी सद्भावना और समंवय के ताने बाने को

छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई ज्यादा लाभ नहीं हुआ। सरकारें

सभी बैसाखी वाली बनीं। अब भी भाजपा सहित सभी राजनैतिक दल बहुमत का दावा

ज़रूर कर रहैं है, परंतु किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल जाए ऐसा दिखाई नहीं दे रहा

है। सारी दुनिया की नज़रे पश्चिम बंगाल पर टिकी हुई हैं। दीदी ममता बनर्जी को उखाड़

फेंकने के सभी यतन चल रहैं है। उनके सभी हनुमान अंगद भाजपा में जाकर राम नाम पर

वोट मांग रहे हैं। 10 साल पहले वाम दलों के एकाधिकार को चुनौती दे कर सत्ता में आने

वाली वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हौसले बुलंद हैं। अगर वो सफल होती है तो एक

वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक शक्तिशाली राजनैतिक दल को पराजित करने का श्रेय उनके

खाते में जाएगा। परंतु जिस तरह से उन्हें घेरा गया है, इसकी सम्भावना कम हैं।

चारों राज्यों में चुनाव प्रचार नीतिगत, विकास और जन कल्याण के इतर पूर्णरूपेण

व्यक्तिगत आरोप के आधार पर चल रहा है, राष्ट्र के जिम्मेदार नेता छिछालेदारी की सारी

सीमाएँ लांध रहैं हैं। भारत के इतिहास में पहली बार दिख रहा है कि दलों के लिए चुनाव में

अलग-अलग राज्यों के लिए नैतिकता और उपदेशों के मापदंड अलग- अलग है।

तमिलनाडु में डीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ए.राजा ने मुख्यमंत्री

पलानीस्वामी को ‘प्रि-म्योचोर बर्थ’ यानि ‘अपरिपक्व पैदाइश’ कह दिया। अपनी

जनसभाओं में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि तमिलनाडु के लोग महिलाओं का

अपमान कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। लेकिन पश्चिम बंगाल में उनकी ही पार्टी दीदी ममता

बनर्जी को अपमानित करने की कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

ममता बनर्जी को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा

पश्चिम बंगाल हो, तमिलनाडु हो, असम हो या केरल सभी राज्यों के चुनावी मुद्दे जातिवाद

या व्यक्तिवाद के आधार पर चल रहा है। पश्चिम बंगाल का मतदाता सदियों वामपंथी

विचारधारा से प्रभावित रहा है, ये माना जाता है कि देश के विकास प्रिय व प्रगति के चिंतन

से जुड़ा हुआ है। लेकिन पिछले पांच छः वर्षों में उसकी सोच बदलकर जातिवाद की पटरी

पर लाने मे राजनैतिक दलों को सफलता मिली है। मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवैसी बिहार

के बाद पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के मसीहा बनकर इसी आधार पर सक्रिय हैं। भाजपा

के साथ दीदी को चक्रव्यूह में घेरने और निर्णायक मुस्लिम जनाधार को दीदी के पाले से

खिसकाने में उनकी भी अहम भूमिका हैं।

भारतीय जनता पार्टी का संपूर्ण सत्ता पर काबिज होने का सपना इन चार राज्यों के चुनाव

में सफलता मिलनें पर निर्भर करता है। भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं दीदी ममता

बनर्जी को सत्ता में आने से रोकना, इसके लिए भाजपा ने पूरी शक्ति झोंक दी है। लेकिन

ममता बनर्जी की शक्ति और आत्मविश्वास को किसी भी हालत में कम नहीं आंका जा

सकता है। हालांकि भाजपा टीएमसी को तौड़ने में पूरी तरह से सफल हुई हैं। लेकिन ममता

बनर्जी के होंसले पस्त नहीं हुए है, यहीं वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री

अमित शाह सहित सभी बड़े नेता पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ वातावरण

बनाने और चरित्र हनन का कोई भी प्रयास नहीं छौड़ रहैं हैं। दीदी ने अपने सारे नेताओ के

भाजपा गमन के उपरांत भी मैदान नहीं छोड़ा है और शिवजी की तरह नंदी पर संवार होकर

नंदीग्राम में डटी हुई है।

ममता एक राजनीतिक योद्धा की तरह लड़ रही हैं

चुनाव के बाद की रणनीति का बिगुल बजाते हुए सभी राजनैतिक दलों को भाजपा के

विरुद्ध लामबन्द करने का बिगुल बजा दिया है। ऐसे में भाजपा के लिए बहुत जरूरी है

तृणमूल को जड़ मूल से उखाड़ फेंकना। दावा दोनो ही 200 सीटों का कर रहैं है। हार जीत

का मार्जिन कम हो सकता है लेकिन ममता बनर्जी को जड़ मूल से उखाड़ना आसान नहीं

है। तमिलनाडु में डीएमके कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव मैदान में है तो एडीएमके भाजपा

गठबंधन मिलकर लड़ रहैं हैं। इसी प्रकार असम में भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस ने

एआईयूडीएफ से गठबंधन किया है। असम में मुस्लिम मतदाता 35 प्रतिशत है, पहले

भाजपा नेता और मुख्यमंत्री पद के लिए संभावित नाम हेमंत बिस्व सरमा ने चुनाव से

पहले कहा था कि उनकी पार्टी को मुसलमानों के वोटों की जरूरत नहीं है। लेकिन बाद में

भाजपा ने मुस्लिम वोटों के महत्व को देखते हुए सात मुस्लिम उम्मीदवार मैंदान में उतारे

हैं। 2016 में 9 में से एक उम्मीदवार जीता था। उधर कांग्रेस गठबंधन मौलाना बदरुद्दीन

अजमल की पार्टी के साथ मिलकर चुनाव मैदान में है, लेकिन गठबंधन चुनाव जीतने पर

कांग्रेस के मुख्यमंत्री की घौषणा कर चुकी है।

केरल में मेट्रो मैन के सहारे किस्मत चमकाने की कोशिश

भाजपा ने भी क्षेत्रिय पार्टियों के साथ गठबंधन किया है। राजनैतिक प्रेक्षको के अनुसार

असम में भाजपा के सत्ता में आने के योग ज्यादा है। केरल में तीन मोर्चे क्रमशः

कम्युनिस्ट, कांग्रेस और भाजपा के साथ मैदान में है। 45% मुस्लिम और ईसाई बाहुल्य

इस राज्य में वर्तमान में कम्युनिस्ट गठबंधन वाली सरकार है। पूर्व रक्षा मंत्री एन्थोनी को

कांग्रेस गठबंधन के सत्ता में लौटने की उम्मीद है।  भाजपा ने भी इस बार मेट्रोमेन

श्रीधरण की उपस्थिति में पूरा ज़ोर लगाया है। कुल मिलाकर चारो राज्यों में भारतीय

जनता पार्टी जीते या अधिक से अधिक सीट प्राप्त करें तभी केन्द्र को अधिक शक्तिशाली

बनाया जा सकता है। 2 मई के चुनाव परिणामों से ही भारत के इतिहास के इस सबसे गंदे

चुनाव की स्थिति स्पष्ट होगी।



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