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दुनिया की अनेक प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंची




  • पर्यावरण का असली नुकसान इंसानों को होना है

  • इंसानी लालच ही ला रही है दुनिया में तबाही

  • शहरीकरण और आबादी है सबसे मुख्य कारण

  • हिमालय की स्थिति पूरे भारत के लिए खतरनाक


नईदिल्लीः दुनिया की अनेक प्रजातियों के जीव पहले ही इंसानी लोभ की भेंट चढ़ चुके हैं।

अब भी विकास और तरक्की के साथ साथ अपनी सुविधाएं बढ़ने के नाम पर इंसान दूसरे जानवरों की बलि चढ़ा रहा है।

निरंतर शहरीकरण से जिस तरीके से वनों का विनाश हो रहा है, उससे जंगल के जानवरों की अनेक प्रजातियां अब खत्म होने के कगार पर खड़ी है।

इसी तरीके से अपने भोजन की लालसा में मनुष्य ने ही पालतू मवेशियों की आबादी को भी तेजी से कम कर दिया है।

वैज्ञानिक इसे पूरी पृथ्वी की पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा मानते हैं।

उनका निष्कर्ष है कि अंततः इसी लालच की कीमत इंसान को ही चुकानी पड़ेगी।

जिस तरीके से सारा कुछ बिगड़ रहा है, उसकी निर्णायक घड़ी आने की स्थिति में दुनिया की सबसे कमजोर कड़ी इंसानों की होगी।

इस बारे में शोधकर्ताओं ने बताया है कि आस्ट्रेलिया के मैदानों में रहने वाली एक प्रजाति के चूहे

समाप्त होने के बाद वहां के खेतों पर कीट पतंगों का आक्रमण पहले से बहुत अधिक बढ़ गया है।

इससे फसल उत्पादन प्रभावित हो रहा है।

दूसरी तरफ इन कीटों को नियंत्रित करने की कोशिश में जो रसायन इस्तेमाल हो रहे हैं,

वे इंसानी जीवन के लिए खतरनाक बन चुके हैं।

खास तौर पर यह रेखांकित कर दिया गया है कि भारत के लिए यह स्थिति और भी खतरनाक है

क्योंकि हिमालय का क्षेत्र पर्यावरण के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील है

और वहां की स्थिति तेजी से बिगड़ती जा रही है।

दुनिया की बीस प्रतिशत ऐसी आबादी पहले ही इंसानों की भेंट चढ़ गयीजशपुर के इलाके में हाथियों का फिर हमला किशोरी की मौत दो अन्य घायल




शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने बताया है कि जमीन पर रहने वाली तमाम प्रजातियों की आबादी

कमसे कम बीस प्रतिशत इंसानी लालच की भेंट चढ़ चुकी है।

जंगल कम होने की वजह से उनके रहने की जगह कम होती जा रही है।

दूसरी तरफ इंसानों द्वारा फैलाये गये प्रदूषण की वजह से समुद्री जीवन भी तेजी से

प्रदूषित होते हुए घटता जा रहा है।

वहां भी इंसानी भूख समुद्री आबादी को कम करती जा रही है।

सर्वेक्षण के मुताबिक पूरी दुनिया के प्राणियों में करीब एक हजार ऐसे हैं,

जो इंसानी लालच की वजह से अब विलुप्त होने के करीब पहुंच चुके हैं।

इसका मुख्य कारण इंसानों की आबादी का बढ़ना ही है।

जिसकी वजह से इंसानी भूख और स्थानों का विस्तार अन्य प्राणियों के जीवन पर संकट बनकर छाया हुआ है।

इस बारे में जानकारी रखने वालों का मानना है कि प्रकृति का विकास कुछ इस तरीके से हुआ है कि

वह हर कुछ को संतुलित करता रहता है।

इंसानों ने इसी प्राकृतिक संतुलन की स्थिति को बिगाड़ दिया है।

जिससे जब प्रकृति का हमला होगा तो उसका सबसे सरल और प्रथम शिकार इंसान को ही बनना तय है।

पेरिस के सम्मेलन में हालत पर रिपोर्ट जारी

हाल ही में पेरिस में पिछले 29 अप्रैल से चार मई तक आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में यह बताया गया है कि स्थिति को अब भी संभाला और सुधारा जा सकता है।

हर स्तर पर इसे सुधारने और पहले जैसे बनाने की कोशिशों से ऐसा किया जा सकता है।

इस रिपोर्ट को इसलिए गंभीर माना जाना चाहिए क्योंकि इसे दुनिया भर के पचास देशों के 145 विशेषज्ञों ने तीन साल की मेहनत के बाद तैयार किया है।

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि हर स्तर पर यदि प्रकृति के संतुलन को कायम रखने का काम अभी प्रारंभ हो पाया तो अगले पांच वर्षों में उसके बेहतर परिणाम दिख सकते हैं।

वरना भारत सहित कई अन्य देशों में बारिश के मौसम में कम बारिश और बेमौसम भीषण बारिश के प्राकृतिक असंतुलन के संकेत दुनिया को पहले से मिलने लगे हैं।

एक खास सीमा के बाद यह स्थिति पूरी तरह इंसानी नियंत्रण के बाहर चली जाएगी।

वैज्ञानिक प्रारंभिक और हर स्तर पर होने लायक प्रयास में अधिक से अधिक पेड़ लगाने

की वकालत कर रहे हैं। ताकि वन क्षेत्र का विकास हो और पेड़ों की बदौलत पृथ्वी का वायुमंडल सुधर सके।

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Rashtriya Khabar


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