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पृथ्वी के सबसे बड़े आकार के पक्षी का पता चला मजबूत टांगों से तेज दौड़ता था

  • काफी प्राचीन लेकिन हजार साल पहले तक था
  • सावाना और मैडागास्कर के वर्षा वन में था ठिकाना
  • 19वीं सदी में वैज्ञानिकों को पहली बार मिले थे अवशेष
  • उड़ता नहीं था आकार में जिराफ जैसा और वजन हाथी जितना
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पृथ्वी के सबसे बड़े आकार के पक्षी का अब वैज्ञानिक तौर पर

पता चल गया है। यह अत्यंत विशालकाय पक्षी थी। लेकिन आकार में

इतना विशाल होने की वजह से उसके पंख नहीं थे।

इसलिए वह आसमान में नहीं उड़ पाती थी। जमीन पर अपने आकार

और मजबूत टांगों की वजह से यह काफी तेज भाग सकती थी।

इस पक्षी के अवशेषों के आधार पर वैज्ञानिक इसके आकार प्रकार का

अनुमान लगा रहे हैं।

जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन के वैज्ञानिकों ने इसके बारे में जानकारी

सार्वजनिक की है। प्रारंभिक गणना और तथ्यों के आधार पर इस बात का

अनुमान लगाया गया है कि यह पक्षी आकार में किसी जिराफ के जितनी

ऊंची थी। वजन के बारे में अनुमान है कि वयस्क पक्षी का वजन करीब

860 किलो हुआ करता था। इस पक्षी के होने के बारे में इसके पहले

कई परस्पर विरोधी तथ्य सामने आये थे। जिसकी वजह से इसके होने

की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं की गयी थी।


कुछ पुरानी सूचनाओं को फिर से पढ़ लें

इन तमाम परस्पर विरोधी साक्ष्यों का गहन अध्ययन और वैज्ञानिक

विश्लेषण कर लेने के बाद ही वैज्ञानिक इस पक्षी को पृथ्वी का सबसे

विशालकाय पक्षी मानने के नतीजे पर पहुंचे हैं।

इस बड़े आकार के पक्षी को वैज्ञानिक परिभाषा में एइपायोरिस मैक्सिमस

का नाम दिया गया है।

दुखद बात यह है कि पृथ्वी पर होने वाले किसी उथल पुथल की वजह से

यह पक्षी इस दुनिया से गायब नहीं हुआ है।

शोध के निष्कर्ष के मुताबिक करीब एक हजार वर्ष पूर्व तक उनके होने

की पुष्टि होती है। इससे समझा जा सकता है कि इंसान अपने क्रमिक

विकास के दौर में या तो इन्हें मार कर खा गया है।

अथवा वे अन्य हिंसक प्राणियों के हमले के शिकार होने के बाद इस

दुनिया से विलुप्त हो चुके है।

पृथ्वी के सबसे बड़े पक्षी के तथ्यों पर विरोधाभाष थे

वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर इस बात की पुष्टि हुई है कि विलुप्त होने के

पहले तक यह विशालकाय पक्षी सावाना के जंगलों और मैडागास्कर के

वर्षा वनों में आराम से रहा करती थी। इसके हाल हाल तक होने की पुष्टि

फॉसिल के तौर पर मिले उनके अंडों से भी हुई है।

यूं तो इस पक्षी की हड्डियों के अवशेष पहले ही पाये गये थे। उन फॉसिलों

के आधार पर ही उनके आकार का अनुमान लगाया गया था।

वैज्ञानिकों को मिले साक्ष्य के आधार पर विवाद इस बात को लेकर था कि

इन पक्षियों के पंख थे अथवा नहीं। अगर पंख थे तो क्या वह उड़ने लायक

पंख थे। इन तमाम शंकाओं का अब निवारण हो चुका है।

जिसमें निष्कर्ष यही है कि इनके पास उड़ने लायक पंख नहीं थे

और वे आकाश पर विचरण नहीं करते थे। अपनी मजबूत टांगों की वजह

से वे जमीन पर काफी तेज भागा करते थे।

आकार में काफी बड़े होने की वजह से अपनी चोंच और टांग से भी

वे छोटे जानवरों को मार सकते थे।

वैज्ञानिक शोध का निष्कर्ष है कि इन पंक्षियों के पृथ्वी पर होने के प्रमाण

करीब साठ मिलियन वर्ष पहले से मिलते हैं।

यानी अति प्राचीन काल में भी यह चिड़ियां इस दुनिया में विचरण किया

करती थी। उस दौर में कई ऐसे प्राणी भी थे, जो अब पृथ्वी पर से विलुप्त

हो चुके हैं। जो जीवित हैं, उनमें से इंसान जैसे कई प्राणियों के क्रमिक

विकास की वजह से स्वरुप और आचरण भी बदल चुका है।

पहली बार फॉसिल्स मिलने के बाद ही हुए थे मतभेद

19वीं सदी के प्रारंभ में यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने इसके फॉसिल्स का पहली

बार पता लगाया था। तब से लगातार इस पक्षी के आकार प्रकार और व्यवहार

पर शोध चल रहा था। अब पिछले बुधवार को ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने इसके बारे

में औपचारिक तौर पर अपना शोध प्रबंध सार्वजन क किया है।

जिसमें यह बताया गया है कि यह आकार में किसी जिराफ से कम नहीं था।

इसी वजह से शोध प्रबंध में कई स्थानों पर इसे हाथी पक्षी (एलिफेंट बर्ड) के

नाम से भी दर्ज किया गया है।

इस शोध प्रबंध के मुख्य लेकर और जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन

के जेम्स हैंसफोर्ड ने इसकी जानकारी दी है।


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इसमें बताया गया है कि आकार में इतने बड़े और वजन में काफी भारी

होने की वजह से ही शायद उनके पंख नहीं थे। वैज्ञानिकों ने इस पक्षी के

तमाम आंकड़ों को कंप्यूटर में दर्ज करने के बाद उसके कंप्यूटर मॉडल

के आधार पर उसके होने और उसकी आकृति तैयार करने में ऐसी सफलता

पायी है।

लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिर किन कारणों से आराम

से रहने वाले यह पक्षी इस दुनिया से विलुप्त हो गये हैं।

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