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औद्योगिक रोजगार सृजन पर काम तेज हो

औद्योगिक रोजगार सृजन पर अब काम प्रारंभ हो जाना चाहिए। यूं तो यह सर्वविदित है

कि बरसात के मौसम में अधिकांश महानगरीय मजदूर और ईंट भट्टा में काम करने वाले

मजदूर यूं भी अपने अपने गांव लौट आते थे। इनलोगों को अपने गांव में खेती करनी पड़ती

थी। इस बार भी कमोबेशी यह स्थिति है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार अपने गांव

लौटने वाले मजदूर बिल्कुल खाली हाथ और बहुत परेशानी के बाद गांव लौटे हैं। ऐसे में

उन्हे अगर गांव में थोड़े बहुत अंतर का रोजगार भी मिलने लगा तो वे शायद दोबारा

महानगरों तक वापस जाना ही नहीं चाहेंगे। इसलिए खेती का मौसम जारी रहने के बीच ही

केंद्र और सभी राज्य सरकारों को अपने पास उपलब्ध जॉब कार्ड के विवरणों के आधार पर

कुशल कामगारों के लिए औद्योगिक रोजगार के नये साधन तैयार करने का काम अभी ही

युद्ध स्तर पर प्रारंभ कर लेना चाहिए। धान की खेती खत्म होने के बाद जब माहौल में

सुधार होगा तो हो सकता है कि ऐसे मजदूर दोबारा महानगरों और औद्योगिक इलाकों

तक रोजगार के लिए लौटने का साहस जुटा सकें। फिर भोज के दिन कोहड़ा रोपने से

बेहतर है कि इसकी तैयारी पहले से ही कर ली जाए। औद्योगिक रोजगार से भी देश की

सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में तेजी आयेगी, यह सर्वविदित सत्य है। इस कारण से रोजगार

सृजन के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर नकदी का प्रवाह तेज करना ही सरकार की

प्राथमिकता होनी चाहिए। केंद्र सरकार ने इस बारे में आर्थिक पैकेजों की जो घोषणा की है,

उसका असर नजर आना बाकी है। इसलिए पैकेज को लागू करते वक्त भी इस बात पर

ध्यान दिया जाना चाहिए अधिकाधिक रोजगार सृजन करने से ही अर्थव्यवस्था की रूकी

पड़ी गाड़ी की रफ्तार तेज हो सकती है।

आर्थिक पैकेज में भी फोकस आम आदमी पर रहे

इसे बिना तेज किये फिलहाल कोरोना संकट से उत्पन्न आर्थिक अव्यवस्था की स्थिति में

कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो सकता। अलबत्ता हमें गलवान घाटी में चीन की हरकतों

पर नाराज होने और विरोध प्रदर्शन करने के साथ साथ अपनी वास्तविकता को भी पहचान

लेना चाहिए। समझदार समाज वह होता है जो अपने विरोधी के अच्छे गुणों को आत्मसात

कर खुद का विकास कर सके। भारत का ऑटोमोबाइल, सिथेंटिक कपड़ा, बिजली के

उपकरण सहित अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों और कच्चा माल के तौर पर इस्तेमाल होने

वाले अनेक किस्म के रसायनों के लिए हमारे कल कारखाने चीन पर आश्रित है। इसलिए

सिर्फ चौक चौराहों पर पुतला जलाने भर से हमारी समस्या का समाधान नहीं होने वाला।

हमें चीन के कुटीर उद्योग पद्धति को समझते हुए अपने यहां भी वैकल्पिक सप्लाई लाइन

विकसित करने पर अधिकाधिक ध्यान देना चाहिए। जब तक हम अपने यहां इस किस्म

से चीन के जैसा कुटीर और लघु उद्योगों का विकास नहीं कर पायेंगे, हमारे बड़े कल

कारखानों की चीन पर निर्भरता कम नहीं होगी। हम अपने देश में भी टाटा को इसके

बेहतर उदाहरण के तौर पर देख सकते है। जमशेदपुर में अधिकांश अनुषंगी इकाइयों को

खुद टाटा ने आगे बढ़ाने का काम किया है। इस प्रयास का ही नतीजा है अब टाटा को अपने

कल कारखानों के छोटे छोटे कल पूर्जो बाहर की सप्लाई पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है।

अब समय की मांग है कि हम टाटा के समग्र विकास के मॉडल को आत्मसात करें और

क्रमवार तरीके से अपनी आपूर्ति चेन को मजबूत बनाते हुए औद्योगिक विकास के पथ पर

खुद को पहले आत्मनिर्भर बनाने का काम करें।

औद्योगिक रोजगार के लिए टाटा अपने आप उदाहरण

जब तक हमारे पास अपनी औद्योगिक इकाइयों को कच्चा माल आपूर्ति करने का चीन

का मजबूत विकल्प उपलब्ध नहीं होगा हम चीन के व्यापारिक हमलों पर चौक चौराहों पर

विरोध करने और पुतला जलाने से अलग कुछ नहीं कर पायेंगे। वैसे भी कोरोना से उत्पन्न

परिस्थितियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया के सारे पुराने कूटनीतिक और

व्यापारिक समीकरण ध्वस्त हो चुके हैं। अब सब कुछ नये सिरे से गढ़ने और बनाने की

जरूरत है। ऐसी परिस्थिति में हम औद्योगिक रोजगार के सृजन के काम में हमें अपनी

पहले की सोच को भी बदलना होगा। बड़े कल कारखाने देखने में तो अच्छे लगते हैं लेकिन

छोटी छोटी औद्योगिको इकाइयों के बढ़ावा और प्रोत्साहन मिलने से अधिक रोजगार का

सृजन अधिकाधिक इलाकों में होता है। हम चीन को भले ही गाली देते रहें लेकिन उसके

विकास के मॉडल को अपनाते हुए ही हम अपने आप को ऐसे मामलों में आत्मनिर्भर बना

सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में चीन ने गलवान के बहाने भारत और पूरे भारतीय

समाज को नये सिरे से हर चीज को समझने को जो अवसर प्रदान किया है, उस अवसर का

हमें पूरा लाभ उठाना चाहिए। हम अपने कल कारखानों के अधिकांश मामलों में

आत्मनिर्भर होकर भी बिना युद्ध के चीन को अच्छी तरह सबक सीखा सकते हैं।


 

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