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तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद .. .. ..

तेरी गलियों में कदम आप नहीं रखेंगे तो क्या हुआ सामने वाला तो हर राज्य में जाने की

तैयारियों में जुटा है, जहां जहां विधानसभा का चुनाव होने वाला है। एलान भी स्पष्ट है कि

तेरी गलियों से परहेज करने वाली यानी भारतीय जनता पार्टी को चुनाव में पराजित करने

की अपील करेंगे। वैसे ही सब तरफ से घिरी भाजपा पहली बार किसानों के प्रतिरोध को

झेल रही है। इसका पूर्व अनुभव वर्तमान भाजपा नेतृत्व को शायद नहीं रहा है। इसलिए

इतनी बड़ी चूक हो गयी है। उसके ऊपर की चूक कि अपनी गलती सुधारने के लिए भी

तैयार नहीं है। गुजरात से लेकर दिल्ली तक अब तक का घटनाक्रम तो यही बताता है कि

हुजूर पीछे हटना नहीं जानते हैं। लेकिन इस बार शायद इसी अड़ियलपन की वजह से गाड़ी

के चारों चक्कों की कौन कहे, इंजन तक दलदल में फंस चुकी है।

जी हां फिलहाल तो किसान आंदोलन की गाड़ी कुछ ऐसा ही दृश्य पेश करती हुई नजर

आती है। दिल्ली के बाहरी इलाके में बैठे किसानों के बारे में जब जब चंद सरकार समर्थक

चैनल कुछ उल्टा प्रचारित करते हैं तो अगले ही दिन वहां किसानों की भीड़ फिर से बढ़

जाती है। आंदोलन को जारी रखते हुए किसानों ने अब बारी बारी से खेती और आंदोलन

दोनों जारी रखने का फैसला कर लिया है। बीच में तो किसान नेता राकेश टिकैत ने फसल

नष्ट कर देने की बात क्या कह दी, कई इलाकों में वाकई किसानों ने ऐसा कर दिया। कुछ

स्थानों पर तो गांव वालों को दौड़कर उन्हें रोकना पड़ा और बताना पड़ा कि राकेश टिकैत ने

अभी फसल को नष्ट करने को नहीं कहा है। जब वह वाकई ऐसा करने को कहेंगे, तब ऐसा

कर दिया जाएगा।

तेरी गलियों वाले इस गीत को गाया था मोहम्मद रफी ने

इसी बात पर एक पुरानी फिल्म का गीत याद आने लगा है। वर्ष 1974 में बनी थी फिल्म

हवस। इस गीत सावन कुमार टॉक ने लिखा था और संगीत में ढाला था। इस गीत को

अपना स्वर दिया था मोहम्मद रफी ने। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम, आज के बाद
तेरे मिलने को न आएंगे सनम, आज के बाद

तू मेरा मिलना, तू मेरा मिलना समझ लेना एक सपना था
तुझको आखिर मिल ही गया जो तेरा अपना था
हमको दुनिया में समझना ना सनम, आज के बाद

तेरे मिलने को न आएंगे सनम, आज के बाद
घिर के आएंगी
घिर के आएंगी घटाएं फिर से सावन की
तुम तो बाहों में रहोगी अपने साजन की
गले हम ग़म को लगाएंगे सनम, आज के बाद

तेरे मिलने को न आएंगे सनम, आज के बाद

इसलिए तेरी गलियों में वह जाए या ना जाए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकार ने जो

कुछ सोचा था, वैसा कुछ होता हुआ दिख रही रहा है। उल्टे किसान जिस तेवर में केंद्र

सरकार को घेर रहे हैं, उसक राजनीतिक दुष्परिणाम होना तय है। किसान नेता राकेश

टिकैत बार बार यह कह रहे हैं कि यह सारे कानून पूंजीपतियों के इशारे पर ही लाये गये हैं।

इसी वजह से पहले गोदाम बना दिये गये, उसके बाद कानून लाया गया है।

किसान आंदोलन ने तो सरकार का हाजमा ही खराब कर रखा है

किसान आंदोलन के साथ साथ तेरी गलियों में इन दिनों पेट्रोल और डीजल का भी रोना है।

जिस मुद्दे पर पूर्व सरकार को लगातार कोसते रहे, अब खुद भी वही सब कुछ कर रहे हैं।

मजेदार बात है कि उस वक्त जो लोग जबर्दस्त नौटंकी करते थे, आज सीन से पूरी तरह

गायब है।

चलिए अब चुनावी इलाकों की भी सैर कर लें क्योंकि तेरी गलियों का हश्र आगे क्या होगा,

यह भी इन चुनावों पर निर्भर है। असम में भाजपा की सरकार थी। लेकिन अब चुनाव से

ठीक पहले बोड़ोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने उससे रिश्ता तोड़ लिया है। 126 सदस्यों वाली इस

विधानसभा में बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के 11 विधायक है। भूटान और अरुणाचल से सटे इस

इलाके में चार जिले आते हैं। ऐसे में इस एक संगठन के अलग होने का अर्थ है कि यहां के

लोग भी चुनाव में यह गीत गुनगुनाते हुए मिलेंगे कि तेरी गलियों में ना रखेंगे कदम।

यानी वोट नहीं देंगे।

पिछले लोकसभा चुनाव में जब भाजपा को प्रचंड बहुमत हासिल हुआ तो यह दलील दी

गयी थी कि किसानों को सीधे भुगतान का फैसला पार्टी को लिए फायदेमंद रहा है। अब उस

दलील पर भाजपा के दूसरे नेता कुछ बोलने से बच रहे हैं। यह सही भी है कि किसानों का

बहुत बड़ा तबका भाजपा के साथ खड़ा था, जिस वजह से पार्टी को बड़ी जीत मिली थी।

लेकिन अब आंदोलन के एक सौ दिन पूरे होने के बाद इन इलाकों का पॉलिटिकल नक्शा

वैसा ही है या बदल गया है, यह भी आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में

दिख जाएगा। यह बात समझ में आयेगी कि तेरी गलियों में कौन आया है और कौन नहीं

आया है।

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