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महिलाओं की तस्करी पर अधिक ध्यान दें केंद्र सरकार

महिलाओं की तस्करी के बारे में पहली बार खतरनाक संकेत मिले हैं। यह कोई कहानी नहीं

है बल्कि यह रिपोर्ट सुरक्षा बलों की है। लिहाजा इस रिपोर्ट को यूं ही नजरअंदाज भी नहीं

किया जा सकता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना संकट के दौरान जब लॉक डाउन लगा

तो भारतवर्ष के पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र की अनेक महिलाओं और लड़कियों को मजबूरी में

बांग्लादेश के रास्ते कहीं और भेजा गया है। इस बात को इसलिए भी नजरअंदाज नहीं

किया जा सकता है क्योंकि जब मुंबई में डांस बार बंद किये गये थे, तो वहां काम करने

वाली लड़कियों की क्या दुर्गति हुई थी, यह हमारी जानकारी में है। सूचना है कि लाकडाउन

के कारण पश्चिम बंगाल, असम, बिहार, झारखंड, यूपी और पूरे पूर्वोत्तर राज्यों से

बांग्लादेश में पिछले नौ महीने में हिंदू लड़कियों सहित दस हजार से अधिक महिलाओं की

तस्करी की गई है। अगर यह आकलन सही है तो यह माना जाना चाहिए कि मानव

तस्करी के मामले में यह वाकई दुनिया का सबसे खराब इलाका बन चुका है। यह भी स्पष्ट

है कि इतनी अधिक संख्या में लड़कियों को बांग्लादेश में भी बिना पहचान छिपाये नहीं

रखा जा सकता है। तो सुरक्षा बलों का जो आकलन है, वह सच होगा कि इन्हें बांग्लादेश के

रास्ते अन्य देशों में भेजा गया है। जिन देशों में उन्हें भेजा गया है, वहां उनकी दरअसल

क्या हालत है, यह किसी को नहीं पता। स्थिति की गंभीरता को इस आधार पर भी समझा

जाना चाहिए कि बिहार, झारखंड और उत्तरप्रदेश के कई इलाकों में हैदराबाद और

हरियाणा के युवक शादी करने आये थे। बाद में उनमें से अधिकांश का तो कुछ पता ही नहीं

चला जबकि जो किसी तरह से बचकर अपने घर लौट पायी, उन्होंने अपने साथ हुए हादसे

और अत्याचार की कहानी बयां की है।

महिलाओं की तस्करी से बचकर आने वाले कष्ट बता चुके हैं

इसलिए महिलाओं की तस्करी के मामले में केंद्र सरकार को अपने सूचना संकलन के

संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए। इस परिस्थिति को भी हमें ध्यान में रखना

होगा कि जिनके पास रोजगार के साधन थे और अब नहीं हैं, उनके लिए अपना और अपने

परिवार का पेट पालना अपने आप में कठिन चुनौती है। कोरोना संकट के दौरान जब

मजदूर अपने गांव खाली हाथ लौट आये तो झारखंड के ग्रामीण इलाकों से इस दर्द को

महसूस किया जा सकता है। भारत-बांग्लादेश सीमाओं पर महिलाएं तस्करी दोनों देशों के

लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन रहा है। जो कुछ महिलाएं सुरक्षा बलों अथवा पुलिस के

हाथ आये हैं, उन्होंने पूछताछ में बताया है कि कोविड-19 के दौरान लाकडाउन के कारण

डांस बार बंद हो गए और रोजगार के साधन न होने के कारण इन महिलाओं को भारतीय

दलाल बाबू की मदद से अवैध रूप से सीमा पार कराने के लिए सीमावर्ती क्षेत्र में लाया

गया। मजबूरी के इस दलदल में फंसी महिलाओं और लड़कियों को एक संगठित रैकेट ही

अन्य देशों तक भेजने का काम करता है। बिचौलिए गिरफ्तारी से बचने के लिए सैटेलाइट

फोन का उपयोग करते हैं। सीमा सुरक्षा बल ने इस साल अक्टूबर महीने के 15 तारीख तक

दोनों देशों के बीच अवैध रूप से सीमाओं को पार कर रहीं 1589 महिलाओं को पकड़ा है।

गिरफ्तार लोगों में वे महिलाएं शामिल हैं, जिन्होंने भारत में प्रवेश करने की कोशिश की

और साथ ही वह महिलाएं, जिन्होंने 1 जनवरी से 15 अक्टूबर के बीच दलाल या गुप्त

सूचना मुहैया कराने वालों की सहायता से सीमा पार करने की कोशिश की थी।

हालांकि,बिहार, झारखंड ,उत्तर प्रदेश, और पश्चिम बंगाल से लेकर पूरे पूर्वोत्तर राज्य से

महिलाओं की तस्करी हो रहा है ।

बांग्लादेश सीमा पार करने के बाद उनका अता पता नहीं चलता

बांग्लादेश से यह भारतीय महिलाओं को पाकिस्तान, इसराइल, स्विटजरलैंड सहित अन्य

देशों तक पहुंचा जाता है । जिस तरह बांग्लादेश से लाखों से लाखों लोग अवैध तरीका से

भारत में प्रवेश करते हैं। इसी तरह सीमा पार करके दलालों ने भारतीय महिला को

बांग्लादेश  भेजते हैं। ज्यादा भारतीय महिला पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और

असम की हैं। महिलाओं की अंतर्राष्ट्रीय तस्करी में यह संख्या महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह

2020 के अंत तक पिछले कुछ वर्षों के रिकॉर्ड को तोड़ सकती है। एक अनुमान के अनुसार,

अगर तस्करी के दौरान पकड़ी गई महिलाओं की संख्या साढ़े दस महीने में ही 1500 को

पार कर गई है, तो यह इस साल के अंत तक 2000 का आंकड़ा पार कर सकती है।

भारत और बांग्लादेश के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर पकड़ी गई महिलाओं की संख्या 2019

में 936, 2018 में रिकॉर्ड 1,107 और 2017 में 572 थी। इसलिए आंकड़ों के आधार पर ही

सही केंद्र सरकार को महिलाओं की तस्करी रोकने की दिशा में सुधारवादी कदम भी उठाने

चाहिए ताकि इसकी रोकथाम के साथ साथ बड़ा खतरा टाला जा सके।

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