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जुआ खेलने में बच्चों को लेकर शामिल होती हैं महिलाएं भी







  • साल में एक बार होता है ऐसा सार्वजनिक आयोजन
  • माता षष्ठी की पूजा के बाद शुरु होता है मेला
  • घर की महिलाओं के साथ आने की है परंपरा
  • जुआ क्यों खेला जाता है, इसका इतिहास नहीं
प्रतिनिधि

मालदाः जुआ खेलने को बुरी बात माना जाता है, यह आम कहावत है। कहा जाता है कि जुआ

खेलने से अपना और अपने परिवार का सर्वनाश हो जाता है। महाभारत से लेकर आज तक

यह कहावत वाकई सही है। लेकिन मालदा के इस मेला में साल में एख बार पुरुषों के साथ

साथ महिलाएं भी खुलकर जुआ खेलती हैं। इसे जुआड़ी मेला के नाम से ही जाना जाता है।जुआ खेलने में बच्चों को लेकर शामिल होती हैं महिलाएं भी

मालदा नगरपालिका के वार्ड नंबर 4 में मोकादिपुर के इलाके में यह मेला आयोजित किया

गया।  मंगलवार के दिन सुबह से ही इस मेला में भाग लेने वालों की भारी भीड़ थी। लोग

अपने परिवार और बच्चों के साथ इस जुआड़ी मेला में भाग लेने आये थे।

इस मेला की खास बात यह है कि यहां जुआ प्रारंभ होने के पहले देवी षष्ठी को लेउरी का

भोग लगाया जाता है। इस मैदान में देवी की पूजा के बाद ही प्रारंभ होता है यह जुआड़ी

मेला। यह मेला दिनभर चलता रहता है।

वहां आने वाले लोग मानते हैं कि इस मेला में जुआ खेलने से सालों पर उनके घर में सुख

और शांति रहती है। प्राचीन किवंदति को मानते हुए वर्तमान पीढ़ी के लोग भी इस रस्म

को निभाने सपरिवार यहां आते हैं।

इस प्राचीन सोच की वजह से ही इस मेला में महिलाओं को भी जुआ खेलने का प्रवेश

मिला हुआ है। वैसे इस जुआड़ी मेला में महिलाओं के प्रवेश अथवा भागीदारी का

इतिहास कोई नहीं जानता। लोगों के मुताबिक उनलोगों ने भी अपने पूर्व पुरुषों से यही

सुना है कि महिलाओं को साथ लेकर ही इस मेला में जुआ खेलने जाना है और घर की

महिलाओं को भी इस जुआ में भाग लेना है। इसी नियम का वे अब भी पालन करते

आ रहे हैं।

जुआ खेलने के आयोजन के साथ पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हैं

मेला के आयोजन समिति से जुड़े वरिष्ठ सदस्य विनोद अग्रवाल ने कहा कि इसी इलाका

से कभी लखींदर का शव लेकर बेहुला जा रही थी। इसी स्थान पर बेहुला ने अपने पति को

दोबारा बचाने के लिए षष्ठी माता की पूजा की थी। तब से यहां पूजा का आयोजन

नियमित होता आ रहा है। इसकी खास तिथि मूलाष्ठी है। सिर्फ इसी दिन यहां मैदान में

पूजा का आयोजन होता है। स्थानीय मिठाई लेउरी को ही यहां पूजा के भोग के तौर पर

चढ़ाया जाता है। यह मिठाई भी कहीं और नहीं बनती है। इसी भोग निवेदन के बाद मेला

में मौजूद लोग दिन भर जुआ खेलने में जुट जाते हैं। मेला में जुआ खेलने आयी कई

महिलाओं ने हंसते हुए स्वीकार किया कि आज के दिन इस जुआ में भाग लेना

सामाजिक तौर पर मान्यता प्राप्त है। इसलिए उन्हें भी यहां जुआ खेलने से कोई हिचक

अथवा परेशानी नहीं होती है। महिलाओं के मुताबिक वे बहुत कम पैसा इस जुआ पर खर्च

करती हैं लेकिन इससे अगर सालों भर परिवार की शांति बनी रहे तो उससे बड़ी बात और

क्या होगी। हमारे पति और परिवार के लोग भी हमारे साथ ही होते हैं।

प्राचीन काल में महिलाओं के साथ आये पुरुषों ने डाली होगी प्रथा

कुछ बुजुर्गों का कहना है कि अति प्राचीन काल में यहां घना जंगल हुआ करता था।

इसके पास से ही बेहुला नदी भी बहती है। यहां पर महिलाएं अपने बच्चों के कल्याण

के लिए पूजा किया करती थी। शायद उस दौरान महिलाओं के पूजा में व्यस्त होने के

दौरान उनके साथ आये पुरुष समय व्यतित करने के लिए मैदान में जुआ खेला करते थे।

हो सकता है कि जुआ खेलने की प्रथा वहीं से प्रारंभ हुई हो। लेकिन यह सिर्फ कहानी है।

यहां जुआ क्यों खेला जाता है और महिलाओं के साथ यहां आना क्यों जरूरी है, इसके कोई

प्रामाणिक ऐतिहासिक तथ्य मौजूद नहीं है।



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