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असम में जंगली हाथियों ने किया सेना का करोड़ों का नुकसान

  • सेना ने असम सरकार से मुआवजा मांगा

  • सुरक्षा शिविरों तक को तोड़ रहे हैं हाथी

  • सेना ने कहा हाथी हटाये या मुआवजा दें

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी: असम में जंगली हाथियों ने तांडव मचाया हैं। इस कारण असम में भारतीय सेना

को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ हैं। असम के गुवाहाटी वन्यजीव अभयारण्य से हाथियों

के झुंड ने भारतीय सेना के क्षेत्रों में भटके और कामरूप महानगर में भारतीय सेना के

सुरक्षा शिविरों के घरों को नष्ट कर दिया। सोमवार रात को सैन्य शिविर में दहशत फैल

गई क्योंकि 15-16 हाथी दल सैन्य शिविर क्षेत्र में पहुंचे और तांडव मचाया। सेना के एक

अधिकारी ने यह जानकारी दी और कहा कि हर दिन भारतीय सेना 20-30 हाथियों से

बचकर थक जाती है और सेना के लिए इसे जारी रखना मुश्किल हो गया है। सेना ने

सरकार से कहा है कि वह या तो गुवाहाटी स्थित उसके पूर्वी बेस से सटे वन्यजीव

अभयारण्य से हाथियों को दूसरी जगह हटाए या फिर हाथियों की वजह से उसे होने वाले

नुकसान का मुआवजा दे। 78.64 वर्ग किलोमीटर में फैले आमचांग वन्यजीव अभयारण्य

में करीब 50 हाथी हैं। यह हाथी अक्सर सेना के इलाके में घुस कर तोड़-फोड़ मचाते हैं।

सेना का दावा है कि बीते छह महीने में हाथियों के उपद्रव की वजह से करोड़ों का नुकसान

हो चुका है। लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों ने सेना के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि वर्ष 2010 से अब तक राज्य में विभिन्न वजहों से

लगभग 800 हाथी मारे जा चुके हैं। खासकर पूर्वोत्तर इलाके में घने जंगलों की वजह से

सैन्य शिविरों में हाथियों के घुसने और तोड़-फोड़ करने की समस्या बहुत पुरानी है। सेना

हालांकि अपने स्तर पर कंटीली तारों की बाड़ और वॉचटावर की स्थापना जैसे उपाय करती

रही है लेकिन वह नाकाफी हैं। जंगली हाथी अकसर बाड़ तोड़ कर सेना के शिविरों और

छावनी इलाकों में घुसते रहे हैं।

असम में जंगली हाथियों का इलाका काफी विस्तृत है

हाथियों के घुसने की स्थिति में सेना के जवान आग और शोरगुल जैसे तरीकों से उनको

भगाते हैं। गंभीर मामलों में वन विभाग को भी सूचना दी जाती है। असम की राजधानी

गुवाहाटी के पास सेना का सबसे बड़ा नारंगी सैन्य स्टेशन है। उसकी करीब छह

किलोमीटर लंबी सीमा आमचांग वन्यजीव अभयारण्य से लगी है। अभयारण्य से हाथी

अकसर सैन्य इलाके में पहुंच कर तोड़-फोड़ मचाते हैं। इसी मुद्दे पर नारंगी कैंटोनमेंट के

52 सब एरिया के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) मेजर जनरल जारकेन गामलिन

ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र भेज कर कहा है कि या तो उक्त अभयारण्य में रहने वाले

हाथियों को कहीं और भेजा जाए या फिर सरकार तोड़-फोड़ से हुए नुकसान के मुआवजे के

तौर पर करोड़ों की रकम का भुगतान करे। 2002 में हाथियों के हमलों पर अंकुश लगाने के

लिए सेना ने लोहे की बाड़ लगाने की एक योजना शुरू की थी। लेकिन वन विभाग ने बीते

साल यह कहते हुए इस पर आपत्ति जताई थी कि लोहे की नुकीली छड़ों से हाथियों को

नुकसान पहुंच रहा है। उसके बाद वह बाड़ हटा ली गई थी।

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, तीन हाथियों का एक

झुंड सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है। पहले हाथी बड़े झुंड में आते थे। लेकिन बिना

कोई नुकसान पहुंचाए लौट जाते थे।

लेकिन अब बीते कुछ सप्ताह से उनके हमले बढ़ गए हैं। एक वन अधिकारी ने सेना को

सुझाव दिया है कि सेना के शिविर में एक किलो लाल मिर्च रखें और इसे पीसकर गाय के

गोबर में मिलाएं और कोंडों को रखें। उल्लेखनीय है कि इसे जलाकर इसका धुंआ करने से

हाथी भाग जाते हैं।


 

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