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भारतीय जनता पर जासूसी क्यों, भय आखिर किसे है







भारतीय जनता पर फिर से जासूसी नजर है। इस बार भी इसका खुलासा होने

के बाद एक के बाद एक नई नई कडियों के खुलने का सिलसिला प्रारंभ हो रहा

है। इस बार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप ने इस जासूसी का राज

खोला है। अब राज खुलने के बाद केंद्र सरकार अगर इस सोशल मीडिया

प्लेटफॉर्म से ही जवाब मांग रही है तो इसका एक साफ निष्कर्ष केंद्रीय

एजेंसियों की विफलता है। अगर किसी दूसरे माध्यम से इस जासूसी के बारे में

जानकारी हासिल करने की पहल हो रही है तो यह माना जाना चाहिए कि देश

की जांच एजेंसियां इस मामले में पूरी तरह विफल रही हैं। अत्याधुनिक संचार

उपकरणों के इस दौर में ऐसा हो पाना स्वीकार्य तथ्य नहीं है। इसलिए ऐसा

माना जा सकता है कि देश की अपनी एजेंसियों को भी इस जासूसी की

जानकारी थी। अगर वाकई बात ऐसी है तो ऐसा किसकी अनुमति से हो रहा

था, यह जानने का हक देश को है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है

क्योंकि इससे पहले भी इस किस्म की जासूसी के राजनीतिक इस्तेमाल

के तर्क सही साबित हुए हैं। भले ही कैब्रिज एनालिटीका का पूरा सच हमारे

सामने नहीं आया हो और जिस तरीके से उस पूरे मामले की लीपापोती

कर दी गयी थी, उससे काफी कुछ साफ हो गया था।

अब सवाल उठता है कि क्या किसी भी एजेंसी को देश की जनता को इस

तरीके से ठगने और हरेक की निजता में इस तरीके से दखल देने का

अधिकार है। इससे पहले जब कई कानूनों में संशोधन कर निजता के अधिकार

में खुफिया कान को अनुमति देने के प्रावधान लाये गये तो आम जनता

ने इसे स्वीकार किया था।

भारतीय जनता पर कौन नजर रखना चाहता है

भारतीयों पर हुई जासूसी का राज धीरे धीरे खुलने लगादरअसल देश में बढ़ रही आतंकवादी गतिविधियों की वजह से खुद जनता भी

यह मानती थी कि इस किस्म की निजता के मुकाबले राष्ट्रीय सुरक्षा ज्यादा

महत्वपूर्ण है। लेकिन इन तमाम उपकऱणों का उपयोग क्या सिर्फ उसी

मकसद से किया जा रहा है, यह दोबारा से जान लेना जरूरी होता चला

जा रहा है। राज्य सरकार की अपनी एजेंसियों के पास भी ऐसे उपकरण

एक नहीं अनेक मौजूद हैं, जिनके माध्यम से वे मोबाइल पर होने वाली

बात-चीत को सुन सकते हैं। लेकिन क्या इन उपकरणों का सिर्फ इतना

ही इस्तेमाल हो रहा है, इस पर नये सिरे से सार्वजनिक बहस होनी चाहिए।

ऐसा इसलिए है क्योंकि झारखंड सहित कई राज्यो में इस अत्याधुनिक

विधि का राजनीतिक मकसद से इस्तेमाल किये जाने की पुष्टि

पहले ही हो चुकी है।

अब सवाल इजरायल की कंपनी के द्वारा तैयार विधि से जासूसी किये

जाने का है। तो सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह इजरायल से

अपनी मित्रता साबित करे और इजरायली कंपनी से यह जानकारी

सर्वप्रथम हासिल करे कि दरअसल इस स्पाई वेयर के माध्यम से

जासूसी किसके निर्देश पर की गयी है। पहले से ही यह बात स्पष्ट हो चुका है

कि इस विधि का इस्तेमाल कोई निजी व्यक्ति नहीं कर सकता। लिहाजा यह

महत्वपूर्ण मामला है और केंद्र सरकार को व्हाट्सएप को कारण बताओ

नोटिस जारी करने के अलावा भी इसमें पहल करनी चाहिए। आखिर इस

संस्करण के जासूसी साफ्टवेयर के इस्तेमाल या तो देश की सरकार ने

किया है अथवा किसी विदेशी सरकार ने ऐसा कराया है। दोनों ही स्थिति में

देश की आम जनता को यह जानने का हक है कि आखिर वह कौन सा

अदृश्य चेहरा है जो अब भी देश की जनता से भयभीत है।

जनता का भय देश में लोकतंत्र के मजबूत होने की निशानी है

यूं तो देश के हरेक राजनीतिक दल को लोकतांत्रिक पद्धति के तहत जनता

से डरकर ही रहना चाहिए। लेकिन अगर यह किसी राजनीतिक मकसद की

पूर्ति के लिए है तो क्या वाकई लोकतंत्र की दुहाई देने वाले आंतरिक लोकतंत्र

में भरोसा करते हैं। देश के अंदर हुई इस जासूसी के बारे में जो कुछ तथ्य

प्रारंभिक तौर पर सामने आये हैं, उसके मुताबिक खास तौर पर पत्रकारों

और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी हुई है। इस वजह से ऐसा माना जा

सकता है कि देश के अंदर अब भी एक ऐसा ताकत विद्यमान है जिससे

देश अथवा विदेश की कोई सरकार भयभीत है। यह अदृश्य चेहरा कौन है,

यह जानना राष्ट्रहित में है। दूसरी तरफ यह स्पष्ट है कि जो भी शक्ति

इस जासूसी के साथ जुड़ी हुई है वह किसी भी तरीके से राष्ट्रभक्त तो

नहीं हो सकती। आज के दौर में राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र धड़ल्ले से

बांटा जा रहा है। इसलिए इस राष्ट्रभक्ति की पहचान भी जरूरी है।

भारतीय संविधान के तहत जनादेश के सम्मान से किसे डर लगता है,

इसका खुलासा होने पर बहुत कुछ स्पष्ट भी हो सकता है। इसलिए भारतीय

जनता पर जासूसी करने से लाभ किसे है उसकी पहचान में केंद्र सरकार

की पहल भी बहुत कुछ स्पष्ट कर देगी। जमाना बदल चुका है। इसलिए

फेसबुक के माध्यम से कैंब्रिज एनालिटीका भारतीय जनता को लूटने जैसी

छूट बार बार किसी को नहीं दी जा सकती है।



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