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क्यों जानलेवा भी बन रहा है कोरोना वायरस यानी कोविड 19

  • इसके संक्रमण के तौर तरीकों का हुआ विस्तार से अध्ययन
  • सूर्य के कोरोना के आकार की वजह से ऐसा नाम
  • वायरस के ऊपरी प्रोटिन की पर्त उसे बचाता रहता है
  • ठीक हो चुके मरीजों के फेफड़ों को भी पहुंचता है नुकसान

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः क्यों जानलेवा है यह नया कोरोना वायरस, इसके बारे में लगातार पूरी दुनिया

में अध्ययन चल रहा है। इसके उपचार के लिए कोई दवा बनान की तैयारियों जुटे

वैज्ञानिकों ने इस वायरस के काम करने के तौर तरीकों पर लगातार अध्ययन करने के बाद

उसकी रिपोर्ट जारी की है। दरअसल कोविड 19 नाम के इस वायरस को कोरोना वायरस

इसलिए भी नाम दिया गया है क्योंकि यह गोल आकार के ऊपर कांटे जैसा उभार लिये हुए

है। यह काफी हद तक आकार में सूर्य को कोरोना के जैसा ही है। इसी वजह से इसका नाम

भी कोरोना वायरस रखा गया है। यह स्पष्ट हो चुका है कि यह वायरस इंसान के शरीर में

उसकी नाक अथवा मुंह के रास्ते अंदर प्रवेश करता है। संक्रमण के पहले दौर में वह गले में

अपना ठिकाना बनाता है। वहां से वंशवृद्धि करता हुआ वह जब इंसान के फेफड़े तक जा

पहुंचता है तो असली खतरा प्रारंभ होता है।

प्रतिरोधक शक्ति अधिक है तो असर होने में समय लगता है

जिनलोगों की प्रतिरोधक शक्ति अधिक है वे प्रारंभिक अवस्था में सिर्फ खांसी और सर्दी के

जैसा ही असर दिखाते हैं। लेकिन शोध में ऐसे रोगी भी पाये गये हैं, जिनमें यह प्रारंभिक

लक्षण नहीं दिखने के बाद भी सीधे संक्रमण में इंसान का फेफड़ा प्रभावित हुआ है। इस

बीमारी का ईलाज कर रहे वैज्ञानिक यह देख रहे हैं कि कई बार इस संक्रमण से उबरने

वालों के फेफड़ों में स्थायी नुकसान हो रहा है। यह वायरस भी सार्स अथवा मार्स कोव जैसा

ही है। लेकिन इन सभी में थोड़ा थोड़ा जेनेटिक अंतर है। इसी वजह से इसकी पूरी जेनेटिक

संरचना और हमला करने के तौर तरीकों को देखा परखा गया है। यह सारी कार्रवाई इस

सोच के साथ हो रही है ताकि इसकी पूरी प्रक्रिया को समझ लेने के बाद इसके उपचार की

कोई सर्वसम्मत तरीका तैयार किया जा सके। अभी भी कोरोना के संक्रमण से लोग ठीक

हो रहे है। अलग अलग देशों में अलग अलग दवा के इस्तेमाल से रोगियों को फायदा हो

रहा है। लेकिन कोई सर्वमान्य दवा अब तक नहीं बनायी गयी है। कई दवाइयों का

फिलहाल विश्वव्यापी क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है।

क्यों जानलेवा है उसके लिए इसकी बनावट को समझना होगा

इस वायरस की मूल प्रजाति के बारे में यह पहले से ही पता है कि यह मोर जैसी पक्षी से

लेकर ह्वेल जैसे विशाल समुद्री जीव तक पर हमला करता है। इस बार इसकी जेनेटिक

संरचना बदली है इसी वजह से यह अधिक खतरनाक हो चुकी है। अब तक जो कुछ

जानकारी मिल पायी है, उसके मुताबिक कोरोना वायरस का एक विषाणु जब इंसान के

शरीर में प्रवेश करता है तो अनुकूल परिस्थिति होते ही यह शरीर के अंदर तीस अलग

अलग संकेत प्रेषित करता है। इन तमाम संदेशों की जेनेटिक कड़ी को मिलाकर एक

वायरस अपनी वंशवृद्धि शुरु करता है और इंसान के फेफड़े की तरफ धीरे धीरे बढ़ने लगता

है। फेफड़े की स्थिति इस वायरस के तेजी से फैलने की अनुकूल होते ही इसकी वजह से

सांस लेने की दिक्कत शुरु हो जाती है। दरअसल वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि वायरस

के ऊपर आवरण बना प्रोटिन भी उसे बाहरी आक्रमण से बचाता है।

इंसानी शरीर वायरस का हमला समझकर तैयारी करता है

वरना इंसानी शरीर की आंतरिक बनावट ही कुछ ऐसी है कि किसी भी ऐसे वायरस का

संक्रमण होते ही शरीर के सफेद रक्त कण प्रतिरोधक बनाने में जुट जाते हैं। आम आदमी

की समझ में आने लायक शब्दों में वैज्ञानिकों ने बताया है कि यह वायरस अनुकूल

परिस्थिति में किसी स्प्रींग की तरह उछलता हुआ आगे बढ़ता है और अपनी संख्या भी

बढ़ाता है। जैसे जैसे इसकी ताकत बढ़ती है वैसे वैसे इंसान की परेशानियां भी बढ़ती जाती

है। लेकिन बिना सर्दी खांसी के भी इस विषाणु के संक्रमण के कारणों को अब तक

वैज्ञानिक समझ नहीं पाये हैं। इस संक्रमण से ठीक होने वाले रोगियों में फेफड़ों के

क्षतिग्रस्त होने की भी रिपोर्ट मिली है। जिसके बारे में माना गया है कि शरीर की अपनी

प्रतिरोधक शक्ति जब किसी दवा के प्रभाव में आकर अधिक शक्तिशाली प्रतिरोधक तैयार

करती है तो कई बार यह फेफड़े के अंदर छिपे विषाणु को मारने के लिए वहां अधिक मात्रा

में प्रवेश कर जाती है। इससे भी शायद इंसान रोग से तो मुक्त हो जाता है लेकिन इन

प्रतिरोधकों और विषाणु के युद्ध में उसका फेफड़ा क्षतिग्रस्त हो जाता है। अधिक संक्रमण

के दौरान इसी वजह से रोगियों को वेंटीलेटरों की जरूरत पड़ती है जो मनुष्य के सांस लेने

की प्रक्रिया को मशीनी तौर पर चालू रखता है। इसके बीच दवा का काम विषाणु का खात्मा

करना होता है।

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