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सड़क निर्माण में बेहतर तकनीक की जरूरत क्यों

सड़क निर्माण भी राष्ट्रीय विकास को रोकने में एक बहुत बड़ा बाधक

बना हुआ है। इसके लिए हमें बाहर कहीं जाने की जरूरत नहीं है। हम

अपने आस पास के इलाकों में ही सड़क निर्माण कैसा हो रहा है और वह

कितने दिनों तक टिक पा रही है, इसे साक्षात देख सकते हैं। केंद्रीय

मंत्री नीतीन गडकरी ने इसी मुद्दे पर बेहतर तकनीक के इस्तेमाल की

बात कही है। उनका संकेत जिस तरफ है, वह सर्वविदित सत्य है।

सड़क निर्माण और उसकी बार बार मरम्मत के बहाने जो गोरखधंधा

चलता है, उसे तो बच्चा बच्चा जानता है। लेकिन जो बात हम समझ

नहीं पाते हैं वह यह है कि इस बार बार की मरम्मती पर होने वाले खर्च

की वजह से हमारे राष्ट्रीय विकास अवरुद्ध होता है। जाहिर है कि इन

तमाम कार्यों में भ्रष्टाचार और कमिशनखोरी है। जिसकी वजह से लोग

यह काम निरंतर जारी रहे, ऐसी ही चाह रखते हैं। लेकिन चंद लोगों की

जेबों में पैसा जाने से राष्ट्रीय विकास तो नहीं हो जाता। भले ही वह

व्यक्ति अथवा कंपनी सत्ता को चंदा के तौर पर करोड़ों रुपया क्यों न

देता हो लेकिन यह सच है कि वह यह दान अपनी जेब से नहीं बल्कि

जनता की जेबों पर डाले गये डाके से मिले पैसों से देता है। नतीजा

होता है कि राष्ट्रीय कोष में अन्य विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धन

का अभाव हो जाता है। श्री गडकरी के इस बयान को इसी संदर्भ में

गंभीरतापूर्वक समझने की जरूरत है। इसी क्रम में एक तुलना

प्रासंगिक है कि दिल्ली की सरकार ने तमाम किस्म की रियायतों के

बाद भी मुनाफे का बजट कैसे बना लिया, इस बात का उत्तर तो अभी

और पहले सरकार में रहे लोगों को देना चाहिए।

सड़क निर्माण का गोरखधंधा कोई रॉकेट साइंट नहीं है

वहां के अनेक निर्माण कार्यों की लागत अपने आप ही कम हो गयी जो

यह बताती है कि इस किस्म के कार्यों के प्राक्कलन में जबर्दस्त गड़बड़ी

होती है। झारखंड के संदर्भ में बात करें तो यहां इस किस्म की गड़बड़ी

आवश्यकता से अधिक है। इसे समझने के लिए यह देख लेना चाहिए

कि प्राक्कलित धनराशि से 20 या 30 प्रतिशत कम दर पर काम लेने

वाला ठेकेदार भी फायदा कैसे कमाता है। अनेक विशेषज्ञों ने झारखंड

के संदर्भ में बार बार यह बात कही है कि यह इस किस्म के कार्यों का

जो प्राक्कलन तैयार किया जाता है, वह वास्तविकता से काफी अधिक

होता है। इसी वजह से जब कोई ठेकेदार कम रेट पर भी काम करता है

तो उसे घाटा तो कतई नहीं होता। दिल्ली की सरकार ने प्राक्कलन के

इस गोरखधंधे को सिर्फ इसलिए कम करने में सफलता पायी क्योंकि

वहां कमिशनखोरी न्यूनतम स्तर पर चली गयी। इसी वजह से निर्माण

कार्यों की लागत भी कम हुई। जो यह साबित कर देता है कि मुफ्त की

दो सौ यूनिट बिजली और अन्य लाभ देने के साथ साथ महिलाओं को

मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देने के बाद भी सरकार फायदे में रह सकती

है। इस सच्चाई को अन्य राजनीतिक दल समझते तो हैं पर स्वीकार

नहीं करते। अपनी खुली आंखों से जो सच्चाई दिख रही है, उसे अब

राष्ट्रीय हित में सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने की जरूरत है।

सड़क निर्माण की अपनी निर्धारित गुणवत्ता तय है। झारखंड में

निर्माण की लागत बढ़ने के बाद भी सड़कों की गुणवत्ता में अगर

सुधार नहीं हो पाया है तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान

करना भी कोई कठिन कार्य नहीं है।

मकड़जाल ही हेमंत सरकार की असली परेशानी है

कठिन कार्य है उस मकड़जाल को तोड़ने का, जो बिहार के समय से पूरे

तंत्र को जकड़ रखा है। इस तंत्र में नीचे से ऊपर तक सभी शामिल हो

जाते हैं। इसी व्यवस्था को बदलने के लिए सरकारी स्तर पर जानकार

विशेषज्ञों को काम में लगाने की जरूरत है। ऐसे विशेषज्ञ निश्चित तौर

पर महंगी सलाह देंगे लेकिन उनकी सलाह के तमाम ऐसे कामों की

गुणवत्ता सुधरेगी और लागत भी कम होगी। इससे सरकार पर इस

अतिरिक्त खर्च को कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा उल्टे इससे बचत भी

होगी। जैसा कि वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा है कि वह

वास्तविकता पर आधारित बजट के पक्ष में हैं। यदि वाकई ऐसा हो

पाया तो इस बार का बजट निश्चित तौर पर पूर्व के बजटों से बहुत

अलग होगा क्योंकि अब तक इस गंभीर विषय को भी आंकड़ों का खेल

बनाकर छोड़ दिया गया था। सड़क निर्माण हो तो उसके टिके होने के

लिए कमसे कम सात वर्षों की गारंटी तो होनी चाहिए क्योंकि अन्य

राज्यों में यह प्रथा चली आ रही है। उसके पहले अगर सड़क टूटती है

तो इस सड़क निर्माण का बिल पारित करने वाले कमिशनखोरों की

पहचान भी कोई कठिन कार्य नहीं है। दो चार ऐसे भ्रष्ट लोग जब दंडित

होंगे तो अपने आप यह गोरखधंधा बंद हो जाएगा।

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