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पूरी दुनिया जिस कार्बन उत्सर्जन पूरी तरह रोका जा सकता है




  • बर्कले लैब और सॉन फ्रांसिसको विश्वविद्यालय ने मॉडल बनाया

  • वर्ष 2050 तक लक्ष्य हासिल करना संभव होगा

  • अब साफ बिजली उत्पादन बढ़ाना आवश्यकत है

  • अमेरिका में होने के बाद शेष देश अपना लेंगे

राष्ट्रीय खबर

रांचीः पूरी दुनिया जिस प्रदूषण और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, उसका एक मुख्य

कारण कार्बन उत्सर्जन ही है। कल कारखानों से निकले कार्बन डॉईऑक्साइड से अनेक

किस्म की परेशानियां खड़ी हो चुकी हैं। जैसे जैसे आबादी बढ़ी है और विकास के नाम पर

अधिक प्रदूषण फैला है, वैसे वैसे पूरी दुनिया का संतुलन भी बिगड़ता चला गया है। अब तो

हालत यह है कि उत्तरी ध्रुव पर इतनी तेजी से बर्फ पिघल रहे हैं कि उनकी भरपाई भी नहीं

हो पा रही है। अब वैज्ञानिकों ने इसका भी समाधान तलाशने का रास्ता सुझाया है। इन

वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे न सिर्फ कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है


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बल्कि पूरी तरह रोकने के बाद वर्तमान स्थिति को पहले की तरह और बेहतर भी बनाया

जा सकता है। आम भाषा में अभी पृथ्वी के वायुमंडल में जितना कार्बन मौजूद है, उसे भी

इन्हीं प्रयासों की बदौलत कम भी किया जा सकता है। इसके माध्यम से वर्ष 2050 तक

पूरी स्थिति को बदलने तक का दावा वैज्ञानिकों ने किया है। वैसे कोरोना लॉकडाउन में जब

पूरी दुनिया जिस कोरोना संकट की वजह से थम गयी है, सारे कल कारखाने अचानक से बंद

गये थे तो दुनिया में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा में रातों रात 17 प्रतिशत की कमी दर्ज की गयी

थी। कोरोना लॉकडाउन का वह दौर पर्यावरण के लिए बहुत फायदेमंद साबित हुआ है।

पूरी दुनिया जिस संकट से परेशान है, उसे ऐसे दूर करेंगे 

लॉरेंस बर्कली नेशनल लैब और सॉन फ्रांसिसको विश्वविद्यालय के शोध दल ने इस पर

काम किया है। वे रिन्यूएबल एनर्जी की बदौलत प्रदूषण को कम करने के साथ साथ कार्बन

की स्थिति को सुधारने के विषय पर अनुसंधान कर रहे हैं। उनका आकलन है कि प्रति

व्यक्ति एक डॉलर के दर पर यह काम किया जा सकता है। सारा कुछ देख समझ लेने के

बाद इस दल ने उनका एक मॉडल भी तैयार किया है, जिसमें विस्तार से सारी बातों का

जिक्र किया गया है। यह शोध उस परिस्थिति में सामने लायी गयी है जबकि वैश्विक स्तर

पर कार्बन उत्सर्जन को वर्ष 2050 तक शून्य करने का लक्ष्य तय किया गया है।


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इस नये शोध में बताया गया है कि इस विधि से ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति मे सुधार होगा

और पृथ्वी का निरंतर बढ़ता तापमान भी रोका जा सकेगा। इससे जो कुछ बदलाव मौसम

में देखे जा रहे हैं, उन्हें भी फिर से पटरी पर लाने में मदद मिलेगी। इस मॉडल का पहला

स्वरुप ताप विद्युत पर निर्भरता को पूरी तरह समाप्त कर देना है क्योंकि ताप बिजली

उत्पादन संयंत्रों में कोयला जलने से जो ताप और प्रदूषण होता है, वह वर्तमान में सबसे

अधिक परेशान करने वाली बात है। इसके लिए वायु और सौर ऊर्जा तकनीक से बिजली

उत्पादन की बात कही गयी है। वैसे यह भी बताया गया है कि जब गैर परंपरागत बिजली

उत्पादन बढ़ाया जाए तो उनके साथ ही हवा से कार्बन सोखने की विधि को अवश्य ही

शामिल किया जाए। इससे जहां जहां ऐसे संयंत्र स्थापित होंगे, वहां वहां कार्बन सोखने का

काम भी स्वतः होता चला जाएगा। अमेरिका में इसके माध्यम से शून्य कार्बन उत्सर्जन के

लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, जिसमें बहुत कम समय लगना है। इस शोध को

साइंटिफिर जर्नल एजीयू एडवांसेज में प्रकाशित भी किया गया है।

स्वच्छ बिजली के लिए सारे प्रबंध करने होंगे

इस बारे में बर्कले लैब के वरीय वैज्ञानिक मार्गरेट थोर्न ने कहा कि इस मॉडल को अपनाने

का अर्थ है कि वर्ष 2050 के आने तक हमें अनेक गिगावॉट बिजली उत्पादन की नई

व्यवस्था करनी पड़ेगी। इसके लिए बड़े बड़े हवा और सौर ऊर्जा चालित विद्युत उत्पादन

केंद्र भी बनाने होंगे। नये किस्म की बिजली लाइनें बिछानी होंगी। इसके साथ ही वायुमंडल

में कार्बन छोड़ने वाले वाहनों की भी बदल देना होगा और उनके स्थान पर इलेक्ट्रिक से

चलने वाले बेहतर किस्म के वाहनों का निर्माण और इस्तेमाल करना होगा। पानी गर्म

करने की पारंपरिक विधि को त्यागकर सौर ऊर्जा से पानी गरम करने के संयंत्रों का

इस्तेमाल करना होगा क्योंकि उनमें भी बहुत अधिक बिजली की खपत होती है। शोध दल

ने इस बदलाव के लिए होने वाले खर्च का भी आकलन कर बताया है कि यह अमेरिका में

पूरी तरह लागू करने के लिए वहां की जीडीपी का 02 से लेकर 1.2 प्रतिशत तक हो सकता

है। अकेले अमेरिका में इसके लिए सोलह अलग अलग भौगोलिक इलाकों की पहचान की

गयी है, जिनमें एक साथ यह बदलाव प्रारंभ किया जा सकता है। शोध दल का यह भी

आकलन है कि जब अमेरिका में यह प्रयोग बढ़ जाएगा तो पूरी दुनिया को इसके फायदे

बताने के लिए अलग से प्रयास नहीं करने पड़ेंगे। एक विकसित देश होने की वजह से

अमेरिका में होने वाले बदलावो को वैसे ही अन्य देश अपना लेते हैं क्योंकि उन्हें यह पता

होता है कि इसमें भी कोई न कोई फायदा ही है। साथ ही यह पूरी तकनीक पहले से जानी

पहचानी है, इसलिए दुनिया के अन्य भागों के लोगों को इसे अपनाने में कोई दिक्कत भी

नहीं होगी।


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