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अंतरिक्ष से पूरा हिमालय नजर आ रहा है सोने से मढ़ा हुआ

  • पहले भी पृथ्वी पर समाप्त हुआ है जीवन

  • हर बदलाव के बाद क्रमिक विकास आगे बढ़ा

  • जमीन और पानी में भी लगातार हुए परिवर्तन

  • पृथ्वी पर हुए बदलाव पर वैज्ञानिक बहस तेज

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः अंतरिक्ष से पूरा हिमालय इतना साफ नजर आ रहा है कि यह चर्चा का विषय

बन गया है। वैज्ञानिक इस तस्वीर को देखकर प्रसन्न है। इस तस्वीर में पूरी पर्वत श्रृंखला

किसी सोने से मढ़े हुआ जैसी नजर आ रही है। सूर्य की रोशनी में यह इसी तरह चमकती

है। आम तौर पर कोलकाता से दिल्ली की विमान यात्रा के दौरान भी सोने से मढ़े हुए इस

पर्वत श्रृंखला को देखा जा सकता है। लेकिन यह तभी नजर आता है जब आसमान पूरी

तरह साफ हो।

अंतरिक्ष से इस घटना को देखे जाने के बाद वायुमंडल के सुधरने की चर्चा के साथ साथ

पृथ्वी पर जीवन के नष्ट होने की अनेक घटनाओं की जानकारी का भी उल्लेख हो रहा है।

समझा जाता है कि पृथ्वी पर जल से जीवन की उत्पत्ति होन के बाद अलग अलग कारणों

से जीवन यहां समय समय पर तबाह होता रहा है। इसी तबाही की वजह से ही शायद

जीवन के क्रमिक विकास की गाड़ी भी आगे बढ़ी है और अलग एक कोष के एमिवा से

अनेक किस्म के जीव जंतु पैदा हुआ है।

अब दक्षिण अफ्रीका से भी इसके नये प्रमाण मिले हैं। जिसमें एक पर्वत के अलग अलग

हिस्से में अलग अलग कालखंड के जीवन का प्रमाण मौजूद हैं। वैसे ऑस्ट्रेलिया के इलाके

में भी खुदाई के दौरान अलग अलग समय के फॉसिल्स पहले ही मिल चुके हैं।

अंतरिक्ष के स्पेस स्टेशन से खींची गयी है तस्वीर

दरअसल अंतरिक्ष में स्थापित स्पेस स्टेशन से पृथ्वी का नजारा बदला बदला नजर आने

के बाद इस पर चर्चा अधिक हो रही है। दरअसल वहां से हिमालय पर्वत श्रृंखला की एक

शानदार और साफ तस्वीर खींची गयी है। जिसके बाद से वायुमंडल के बहुत साफ हो जाने

की बात पर बहस होने लगी है। इस तस्वीर में पूरी हिमालय की पर्वत श्रृंखला सोने से मढ़ी

हुई नजर आ रही है।

अलग अलग काल के जीवन के होने और किन्हीं कारणों से समाप्त हो जाने की वजह से

जमीन के अलावा पानी के अंदर का भी जीवन चक्र बदला है। शायद इसी परिवर्तन की

वजह से नभचरों यानी पक्षियों की प्रजातियों में भी बदलाव हुए हैं। इसकी एक वजह पृथ्वी

के अंदर के इको सिस्टम के बदलने को भी माना जा रहा है। धरती पर अचानक से हुए इस

बदलाव के दौर में जो प्राणी इस बदलाव के मुताबिक खुद को ढाल नहीं पाये वे अंततः

विलुप्त हो गये हैं। दूसरी तरफ पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे बदलाव के साथ साथ खुद को

बदलने की कोशिशों में जीवन की भी संरचना बदली है। समझा जाता है कि उल्कापिंड की

बारिश के अलावा पृथ्वी के पर्यावरण में हुए बदलाव की वजह से ही कई बार पानी के 95

प्रतिशत जीवन पूरी तरह समाप्त हो गये थे। जमीन पर भी मौजूद जीवन का 70 प्रतिशत

इन्हीं कारणों से समाप्त हो गया था।

पृथ्वी पर विनाश के बाद विकास का प्रक्रिया सतत है

शोधकर्ता मानते हैं कि प्राचीन काल से ही पृथ्वी पर जीवन के विकास की कहानी कुछ इसी

तरीके से लिखी और रची जा रही है। हर काल खंड में एक बार तबाही आने के बाद पृथ्वी के

जीवन का स्वरुप बदलता है। दूसरी तरफ पृथ्वी भी खुद में तब्दीली कर इसे और आगे

बढ़ाती जाती है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि उल्कापिंडों के आ गिरने से जो तबाही आती है वह अचानक होती

है। इसके बाद उल्कापिंड गिरने से जो बदलाव की प्रक्रिया प्रारंभ होती है, वह हजारों वर्षों

तक चलती रहती है। इस दौरान पृथ्वी में अनेक बार ज्वालामुखी विस्फोटों का एक

सिलसिला सा प्रारंभ हो जाता है। कई बार विध्वंस का यह क्रम दस हजार साल से अधिक

समय तक चलता है। उसके बाद जीवन की गाड़ी दूसरे रास्ते से आगे बढ़ने लगती है।

अभी अंतरिक्ष से पृथ्वी के माहौल को बदलते देखकर वैज्ञानिक इस सिद्धांत पर फिर से

अधिक चर्चा कर रहे हैं। समझा जा रहा है कि पूरी दुनिया में कोरोना के प्रकोप से जिस

तरीके से जनजीवन ठहर गया है, उससे पर्यावरण पर बेहतर प्रभाव पड़ा है। आसमान

काऊपरी सतह न सिर्फ साफ हो गया है बल्कि ओजोन की जिस पर्त में छेद हुआ था, वह

भी तेजी से भरता जा रहा है। वैसे वैज्ञानिक मानते हैं कि ओजोन की पर्तों में सुधार का

दूसरा कारण भी हो सकता है। लेकिन यह तय है कि प्रदूषण कम होने की वजह से अब

अंतरिक्ष से पृथ्वी ज्यादा साफ नजर आने लगी है।

जो कुछ दिख रहा है उनमें कोई सीधा संबंध तो नहीं

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोध वैज्ञानिक सिंडी लुई कहते हैं कि कई बार यह

बदलाव एक दूसरे से सीधे तौर पर जुडा हुआ नहीं होने के बाद भी एक दूसरे का सहायक

होता है। जिस तरीके से साइबेरिया में उल्कापिंड विस्फोटों के बाद स्थिति बदली तो उत्तरी

और दक्षिणी गोलार्ध के समीकरण भी बदल गये थे। इससे पृथ्वी पर मौजूद जीवन का

अधिकांश हिस्सा खत्म हो गया था और शेष में भी तब्दीली आयी थी। लेकिन जमीन पर

जीवन के बदलाव और पानी के जीवन के बदलाव का कोई सीधी संबंध नहीं है। इसके बाद

भी वैज्ञानिक मानते हैं कि हो सकता है कि एक सतह पर होने वाले बदलाव की वजह से

पृथ्वी के दूसरे सतह के जीवन पर भी इसका कोई असर पड़ता हो, जिसकी पहचान अब

तक नहीं हो पायी है।


 

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