लोकसभा चुनाव का मुद्दा कौन तय करेगा इस बार

लोकसभा चुनाव में टूटती भाषा की मर्यादा
Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है।

यूं तो पहले से ही सभी दल इसकी तैयारियों में जुटे हुए थे।

लेकिन चुनाव आयोग द्वारा औपचारिक तौर पर इसकी घोषणा होते ही

प्रचार का रुख और अधिक आक्रामक हो गया।

युद्ध अब तक जमीनी स्तर पर नहीं उतरा है।

फिर भी खास तौर पर सोशल मीडिया में इस युद्ध की गति तेज हो गयी है।

निश्चित तौर पर इस युद्ध में अब भी भाजपा काफी आगे हैं।

लेकिन पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार दूसरे दल भी इस सोशल मीडिया युद्ध को

न सिर्फ समझ रहे हैं बल्कि अपने अपने तरीके से हमला भी कर रहे हैं।

इसके बीच ही असली मुद्दा यह निकलकर आ रहा है कि इस बार के चुनाव का मुख्य एजेंडा क्या होगा।

किन मुद्दों पर मतदाता अपना जनादेश सुनायेंगे।

इस मुद्दे को राजनीतिक दल भले ही गंभीरता से नहीं ले रहे हैं लेकिन यह सच है कि

आम मतदाताओं की अपनी अपनी प्राथमिकताएं इस बार राजनीतिक दलों से भिन्न हैं।

पिछले चुनाव में मतदाताओं का रुख सीधे तौर पर कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनादेश देने का था।

इसी वजह से भाजपा को नरेंद्र मोदी की अगुवाई मे उम्मीद से कहीं अधिक जनसमर्थन प्राप्त हुआ था।

लेकिन यह मुद्दा अब जनता के बीच प्राथमिकता के शीर्ष पर नहीं है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि भाजपा भी राफेल सहित कई मुद्दों पर आरोपों से घिर चुकी है।

साथ ही जिन मुद्दों पर कार्रवाई का वादा कर वह सरकार में आयी थी,

उनमें से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वह कुछ भी नहीं कर पायी है।

जिनलोगों को चुनाव के तुरंत बाद ही जेल भेजने की बात कही गयी थी, वे अब भी बाहर घूम रहे हैं।

इसलिए कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार प्रचार के बाद सत्ता में आयी

भाजपा इस मुद्दे पर खुद को सही साबित नहीं कर पायी है।

राजनीतिक बहस का मूल दलों के बीच पुलवामा और बालाकोट हो सकता है।

लेकिन आम आदमी नोटबंदी की उपलब्धियों और अपनी जरूरतों के हिसाब से

इस सरकार से जवाब मांग रहा है।

यह स्थिति भाजपा को परेशानी में डालने वाली है।

यह सिर्फ कहने की बात है कि जनता ने हरेक के खाते में पंद्रह लाख आने के वादा को

जुमला समझकर भूला दिया है

लेकिन सच्चाई यह भी है कि जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग इसे अपने साथ किया गया छल मानता है।

क्योंकि नोटबंदी के नाम पर जिस कालाधन के बाहर आने की बात कही गयी थी,

वह काला धन जनता की आंखों के सामने नजर नहीं आ रहा है।

राजनीतिक दल लड़ाई को जिस आयाम पर लड़ रहे हैं,

देश की जनता उस आयाम पर अपनी प्राथमिकताओं को देख ही नहीं पा रही है।

अलबत्ता इनदिनों कई प्रमुख सामाजिक संगठनों ने बड़ी मजबूती से इस पक्ष को उठाया है।

यह समझने वाली बात है कि पांच साल की उपलब्धियों और विफलताओं पर

वर्तमान सरकार से ही सवाल किये जाते हैं। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है।

लेकिन मीडिया का भी एक वर्ग इसमें निजी एजेंडा सेट कर रहा है

जिसका असर बड़ी तेजी से समाप्त होता नजर आ रहा है।

भले ही मीडिया का एक प्रभावशाली वर्ग इस सच को स्वीकार न करें

लेकिन यह तय हो चुका है कि अब जनता का एजेंडा मीडिया तय नहीं कर पा रही है।

इसका दूसरा निष्कर्ष यही निकलता है कि जनता ने सोशल मीडिया में चल रहे युद्ध के

बीच अपनी प्राथमिकताओं को निर्धारित करने का नया रास्ता भी तलाश लिया है।

वैसे इस सोशल मीडिया के युद्ध में यह बात अब खुलकर सामने आ रही है कि

यह युद्ध पिछली बार कैसे लड़ा गया था।

चूंकि तब यह नई तकनीक थी, इसलिए लोग इसके पीछे के खेल को समझ नहीं पाये थे।

इस बार भी सोशल मीडिया वार के तहत नये नये चेहरों अथवा गुमनाम चेहरों के मार्फत

जनता के बीच जो कुछ परोसने की कोशिशें हो रहीं हैं, उसका प्रभाव हो भी रहा है अथवा नहीं,

यह राजनीतिक दलों को समझना है।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक इस बार डेढ़ करोड़ नये मतदाता

पहली बार चुनावी समर में हिस्सा लेने वाले हैं।

जाहिर है कि उनकी अपनी प्राथमिकताएं कुछ और होंगी।

नौकरी, रोजगार और किसानों के साथ साथ ग्रामीण भारत के मुद्दों पर

कौन सा दल क्या कुछ नया लेकर आ रहा है, यह देखना रोचक होगा।

साथ ही जो नया सवाल नये और सोशल मीडिया से निरंतर संपर्क रखने वाले मतदाताओं का है,

वह भी बिल्कुल नई बात है।

वे नेतृत्व के साथ साथ अब प्रत्याशी के काम काज का भी मूल्यांकन कर रहे हैं।

यह अपने आप में नई बात है, जिसका अंदाजा शायद राजनीतिक दलों को पहले से नहीं था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.