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पिगासूस की जासूसी के असली मायने क्या हैं

पिगासूस की जासूसी के असली मायने क्या हैं

पिगासूस की जासूसी वैश्विक स्तर पर चर्चा में आ गयी। कुछ इसी तरह की स्थिति

विकिलिक्स के खुलासे के बाद भी हुई थी। लेकिन यह याद रखने लायक बात है कि

विकिलिक्स के खुलासे के बाद रक्तरंजित विद्रोह में कई तानाशाहों को जनता ने खुलेआम

चौराहों पर फांसी पर लटका भी दिया था। इस किस्म की जासूसी का मामला अब चर्चा में

इसलिए है क्योंकि बड़े मीडिया संस्थानों ने मिलकर एक साथ हमला बोला है। वरना यह घटना

को दो वर्ष पुरानी है और सऊदी अरब के बागी पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या में इसकी

भूमिका पूर्व प्रमाणित है। कूटनीतिक कारणों से अमेरिका ने सब कुछ जानते हुए भी इस

मामले को तूल देना मुनासिब नहीं समझा। अब पता चल रहा है कि इस साफ्टवेयर को कुछ

इस तरीके से बनाया गया है कि यह अमेरिकी मोबाइल नंबरों पर काम नहीं करता है। लेकिन

अगर वही मोबाइल किसी दूसरे देश में चला जाए तो यह जासूसी साफ्टवेयर उसमें घुसपैठ कर

सकता है। दूसरे शब्दों में इजरायली कंपनी की जासूसी के इस हथियार को अमेरिकी हितों को

ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया है। वैसे भी यह कहना प्रासंगिक होगा कि चीन के वुहान

शहर के जिस प्रयोगशाला को हम कोरोना वायरस फैलाने के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं, उस

प्रयोगशाला को अमेरिकी प्रशासन ने भी आर्थिक मदद पहुंचायी है। इस बार पिगासूस पर चर्चा

इसलिए है क्योंकि कई देशों के मीडिया संस्थानों, एमनेस्टी इंटरनैशनल और कई साइबर-

सुरक्षा संगठनों की एक साझा जांच में कई देशों की सरकारों द्वारा अपने नागरिकों की

गैरकानूनी ढंग से निगरानी करने का खुलासा किया है। इस जांच में जासूसी सॉफ्टवेयर

पेगासस के निशाने पर रहे लोगों की पड़ताल की गई।

पिगासूस की जासूसी पर कौन सही है और कौन गलत

इसमें भारत के भी करीब 40 पत्रकार, कुछ सांसद, न्यायाधीश एवं अन्य प्रमुख लोगों की

निगरानी किए जाने की बात पता चली है। अपने फोन को जांच के लिए देने पर सहमत हुए

सात भारतीय नागरिकों के फोन पेगासस सॉफ्टवेयर से संक्रमित पाए गए हैं। पेगासस

इजरायली फर्म एनएसओ द्वारा विकसित एक सॉफ्टवेयर है जिसका इस्तेमाल निगरानी

रखने के लिए किया जाता है। इसे किसी भी व्यक्ति के मोबाइल फोन में चोरी-छिपे डाउनलोड

कर दिया जाता है जिसके बाद उस फोन के सारे डेटा तक पहुंच हो जाती है और उस व्यक्ति के

फोन पर होने वाली सारी बातचीत को सुना, चैट को पढ़ा एवं ब्राउजिंग को खंगाला जा सकता

है। इसे बनाने वाली फर्म एनएसओ कहती है कि वह सिर्फ सरकारी एजेंसियों को ही इसकी

बिक्री करती है और इस बिक्री अनुबंध में यह प्रावधान भी रखा जाता है कि इसका इस्तेमाल

सिर्फ संदिग्ध अपराधियों या आतंकी गतिविधियों के मामलों में ही किया जा सकता है।

लेकिन व्यवहार में इस प्रावधान को लागू नहीं किया जा सकता है। एक बार सॉफ्टवेयर मिल

जाने के बाद खरीदार उसे अपनी मर्जी से इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि एनएसओ

संभावित खरीदारों की पुष्टि कर यह परख सकता है कि खरीदने की मंशा रखने वाली एजेंसी

सरकारी है या नहीं। वैसे एनएसओ अपने खरीदारों की सूची नहीं देती है। उसने 40 देशों में

अपने 60 ग्राहक होने का दावा किया है। एनएसओ के मुताबिक उसके सॉफ्टवेयर को मुख्य

रूप से कानून लागू करने वाली खुफिया एजेंसियों के साथ-साथ सेना भी इस्तेमाल करती है।

देश के अंदर किसी बाहरी एजेंसी का तर्क भरोसेमंद नहीं

इसलिए जासूसी नहीं होने की दलील देने वाली केंद्र सरकार को यह बताना चाहिए कि इसकी

खरीद में आम जनता का कितना पैसा खर्च हुआ है और उसका वास्तविक लाभ देश को हुआ है

अथवा सत्ता पर बैठे किसी खास व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए देश का पैसा लुटाया गया

है। यह भी साफ हो चुका है कि पिगासूस का यह साफ्टवेयर बहुत महंगा है और एक

साफ्टवेयर लाईसेंस से सिर्फ पचास लोगों के फोन तक पहुंच बनती है। अब भारत में कितने

ऐसे लाइसेंस खरीदे गये थे, इसका खुलासा भी आज नहीं तो कल हो ही जाएगा। तब आज के

दौर मे सफाई देने वालों का तर्क क्या होता है, यह देखने लायक बात होगी। प्राप्त जानकारी के

मुताबिक एनएसओ इस ढांचे को खड़ा करने और सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल के लिए लोगों को

प्रशिक्षण देने में भी मदद करती है। सॉफ्टवेयर को इंस्टॉल करने एवं दी जाने वाली सेवा के

लिए वह करीब 3.5 लाख डॉलर भी अलग से वसूलती है। हालांकि एनएसओ कहती है कि वह

खुद निगरानी नहीं करती है और उसे पता नहीं होता है कि निगरानी से क्या कुछ सामने आ

रहा है। इसलिए पिगासूस की जासूसी नहीं होने की सफाई देने वालों को सच्चाई का सामना

करते हुए यह बताना चाहिए कि उनलोगों ने जनता की कमाई का कितना पैसा इस

व्यक्तिगत लाभ की जासूसी के लिए खर्च किया है और इस किस्म की अनधिकृत जासूसी के

लिए कौन जिम्मेदार है।

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