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वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां मैं पैदल चलते मजदूरों की बात कर रहा हूं

वहां कौन है तेरा मुसाफिर स्पष्ट शब्दों में उनलोगों को समर्पित हैं जो पैदल सैकड़ों मील

का सफर तय कर अपने गांव की तरफ बढ़े चले जा रहे हैं । आम तौर पर रविवार के दिन

हल्की फुल्की बातों का उल्लेख एक अभ्यास है । लेकिन कई बार जिंदगी भी कठिन परीक्षा

ले आती है । हर दिन हजारों की संख्या में गांव की तरफ लौटते मजदूरों को देखकर आज

हल्की बातें करने का मन भी नहीं कर रहा है । इसलिए पहले ही स्पष्ट कर दे रहा हूं कि

आज का यह लेख गंभीर प्रवृत्ति का है । जिन्हें आज के दिन इस कॉलम में हल्की बात

पढ़ने की आदत है, वे इसे बिना पढ़े आगे बढ़ सकते हैं ।

आजादी से इतने दिनों बाद हम चलें तो आखिर कहां पहुंचे । क्या यही हमारी तरक्की है

कि दुनिया की अधिकांश संपत्ति चंद घरानों के हाथों कैद है और आम आदमी वैश्विक

संकट में भीखमंगा सा बना हुआ है । खैर दुनिया की बात छोड़ दें तो अपने देश की बात करें

तो दुष्यंत कुमार की कालजयी कविता सबसे पहले याद आ रही है । उन्होंने लिखा था-

कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए, यहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

खैर भला हो कोरोना का, जिसने हमें इस कड़वी सच्चाई का आईना दिखाने का मौका दे

दिया । वरना आज तक पता ही नहीं चल पाता कि देश की असली जनता विकास के

पायदान में कहीं है ही नहीं । सब कुछ सिर्फ चंद लोगों के लिए हैं । यह अनुभव शायद देश

को बदलने की दिशा में कोई नया रास्ता ही तैयार कर दें ।

हो सकता है यह हाल देश की राजनीति को ही बदल दे

लेकिन इस क्रम में जो लोग घर लौट रहे हैं, उन्हें देखकर भी एक फिल्मी गीत याद आ रहा

है । अपने जमाने की सुपर सुपर हिट फिल्म थी गाइड । नई पीढ़ी के जिनलोगों ने इसे नहीं

देखा है, उन्हें एक बार अवश्य देख लेना चाहिए । यह जिंदगी के अलग अलग रंगों को

फिल्मी पर्दे पर जीवंत करने में देवानंद के अभिनय कौशल का एक बेमिशाल प्रदर्शन है ।

जिस गीत की चर्चा कर रहा हूं उसे लिखा था शैलेंद्र ने और संगीत में ढाला था सचिन देव

वर्मन साहब ने । वैसे गीत के धून से ही स्पष्ट हो जाता है कि यह सचिन दादा की धून है ।

इस गीत को उन्होंने खुद ही स्वर भी दिया था । शायद इसी वजह से यह गीत भी अमर हो

गया । गीत के बोल इस तरह हैं ।

वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां
दम लेले घड़ी भर, ये छैयां, पायेगा कहां
वहां कौन है तेरा …

बीत गये दिन, प्यार के पल छिन
सपना बनी वो रातें
भूल गये वो, तू भी भुला दे
प्यार की वो मुलाक़ातें प्यार की वो मुलाक़ातें
सब दूर अन्धेरा, मुसाफ़िर जायेगा कहां …

कोइ भी तेरी, राह न देखे
नैन बिछाये ना कोई
दर्द से तेरे, कोई न तड़पा
आँख किसी की ना रोयी आँख किसी की ना रोयी
कहे किसको तू मेरा, मुसाफ़िर जायेगा कहां …

तूने तो सबको राह बताई
तू अपनी मंज़िल क्यों भूला
सुलझाके राजा औरों की उलझन
क्यों कच्चे धागों में झूला
क्यों नाचे सपेरा मुसाफ़िर, जाएगा कहां

कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी
पानी पे लिखी लिखायी
है सबकी देखी, है सबकी जानी
हाथ किसीके न आयी हाथ किसीके न आयी 
कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफ़िर जायेगा कहां

वहां कौन है तेरा ..

आश्वासनों के बीच फिर से राजनीति का गंदा खेल होता हुआ साफ साफ नजर आ रहा है ।

शायद लॉक डाउन की वजह से जिस तरह माहौल साफ हुआ है, उसी तरह इसी लॉक डाउन

ने दिमाग को भी साफ कर दिया है । बहुत कुछ समझ में आ रहा और इससे आगे का

रास्ता तय होगा, यह भी स्पष्ट होता जा रहा है ।

कोई मानें या न माने आम हिन्दुस्तानी अपने आप में बहुत जीवट होता है । संकट की घड़ी

में वह कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेगा । हमारी पारंपरिक सामाजिक सोच इसमें काम

आने जा रही है । लेकिन जो लोग सत्ता के शीर्ष पर बैठकर देश के दो प्रतिशत लोगों का ही

फायदा देख रहे हैं, उन्हें सबक सीखाने का मौका भी यह कोरोना ही दे गया है । जहां से

मजदूर भगाये गये, वहां आगे काम कैसे होगा, यह देखने लायक बात होगी । दूसरी तरफ

अपने गांव लौट रहे मजदूर गांव में क्या कमाल कर पायेंगे, यह भी देखने लायक बात होगी

। दोनों ही परिस्थितियों में शून्य तो कभी नहीं बना रहेगा । लेकिन इस शून्यता को भरा

कैसे जाएगा, यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा ।

हमारी पैदाइश के पहले देश का विभाजन हो चुका था लेकिन तब की तस्वीरों को अब की

परिस्थिति से मिलाकर देखता हूं तो एहसास हो रहा है कि अरे मुसाफिर यहां कौन है तेरा ।


 

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