झारखंड में हजार करोड़ की नक्सली लेवी के कौन कौन हिस्सेदार

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  • एनआइए की जांच में उलझे गये हैं कई बड़े नाम

  • जांच दल के एक एसपी रातों रात बदला गया

  • डीएसपी ने भी धो लिये हैं बहती गंगा में हाथ

  • दुर्गापुर के ऐशगाह को जान गये हैं सभी

संवाददाता

रांचीः झारखंड के एक खास इलाके से अब नक्सलियो के नाम पर साल में करीब एक हजार करोड़ की लेवी की वसूली हो रही है।

इस मामले की जांच में डेढ़ सौ रुपये प्रति ट्रक वसूली का आंकड़ा पहले से ही सार्वजनिक हो चुका है।

इस मामले की एनआइए जांच में कई रोचक तथ्य ऐसे फाइलों में दर्ज हो चुके हैं,

जो बड़े लोगों के लिए बाद में परेशानी का सबब बन सकते हैं।

यूं तो पुलिस ने ही इस मामले की जांच में वसूली करने वालों से लेकर पैसा जमा करने वालों तक की पहचान कर ली थी।

एनआइए ने इसके आगे की जांच में इस पैसे से लाभान्वित होने वालों के बारे में जानकारी हासिल की है।

घोषित तौर पर इस कारोबार में दो अग्रवाल और एक गुप्ता का नाम तो दर्ज हो चुका है।

लेकिन एनआइए की जांच में इन तीनों से फायदा लेने वाले राजनीतिज्ञों,

उनके रिश्तेदारों और पुलिस के बड़े अधिकारियों के भी नाम होने की चर्चा है।

झारखंड के इस मामले में फाइलों में दर्ज हैं कई बड़े नाम

सूत्रों की मानें तो एनआइए के एक एसपी रैंक के अधिकारी को केंद्र सरकार ने आनन फानन में हटाकर हैदराबाद भेजा।

उक्त अधिकारी ने इस मामले में फंसे लोगों को छूट देने से साफ इंकार कर दिया था।

उसके बाद एक उच्चाधिकारी ने राजनीतिक मजबूरी का हवाला देते हुए अपने अधीनस्थों को धीमी गति से चलने का निर्देश दिया।

उसके बाद ही जांच की गाड़ी सुस्त गति से चल रही है।

चर्चा है कि इस स्थिति का लाभ उठाते हुए जांच से जुड़े एक डीएसपी ने भी बहती गंगा में हाथ धोते हुए लंबा हाथ साफ कर लिया है।

मामले की जानकारी रखने वालों की मानें तो यह कोयले का खेल भी बड़ी रोचक स्थिति पैदा करने वाला है।

इस कारोबार में एक दूसरे से निकट संबंध रखने वालों दोनों अग्रवालों की राजनीतिक निष्ठा वर्तमान में परस्परविरोधी नेताओं के साथ है।

दोनों के राजनीतिक आका एक दूसरे के विरोधी होने के बाद भी धंधे में एक दूसरे के साथ हैं।

एनआइए ने पहले ही इन दोनों के कारोबारी रिश्ते की पुष्टि कर ली थी।

जांच की गाड़ी दुर्गापुर पहुंची तो कई और राज खुले

मामले की गाड़ी सुस्त गति से बढ़ाने के बाद भी एनआइए ने दुर्गापुर के उस अड्डे तक को खोज निकाला है,

जो यहां के कई लोगों के नियमित जाने का स्थान था।

वहां जाने वाले अधिकारियों को भी स्पष्ट तौर पर पहचान हो चुकी है।

महत्वपूर्ण पदों पर होने की वजह से जांच में उनके कान अब तक नहीं पकड़े गये हैं

लेकिन आने वाले दिनों में राजनीतिक समीकरण बदलने पर उनसे भी पूछ-ताछ हो सकती है।

जिला पुलिस के सूत्र बताते हैं कि इससे संबंधित एक मामले में चर्चा में आये एक गुप्ता नामक

कारोबारी का नाम एक मामला मे एफआइआर की नौबत आयी थी।

उसकी भनक मिलते ही रांची से एक पुलिस उच्चाधिकारी इस काम के लिए थाना पहुंच गये थे

ताकि उक्त व्यापारी का नाम एफआइआर में दर्ज नहीं हो।

उनके थाना में बैठे होने से उक्त व्यापारी का नाम वाकई एफआइआर में दर्ज नहीं हो पाया।

लेकिन जिस तरीके से मामला दर्ज हुआ उससे बड़े अफसर जिला के एसपी से नाराज हो गये थे।

यह पुलिस महकमा में जगजाहिर बात है।

लिहाजार अब मामले में नये सिरे से सुगबुगाहट होने की वजह से पुलिस महकमा के अनेक लोगों की निगाह इस पूरे प्रकरण पर टिकी हुई है।

जानकार जानते हैं कि नक्सलियों को  नाम पर वसूली गयी रकम को लेने

कौन नेता, नेता का रिश्तेदार और अफसर किसके यहां आता था।

अब दुर्गापुर का मामला चर्चा में आने की वजह से बड़े अधिकारियों के साथ गुपचुप दौरे में दुर्गापुर जाने वाले सिपाही भी

मामले की असलिय और साहबों के गुप्त दौरों का राज जान गये हैं।

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