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ऑक्सीजन और दवाइयों की कालाबाजारी राष्ट्रद्रोह नहीं तो क्या

ऑक्सीजन और दवाइयों के लिए मारे मारे फिरते लोग और बाजार में नहीं मिलने वाली

दवाइयों की कालाबाजारी करने वालों को क्या कहें। इस राष्ट्रीय आपदा के दौर में ऐसे

लोगों को अगर राष्ट्रद्रोही नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए। मुख्य धारा की मीडिया से यह

चर्चा बिल्कुल ही गायब हो गयी कि दिल्ली सहित देश के अन्य अस्पतालों में ऑक्सीजन

प्लांट बैठाने का ठेका आखिर किसे मिला था। समय की मांग थी कि उस व्यक्ति का नाम

उजागर होता और यह तय किया जाता कि उसने जो हरकत की है, वह राष्ट्रद्रोह है अथवा

नहीं। जहां ऑक्सीजन और दवाइयों की कमी का एक नकली बाजार भी खड़ा हो चुका

है,ऐसे में ऐसे ठेकेदार का नाम गायब हो जाना संदेह पैदा करता है। कोरोना महामारी के

दौरान ऑक्सीजन और दवाइयों के इस संकट ने वे सारे चेहरे भी सामने ला दिये हैं, जो

सफेदपोश थे और देश को घून की तरह अंदर से काट रहे थे। इनमें बड़े डाक्टर भी है।

मीडिया घराने के बारे में पटना से एक जानकारी आयी थी, जहां मीडिया कार्यालय से ही

ऑक्सीजन सिलिंडर की कालाबाजारी हो रही थी। कोरोना का यह संकट हमें ऐसे चेहरों से

परिचित करा रहा है, यह भी अच्छी बात है। वरना हम शायद ऐसे सफेदपोश चेहरों के झांसे

में ही होते और उनमें से कई को भगवान भी समझते रहते। रांची में भी अपनी गाड़ी में पूरा

दवाइयों का ढेर लेकर चलने वाले उस व्यक्ति के बारे में सिर्फ यह चर्चा सामने आयी कि

वह बड़े अधिकारियों के बीच पहुंच रखने वाला था। लेकिन उस व्यक्ति को कालाबाजारी

करने के लिए रेमडेसिवीर दवा किस माध्यम से मिली, यह सूचना गुप्त रह गयी है।

ऑक्सीजन और दवाइयों की कमी अगर नहीं तो जनता परेशान क्यों

अस्पतालों को ही जब इस दवा की आपूर्ति हो रही है तो तय मानिये कि इन्हीं अस्पतालों में

मरीजों को फर्जी इंजेक्शन देकर उनके नाम की दवा की कालाबाजारी में डाक्टर भी शामिल

होंगे। यह सब याद रखने वाली बातें हैं ताकि कोरोना संकट के निपट जाने के बाद हम धैर्य

के साथ एक एक कर इन सभी बातों का विश्लेषण कर राष्ट्रद्रोहियों की पहचान कर सकें।

अभी विपदा की घड़ी में आनन फानन में लिया गया फैसला गलत भी हो सकता है। कुछ

ऐसा ही अस्पतालों में कोरोना के मरीजों को बेड के नाम पर भी अलग किस्म की

दुकानदारी चल रही है। इसका खुलासा नोएडा के एक डाक्टर ने खुद ही अपनी वीडियो में

कर दिया है। फर्जी रिपोर्ट के आधार पर दिहाड़ी मजदूर को बेड पर सोये रहने के पैसे मिलते

हैं। उस बेड के लिए जब कोई मोटा मुर्गा फंसता है तो मरीज को कोरोना नेगेटिव बताकर

उसकी छुट्टी कर दी जाती है और पैसे वाले को वह बेड तत्काल उपलब्ध करा दिया जाता है।

इसलिए सिर्फ केंद्र अथवा राज्य सरकार की खामी गिनने से बेहतर है कि हम धैर्य के साथ

समाज के इन दुश्मनों की भी पहचान करें तो राष्ट्रीय संकट की घड़ी में दो का माल बीस में

बेच रहे हैं। इनमें सिर्फ दवाइयों के विक्रेता ही नहीं है। हर किस्म के कारोबार में ऐसा

गोरखधंधा चल रहा है। दरअसल पिछले लॉकडाउन के दौरान हुए आर्थिक नुकसान की

भरपाई के साथ साथ बहती गंगा में हाथ धोकर और पैसे कमा लेने की सोच भी हमें इसी

समाज से मिली है।

भीषण संकट में भी बेइमानी की सीख हमें बाहर से नहीं मिली है

ऐसे भीषण संकट की घड़ी में भी अगर देश की आबादी का एक हिस्सा अब भी मुनाफाखोरी

के बारे में सोच रहा है तो यह तय मानिये कि देश को शिक्षा के साथ साथ राष्ट्रभक्ति की

शिक्षा भी मिलनी चाहिए वरना हम अपनी वर्तमान शिक्षा पद्धति से ऐसे चोर बेइमानों को

आगे बढ़ाते रहेंगे, जो मौके देखकर अपनी असली जात दिखाने से बाज नहीं आयेंगे।

ऑक्सीजन और दवाइयों के मामले में केंद्र सरकार ने सब कुछ अपने नियंत्रण में लेने के

बाद भी उस पर निगरानी का कोई प्रबंध नहीं किया, यह उसकी खामी है। दूसरी तरफ हर

बात पर केंद्र के हस्तक्षेप से नाराज राज्यों ने अपनी तरफ से भी केंद्र द्वारा देखे जा रहे

मसलों पर ध्यान देने में कोताही बरती गयी। इससे भी आम जनता को ऑक्सीजन और

दवाइयों से साथ साथ चिकित्सा सुविधा की खामियों का नुकसान भोगना पड़ा है।

ऑक्सजीन और दवाइयों के अभाव में दरअसल कितने लोग काल कवलित हुए हैं, यह

आंकड़ा भी स्पष्ट नहीं हैं। सरकार और श्मशान घाटों के आंकड़ों में अंतर प्रमाणित है।

अनेक लोगों के बारे में यह लिखा भी नहीं जा रहा है कि वे कोरोना से मरे हैं लेकिन उनका

अंतिम संस्कार कोरोना रोगी की तरह ही किया जा रहा है। दरअसल यह सारी बातें स्पष्ट

करती हैं कि परेशानी दरअसल ऑक्सीजन और दवाइयों की नहीं हमारे समाज के एक

तबके के स्वार्थी सोच की है। जिनकी पहचान कर उन्हें दंडित करना भविष्य की बड़ी

जिम्मेदारी होगी।

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