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भारतीय वैक्सिन की ख्याति से भी पश्चिमी देश परेशान

भारतीय वैक्सिन उत्पादन की क्षमता ने निश्चित तौर पर विकसित देशों को परेशान कर

दिया है। दरअसल इसकी वजह दुनिया भर के देशों में भारत द्वारा कोरोना वैक्सिन का

टीका उपलब्ध कराया जाना है। नतीजा है कि अब भारत में अमेरिका से आने वाले कच्चे

माल की दिक्कत आ गयी है। अमेरिका ने वैक्सिन निर्माण के इन कच्चा मालों के निर्यात

पर रोक लगा रखी है। दूसरी तरफ समय पर करार के मुताबिक टीकों की आपूर्ति नहीं कर

पाने की वजह से एस्ट्रेजेनेका ने भारतीय वैक्सिन निर्माता सीरम इंस्टिट्यूट को कानूनी

नोटिस तक भेजा है। वैसे यह समझ लेना जरूरी है कि विदेशों में टीका निर्यात करने का

काम लंबित रखकर सीरम इंस्टिटियूट ने देश के अंदर भारतीय वैक्सिन की आपूर्ति पर

सरकार का निर्देश माना है। अब तो हालत यह है कि फिर से भारतीय वैक्सिन का आपूर्ति

चेन गड़बड़ा रहा है। अमेरिका ने रक्षा अधिनियम लागू कर दिया है और कच्चे माल के

निर्यात पर रोक लगा दी है। इसकी वजह से सभी टीका विनिर्माताओं को दिक्कतों का

सामना करना पड़ रहा है। इस वजह से नोवावैक्स का उत्पादन रुक गया है। अगर हमारे

लिए अमेरिकी कच्चा माल उपलब्ध होता तो नोवावैक्स का स्टॉक 50 फीसदी अधिक

होता। वैसे इस साल के अंत तक भारत में भारतीय वैक्सिन के कई अन्य विकल्प भी

उपलब्ध हो सकते हैं लेकिन वे सभी अभी क्लीनिकल ट्रायल के दौर में हैं। इस बात की

गंभीरता को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर समझने की जरूरत है कि भारतीय दवा उद्योग का

पूरी दुनिया में नाम होने से आखिर परेशानी किन्हे है।

भारतीय वैक्सिन की वैश्विक लोकप्रियता से खतरा किसे है

जाहिर सी बात है कि इस एक कारण से सबसे अधिक उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को

परेशानी है, जिन्हें यह भय सता रहा है कि भारतीय वैक्सिन की बदौलत ही भारत अब पूरी

दुनिया के दवा उद्योग के बाजार के बड़े हिस्से पर कब्जा कर सकता है। कीमतों का

तुलनात्मक अंतर भी अनेक नये देशों को पहली बार भारतीय वैक्सिन उत्पादन की क्षमता

से अवगत करा रहा है। इससे पहले दुनिया भर के अनेक देशों को यह पता भी नहीं था कि

भारतीय वैक्सिन उत्पादन की क्षमता दुनिया में सबसे अधिक है। कोरोना की दूसरी लहर

के बीच भारत में टीकाकरण का काम और तेज किया जा रहा है। इस काम में अड़चन आने

की वजह अमेरिका से कच्चे माल की आपूर्ति है। खुद सीरम इंस्टिटियूट के प्रमुख अदार

पूनावाला यह स्वीकार कर चुके हैं कि अगर कच्चे माल की कमी नहीं होती तो आज

भारतीय वैक्सिन का स्टॉक काफी अधिक होता। सामान्य समझ की बात है कि अगर

भारतीय वैक्सिन की आपूर्ति लगातार दुनिया भर के अन्य देशों तक होती रही तो इन देशों

को दवा उद्योग के लिए एक मजबूत विकल्प के तौर पर भारत नजर आ रहा है। यह

व्यापारिक चिंता निश्चित तौर पर पश्चिमी देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सता रही है,

जो दुनिया के दवा कारोबार पर अपना एकाधिकार काफी समय से कायम रखे हुए हैं।

भारतीय वैक्सिन की आपूर्ति देश में अधिक किये जाने के बारे में भी सीरम इंस्टिटियूट की

तरफ से सफाई दी गयी है। यह बताया गया है कि कोरोना की दूसरी लहर अगर जल्द

नियंत्रित हो पायी तो अगले एक दो महीने के भीतर पहले जैसी भारतीय वैक्सिन विदेशों

तक पहुंचने लगेगी। अभी तो इसी दूसरी लहर की वजह से वैक्सिन का उत्पादन और

आपूर्ति चेन भी बार बार बाधित हो रहा है।

असली परेशानी के बीच सरकार चुनाव में व्यस्त है

चुनावी चकल्लस के बीच इस बात की चर्चा बहुत कम हुई है कि एस्ट्राजेनेका टीके की

आपूर्ति में देरी के लिए सीरम इंस्टिटयूट को पहले ही कानूनी नोटिस भेजा गया है। भारत

सरकार भी यह बात जानती है। लेकिन सीरम इंस्टिट्यूट किन कारणों से यह काम पूरा

नहीं कर पायी है, इसमें अमेरिका से आने वाले कच्चे माल की आपूर्ति की क्या भूमिका है,

इस बारे में कोई चर्चा मुख्य धारा में नहीं होना भी चुनावी दौर में कोरोना संकट को

दरकिनार किये जाने की लापरवाही है। अब भारतीय वैक्सिन के वैश्विक क्लीनिकल

ट्रायल के परिणाम भी सामने आने लगे हैं। विदेशी अनुसंधान यह बताता है कि

एस्ट्राजेनेका टीके की एक खुराक ही 94 फीसदी तक असरदार साबित हो रही है। दूसरी

तरफ भारतीय वैक्सिन के बारे में बताया गया है कि अगर दो खुराकों के बीच तीन महीने

का इंतजार किया जाए तो यह 80 फीसदी असरदार है। इसे लेकर कोई विवाद नहीं है।

लेकिन चुनावी चर्चाओँ के बीच देश की सबसे बड़ी चुनौती बनी कोरोना की इस स्थिति के

बारे में भी जनता को इन गंभीर बातों की जानकारी होनी चाहिए ताकि संकट के असली

कारणों को वे भी बेहतर तरीके से समझ सकें।

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