fbpx Press "Enter" to skip to content

यह कहां आ गये हम यूं ही साथ चलते चलते.. .. ..

यह कहां आ गये हम, सवाल लाजिमी है क्योंकि हमलोगों को काफी अरसे से इस किस्म

की जीवनपद्धति की आदत नहीं रही है। शादी के खाने में एक दूसरे के ऊपर टूटते हुए

अच्छी मेनू अपनी प्लेट में एकत्रित कर लेना हमारी सामाजिक आदतों में शामिल रहा है।

मंदिरों में लोगों को धक्का देते हुए आगे बढ़ना ही हमारे लिए ईश्वर प्रेम है। इतना ही नहीं

अधिकांश इलाकों में दूसरे को धकियाते हुए आगे बढ़ने की बीमारी से हमलोगों में से

अधिकांश पीड़ित हैं। इसलिए हाल देखकर लगता है कि वाकई यह कहां आ गये हम।

सड़कें सुनसान और हर चौक चौराहे पर मौजूद सुरक्षाबल आते जाते वालों से पूछता है कि

कौन हैं और कहां जा रहे हैं। ठीक ठाक उत्तर नहीं मिला तो पुलिस अपने तरीके ईलाज कर

देती है। कई बार पुलिस का बेंत खाकर घर लौटने वाले आजाद देश के होने अथवा नहीं होने

का सवाल उठा रहे हैं। क्यों भइया बार बार बोला तो गया था कि फालतू का बुकरादी करने

सड़क पर मत जाना। अब नियम तोड़े हो तो उसका जुर्मान तो मैं नहीं भरने वाला। पीठ

और कहीं और पड़ी है तो हल्दी लगाओ और दर्द भगाओ। इस लॉकडाउन में कोई और

इंतजाम तो हो नहीं सकता है।

मुझे तो अपने आस पास भी बहुत कुछ बदला नजर आ रहा है

लेकिन मुझे अपने आसपास का माहौल भी अजीब तरीके से बदलता हुआ नजर आता है।

हम कहीं भी बैठकर दूर या पास किसी पेड़ पर बैठे किसी पक्षी के चहकने की आवाज सुन

पा रहे हैं। हमें बहुत कुछ नया नया सा इसलिए भी नजर आ रहा है क्योंकि हमलोगों ने

इन्हें देखने समझने की अपनी आदत ही खो दी थी। शायद इसीलिए बार बार ऐसा लग रहा

है कि यह कहां आ गये हम। इसी यह कहां आ गये हम की चर्चा से एक चर्चित रोमांटिक

फिल्म का गीत याद आ रहा है। यह कई कारणों से चर्चित फिल्म सिलसिला का गीत है।

गीत की खासियत यह भी है कि इसे अमिताभ बच्चन ने भी लता मंगेशकर के साथ स्वर

दिया था। इस गीत को लिखा था जावेद अख्तर ने और संगीत में ढाला था शिव हरि ने।

गीत के बोल कुछ ऐसे हैं

मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं

तुम होती तो कैसा होता, तुम ये कहती, तुम वो कहती  तुम इस बात पे हैरां होती,

तुम उस बात पे कितनी हँसती  तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता


मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं
रू रू …

ये कहां आ गये हम, यूँही साथ साथ चलते

तेरी बाहों में है जानम, मेरे जिस्म-ओ-जान पिघलते
तेरी बाहों में है जानम, मेरे जिस्म-ओ-जान पिघलते
ये रात है, या तुम्हारी ज़ुल्फ़ें खुली हुई हैं

है चाँदनी तुम्हारी नज़रों से, मेरी राते धुली हुई हैं
ये चाँद है, या तुम्हारा कँगन
सितारे हैं या तुम्हारा आँचल
हवा का झोंका है, या तुम्हारे बदन की खुशबू

ये पत्तियों की है सरसराहट
के तुमने चुपके से कुछ कहा
ये सोचता हूँ मैं कबसे गुमसुम

कि जबकी मुझको भी ये खबर है
कि तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो
मगर ये दिल है कि कह रहा है
तुम यहीं हो, यहीं कहीं हो

तू बदन है मैं हूँ साया, तू ना हो तो मैं कहां हूँ
मुझे प्यार करने वाले, तू जहाँ है मैं वहाँ हूँ
हमें मिलना ही था हमदम, इसी राह पे निकलते
ये कहां आ गये हम

मेरी साँस साँस महके, कोई भीना भीना चन्दन
तेरा प्यार चाँदनी है, मेरा दिल है जैसे आँगन
कोइ और भी मुलायम, मेरी शाम ढलते ढलते
कोइ और भी मुलायम, मेरी शाम ढलते ढलते
ये कहां आ गये हम

मजबूर ये हालात, इधर भी है उधर भी

तन्हाई के ये रात, इधर भी है उधर भी
कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे कहें हम
कब तक यूँही खामोश रहें, और सहें हम

दिल कहता है दुनिया की हर इक रस्म उठा दें
दीवार जो हम दोनो में है, आज गिरा दें
क्यों दिल में सुलगते रहें, लोगों को बता दें
हां हमको मुहब्बत है, मोहब्बत है, मोहब्बत है

अब दिल में यही बात, इधर भी है, उधर भी
ये कहां आ गये हम, ये कहां आ गये हम
प्रकृति का फैसला भी अजीब होता है

इसलिए भइया मानकर चलिए कि प्रकृति कई बार अजीब तरीके से अपने फैसले सुनाया

करती है। ऊपर से एक झटका आया तो हमारी सारी हेकड़ी ही धरी की धरी रह गयी।

अचानक से हमें अपने तमाम लोग याद आने लगे हैं। दरअसल टाइम पास करना है और

मोबाइल है तो भूले बिसरे गीत की तरह उनलोगों को भी याद कर रहे हैं तो आम तौर पर

सिर्फ न्यू ईयर अथवा होली-दीवाली के दिन मैसेज या व्हाट्सएप के जरिए याद आते हैं।

लाइन से एक एक कर सभी से बात हो रही है। हम मशीन से फिर से इंसान बनने की तरफ

बढ़ चले हैं यही कुछ कम है क्या। 


 

Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
More from फ़िल्मMore posts in फ़िल्म »

Be First to Comment

Leave a Reply

error: Content is protected !!
Open chat