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भारत की गुप्तचर एजेंसियां क्या कर रही हैं

भारत की गुप्तचर एजेंसियां काम क्या करती हैं। इन एजेंसियों जब यह पता नहीं होता कि

कौन सा विदेशी देश में पासपोर्ट लेकर आने के बाद क्या गुल खिला रहा है। ऐसी

गतिविधियों पर सतत निगरानी के लिए ही अनेक भारत की गुप्तचर एजेंसियां काम

करती है। इसके बाद भी अगर कोरोना की वजह से विदेशियों के भारत आने का पता चल

रहा है तो यह माना जाना चाहिए कि भारत की गुप्तचर एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी

निभाने में विफल रही हैं। यह महज एक आकलन है क्योंकि हो सकता है कि सरकारी

फाइलों में इस बारे में कोई महत्वपूर्ण सूचना वाकई दर्ज हो और किसी बड़े अफसर ने इसे

गैर जरूरी मानते हुए ठंडे बस्ते में डाल दिया हो। अब दिल्ली से कोरोना संक्रमण के सबसे

अधिक मामले विदेशियों के होने के बाद नये सिरे से यह विवाद उठ खड़ा हुआ है। भारत

की गुप्तचर एजेंसियों की विफलता इससे भी साबित होती है कि यहां पर भी समस्या को

सुलझाने के लिए फिर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को ही जाना पड़ा। इससे

पहले भी श्री डोभाल को दिल्ली हिंसा को नियंत्रित करने के लिए खुद मैदान में उतरना पड़ा

था। सरकारी एजेंसियों के कहने के बाद भी निजामुद्दीन के पास मौजूद मरकज को भीड़ से

खाली कराना काफी मुश्किल भरा रहा। सरकार के निर्देश पुलिस की चेतावनी के बाद भी

जमात किस कदर जिद पर अड़ा हुआ था, यह इस बात से सामने आता है कि आधी रात

डोभाल को मनाने के लिए जाना पड़ा।

हर काम में अजीत डोभाल का जाना कोई अच्छी बात नहीं

मस्जिद के मौलाना साद दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के आग्रह को ठुकरा चुके थे।

ऐसे में गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से आग्रह किया

कि वह जमात को मस्जिद खाली करने के लिए राजी करें। गृह मंत्री के आग्रह पर डोभाल

28-29 मार्च की दरम्यानी रात 2 बजे मरकज पहुंचे। गृह मंत्रालय के शीर्ष सूत्रों ने बताया

कि डोभाल ने मौलाना साद को समझाया और वहां मौजूद लोगों का कोविड-19 टेस्ट कराने

को कहा साथ ही लोगों को क्वारंटीन में रखने की बात भी कही। अब यह समस्या हल होने

के बाद तमाम जिला प्रशासनों को वहां से जारी सूची के हिसाब से अपने इलाके में लोगों की

पहचान करना पड़ रहा है। ऐसे में सीधा सवाल यही है कि भारत की गुप्तचर एजेंसियां

आखिर कर क्या रही हैं। आम बात है कि किसी के घर में भी विदेशी के आने की स्थिति में

यह घर मालिक की जिम्मेदारी बनती है कि वह पुलिस को इस विदेशी के अपने यहां होने

के बारे में सूचित करे। इतनी अधिक संख्या में लोग दिल्ली के धार्मिक आयोजन में

शामिल होने आये, इस पर अगर गुप्तचर एजेंसियां का ध्यान स्वाभाविक तौर पर नहीं

गया तो यह उनकी विफलता ही है। भारत की गुप्तचर एजेंसियां अब भी सांप निकल जाने

के बाद लाठी पीटने का काम कर रही हैं। क्योंकि इससे पहले क्वालालामपुर में भी एक

ऐसा ही धार्मिक आयोजन हुआ था। समाचारपत्रों की सूचनाओं के मुताबिक उस आयोजन

में भी करीब 16 हजार लोग शामिल हुए थे। उस आयोजन में कितने भारतीय थे और वे

अब कहां हैं अथवा क्या ऐसे विदेश से लौटे लोगों की जांच हो चुकी है, इन सारे सवालों का

उत्तर तो भारत की गुप्तचर एजेंसियों को ही देना है।

भारत की गुप्तचर एजेंसियां इन सवालों का उत्तर दें

जो सवाल मलेशिया के लोगों के देश के विभिन्न मसजिदों में बिना जांच के टिके होने का

है तो इस पूरे प्रकरण की जांच के क्रम में यह भी देखा जाना चाहिए कि इनमें से कितने

लोग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर भारत से भागे धर्म प्रचारक जाकिर नायक से जुड़े हुए

हैं। यह सर्वविदित है कि जाकिर नायक के प्रत्यर्पण के सवाल पर भी भारत और मलेशिया

के कूटनीतिक संबंध बिगड़े हैं। जिसके बाद भारत ने वहां से पॉम ऑयल की आयात रोक

दी है। इस पूरी स्थिति से अगर भारत की गुप्तचर एजेंसियां पहले से ही वाकिफ थी तो

मलेशिया से इतनी अधिक संख्या में धर्म प्रचारकों के आने की भनक उन्हें क्यों नहीं थी,

यह बड़ा सवाल है। लिहाजा जब धार्मिक आयोजन में शामिल लोगों की जांच हो तो साथ

साथ उनलोगों की भी विस्तृत जांच हो जो अपने पैसे की बदौलत निजी फ्लाइट से गुपचुप

तरीके से देश लौट आये थे। ऐसे लोग कहां और किस अवस्था में हैं उसकी जांच इसलिए

भी जरूरी है ताकि इस कोरोना के नाम पर भी नये सिर से घृणा की राजनीतिक फैलाने की

जो साजिश प्रारंभ हो चुकी है, उसके जहर का असर होने से पहले ही इसे रोका जा सके।

सिर्फ एक धार्मिक आयोजन को ही देश में कोरोना फैलाने का कारण बताने वालों को बार

बार यह बताना होगा कि कनिका कपूर जैसी अनेक शख्सियतें ऐसी भी हैं जो इस धार्मिक

जमात का हिस्सा नहीं थे लेकिन उनलोगों ने भी संक्रमण फैलाया है।


 

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