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यह कहां आ गये हम यूं ही साथ चलते चलते

यह कहां आ गये हम, यह बड़ा सवाल अब तो पूरे देश के सामने खड़ा हो

गया है। मानता हूं कि दिल्ली का दंगल इंपोर्टेंट है। यहां फिर से चित

हुए तो अपने मोटा भाई की उल्टी गिनती चालू हो जाएगी। अपने

राजनाथ भइया और नीतीन जी पहले से ही खार खाये बैठे हैं। भाजपा

नेताओं की नई पौध जिस रास्ते चल पड़ी है उसे देखकर मार्गदर्शक

मंडल तो क्या वर्तमान सरकार के पुराने नेता भी हैरान परेशान हैं।

कभी आपने सोचा भी है। आज जिन हिंसक घटनाओं को आप आवेश

में सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, कल अगर वे घटनाएं आपके

साथ हो तो क्या तब भी आप इसे सही ठहरा पायेंगे। जो फसल बोई जा

रही है, उससे तो यही होना है। आज कोई और निशाने पर है और कल

आप भी निशाने पर होंगे।

हम इतिहास को गंभीरता से इसलिए पढ़ते और समझते हैं ताकि

पुरानी भूलों से हम सबक लें और दोबारा वैसी गलती नहीं करें।

गुप्तवंश के काल का अखंड भारत आज इस हाल तक क्यों पहुंचा कभी

इतिहास में दर्ज तथ्यों के आधार पर परखा है क्या आपने।

लगातार नफरत की बीज बोयी जा रही है और हम प्यार के फसल की

उम्मीद लगाये बैठे हैं तो हमसे अधिक मुर्ख और कौन हो सकता है। आंख

बंद कर किसी की बातों में आ जाओगे तो कल जब गड्डे में गिर जाओगे

तो कोई उठाने वाला भी नहीं होगा।

इतने तामझाम के साथ यह दावा किया था कि असम में दो करोड़ बांग्लादेशी

घुसपैठिये हैं, जिन्हें एनआरसी के हथियार से बाहर निकाल देंगे। उसका क्या

हुआ। रिकार्ड पर है कि इस पूरी प्रक्रिया में करीब 16 सौ करोड़ रुपये खर्च

हो गये।

यह कहां आ गये कि असम का एनआरसी गायव

जनता का पैसा जिस बहाने से खर्च किया, उसकी अंतिम परिणति यानी

रिजल्ट बताओ। असफलता पर पर्दा डालने के लिए अब नया तर्क लेकर आ

गये। इसी बात को लेकर एक सुपरहिट गीत याद आ रहा है।

फिल्म सिलसिला याद है कि भूल गये हैं। अरे भाई इसी फिल्म में तो

अमिताभ बच्चन और रेखा ने अंतिम बार साथ साथ काम किया था।

उसके बाद भाईलोगों ने दोनों की बाट लगा दी थी। क्या रोमांटिक सीन

था और क्या गीत के अंदाज थे। याद कीजिए और मन तो हो दोबारा

खोजकर वीडियो देख लीजिए। इस गीत को लिखा था जावेद अख्तर

ने। उसे संगीत में ढाला था शिव हरी ने और इसे स्वर दिया था लता

मंगेशकर और अमिताभ बच्चन ने। गीत कुछ इस तरह से था।

मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं

तुम होती तो कैसा होता, तुम ये कहती, तुम वो कहती तुम
इस बात पे हैरां होती, तुम उस बात पे कितनी हँसती
तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता

मैं और मेरी तन्हाई, अक्सर ये बातें करते हैं

यह कहां आ गये हम, यूँही साथ साथ चलते
तेरी बाहों में है जानम, मेरे जिस्म-ओ-जान पिघलते
तेरी बाहों में है जानम, मेरे जिस्म-ओ-जान पिघलते

ये रात है, या तुम्हारी ज़ुल्फ़ें खुली हुई हैं
है चाँदनी तुम्हारी नज़रों से, मेरी राते धुली हुई हैं
ये चाँद है, या तुम्हारा कँगन
सितारे हैं या तुम्हारा आँचल
हवा का झोंका है, या तुम्हारे बदन की खुशबू
ये पत्तियों की है सरसराहट
के तुमने चुपके से कुछ कहा

ये सोचता हूँ मैं कबसे गुमसुम
कि जबकी मुझको भी ये खबर है
कि तुम नहीं हो, कहीं नहीं हो
मगर ये दिल है कि कह रहा है
तुम यहीं हो, यहीं कहीं हो

तू बदन है मैं हूँ साया, तू ना हो तो मैं कहाँ हूँ
मुझे प्यार करने वाले, तू जहाँ है मैं वहाँ हूँ
हमें मिलना ही था हमदम, इसी राह पे निकलते

यह कहां आ गये हम
मेरी साँस साँस महके, कोई भीना भीना चन्दन
तेरा प्यार चाँदनी है, मेरा दिल है जैसे आँगन
कोइ और भी मुलायम, मेरी शाम ढलते ढलते
कोइ और भी मुलायम, मेरी शाम ढलते ढलते

यह कहां आ गये हम

मजबूर ये हालात, इधर भी है उधर भी
तन्हाई के ये रात, इधर भी है उधर भी
कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे कहें हम
कब तक यूँही खामोश रहें, और सहें हम
दिल कहता है दुनिया की हर इक रस्म उठा दें
दीवार जो हम दोनो में है, आज गिरा दें

क्यों दिल में सुलगते रहें, लोगों को बता दें
हां हमको मुहब्बत है, मोहब्बत है, मोहब्बत है
अब दिल में यही बात, इधर भी है, उधर भी
ये कहाँ आ गये हम, ये कहाँ आ गये हम

ये कहाँ आ गये हम

अब तो झारखंड की भी थोड़ी सी बात हो जाए। फाइलें तहखाने से बाहर

निकलने लगी है। अफसर भी इधर से उधर होने लगे हैं। देखना है कि

पहले वाली बेदाग सरकार अब सही मायने में कितनी बेदाग साबित

होती है। अभी तो अनेक किस्म के मामलों की चर्चा तक नहीं हुई है।

लेकिन तेल देखिये और तेल की धार देखिये।

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