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कहां से आती है राजनीतिक दलों की खर्चा-पानी

  • सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन
  • दान के भरोसे ही चलती है पार्टियां
  • चुनाव आयोग की रिपोर्ट में खुलासा
भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी : कहां से देश के सारे राजनीतिक दल अपनी गतिविधियों के संचालन का पैसा

लाते हैं, यह कभी वे सार्वजनिक नहीं किया करते हैं। चुनाव लड़ने और अपने दैनिक

मामलों को चलाने के लिए दान पर निर्भर रहते हैं। उन्हें कॉपोरेट्स या व्यापारिक घरानों,

ट्रस्टों और व्यक्तिगत दानों से बड़ी रकम प्राप्त होती है। जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की

धारा 29 सी में यह आदेश है कि राजनीतिक दल सालाना किसी भी व्यक्ति या कम्पनी से

प्राप्त रु 20,000 से अधिक के दान का विवरण निर्धारित प्रारूप में प्रस्तुत करते हैं तो

उनको 100% की कर छूट मिलती है।फॉर्म 24ए के अनुसार राजनीतिक दलों को प्राप्त चंदे

के विवरण में नाम, पता, पैन, भुगतान का तरीका और प्रत्येक दान से प्राप्त दानराशि

शामिल है जिन्होंने 20,000 रुपये से अधिक का दान दिया है| विश्लेषण में बताया गया है

कि क्षेत्रीय दलों ने हर साल अपने दान रिपोर्ट में पैन विवरण की जानकारी कुछ जगह

अघोषित, अधूरी या गलत घोषित की है।देश में सक्रिय सभी राजनीतिक दल ‘दान’ के

मोहताज हैं और उनके खर्च का एक बड़ा हिस्सा इसी से चलता है लेकिन इसके साथ ही

एक बात यह भी है कि दान लेने वाले राजनीतिक दल दान दाताओं का खुलासा नहीं करते।

असम की रिपोर्ट से ही सभी दल कटघरे में

भारत के चुनाव आयोग की रिपोर्ट के अनुसार असम में एजीपी, एआईयूडीएफ, बीपीएफ

और अन्य राष्ट्रीय राजनीतिक दल भाजपा, कांग्रेस, राकांपा समेत अन्य 35 क्षेत्रीय दल

राजनीतिक दान पर बहुत बड़ा पैन कार्ड विसंगति शामिल है। भारतीय चुनाव आयोग के

उच्च अधिकारी ने कहा कि विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा निर्वाचन आयोग को दी गई

जानकारी के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक यह तथ्य प्रकाश में आया कि

वर्ष 2017-18 और 2018 -19 के बीच सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की आमदनी में

1657.44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की आमदनी में इस

दौरान 14 प्रतिशत की गिरावट आयी।जहां भाजपा की आय 570 करोड़ 86 लाख रुपये से

1657 करोड़ 44 लाख रुपये हो गई, वहीं कांग्रेस की आमदनी 261 करोड़ 56 लाख रुपये से

घटकर 225 करोड़ 36 लाख रुपये रह गयी। दोनों ही पार्टियों ने अपनी आय का प्रमुख स्रोत

दान अथवा चंदे को बताया है। दोनों ही पार्टियां समय से अपने आयकर रिटर्न दाखिल नहीं

करतीं और ऑडिट की रिपोर्ट भी समयसीमा बीत जाने के कई-कई महीने बाद पेश की

जाती है।अधिकारियों ने बताया कि भाजपा, कांग्रेस, राकांपा, माकपा, द्रमुक, राजद,

शिवसेना, तेलुगु देशम पार्टी जैसे 5 राष्ट्रीय और 30 क्षेत्रीय दलों असम की एजीपी,

एआईयूडीएफ, बीपीएफ की ऑडिट रिपोर्ट चुनाव आयोग के पास उपलब्ध नहीं है।

कहां से लाते हैं पैसा इस पर सुप्रीम कोर्ट का है आदेश

अब यह बताना उचित होगा की सुप्रीम कोर्ट ने 13 सितम्बर 2013 को यह घोषित किया

कि उम्मीदवारों के शपथपत्र का कोई भी हिस्सा खाली नही रहना चाहिए इसी प्रकार फॉर्म

24ए (जो कि राजनीतिक दलों द्वारा रु 20,000 ज्यादा दान देने वाले लोगों के लिए प्रस्तुत

किया जाता है) का भी कोई हिस्सा खाली नही होना चाहिए।जिन दान दाताओं ने एक या

उससे अधिक दान के रूप में न्यूनतम रु 20,000 का दान किया हो उन्हें अपना पैन विवरण

प्रदान करना चाहिए।

सार्वजनिक जांच हेतु राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को अपने दल को मिले दान का उचित तथा

पूर्ण विवरण समय पर चुनाव आयोग को जमा कर देना चाहिए, फलस्वरूप ये वित्तीय

पार्दर्शिता को प्रोत्साहित करेगा।चुनाव आयोग अपनी वेबसाइट पर राजनीतिक दलों के

खिलाफ की गई कार्रवाई (यदि कोई हो) का विवरण करे जो अपेक्षित विवरण (जैसे नाम,

पता, पैन और भुगतान का तरीका) व्यक्तियों, कंपनियों या संस्थाओं से प्राप्त नकद राशि

का विवरण प्रदान करने में विफल रहता है। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस और भाजपा,

दोनों ही बढ़-चढ़कर राजनीतिक प्रक्रिया और पार्टियों की वित्तीय दशा को अधिकाधिक

पारदर्शी बनाने के दावे करती रहती हैं। भाजपा तो हमेशा से ही कांग्रेस पर भ्रष्टाचार में

लिप्त रहने का आरोप लगाती रही है और अपने आपको एक भिन्न किस्म की नितांत

ईमानदार और बेदाग पार्टी के रूप में पेश करती रही है। लेकिन हकीकत यह है कि

राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने और पूरी

प्रक्रिया को ईमानदार और पारदर्शी बनाने के बजाय उसने भी उस पर पर्दा डालने का ही

काम किया है। बता दें किबीजेपी हो या कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां यह साफ नहीं करती हैं कि

उनकी आय का स्रोत क्या है। पारदर्शिता बनाने की जगह दोनों ही कानून में बदलाव का

सहारा लेती हैं।


 

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