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तू छुपी है कहां मैं तड़पता यहां मैं मैडम के आर्थिक पैकेज को तलाश रहा हूं

तू छुपी है कहां, यह सिर्फ मेरी बात नहीं है, मेरे जैसा हर मैंगो इंडियन मैडम जी को खोज

रहा है। जी हां मैं निर्मला सीतारमण जी की बात कर रहा हूं। आर्थिक पैकेज का एलान होने

के बाद आगे की जानकारी मैडम जी कब देंगी, उसी का इंतजार है। कोरोना ने जितनो की

जान नहीं ली, भूखमरी से उससे अधिक लोग मर गये होते। भला हो अपनी इंडियन कल्चर

है। वइसे तो आपस में हमलोग जूतम पैजार करते ही रहते हैं। वोट आता है तो जात

तलाशकर मतदान करते हैं। लेकिन इ टैम पर तो सब कुछ भूलकर सभी असली भारतीय

नजर आये। दूर दराज के गांव में भी लाठी टेककर चलती बूढ़िया ने सड़क पर चलते

अनजान मजदूरों से भी पूछ लिया कुछ खाया है क्या। कुछ नहीं था तो अपनी पेड़ से

पपीता औऱ घर से नमक लाकर दे दिया। यह है हमारा असली भारत। वरना पॉलिटिकल

एंगल से एक आदमी को छह लोग एक पैकेज सूखा राशन बांटकर फोटो खिंचवाते तो बहुत

लोग नजर आये। लेकिन असली बात पर लौटते हैं कि मैडम जी तू छुपी हैं कहां। अब बाहर

निकलकर हम जैसे मध्यमवर्गीय लोगों का भी कल्याण कीजिए। जब लॉक डाउन में

विजय माल्या और नीरव मोदी का कल्याण कर गये तो मैडम जी वोटर तो हम भी हैं।

फिर से एक पुरानी फिल्म का गीत याद आ रहा है। फिल्म नवरंग के इस गीत को लिखा

था भरत व्यास ने और उसे संगीत में ढाला था सी रामचंद्र ने। इस मोहक गीत को मन्ना डे

और आशा भोंसले ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

तू छुपी है कहां मैं तड़पता यहां

तेरे बिन फीका फीका है दिल का जहां

तू छुपी है कहां मैं तड़पता यहां

तू गयी उड़ गया रंग जाने कहां

तेरे बिन फीका फीका है दिल का जहां

तू छुपी है कहां मैं तड़पता यहां

दिल की महफ़िल में जब ना मुझे तुम मिले

साँस लेती हु आके इस सुनसान में

इन् बहरों जब ना तुझे पा सकी

इन् बहरों जब ना तुझे पा सकी

तो तड़पती हु आके इस वीरान में

तेरे बिन फीका फीका है दिल का जहां

छुपी है कहा मैं तड़पता यहां

ये नजरें दीवानी क्यों खोई हुई

मेरे रंगीन सपनों के रंगो में

उमंगो में जब ना तुझे पा सकी

उमंगो में जब ना तुझे पा सकी

ढूंढती हूँ मै ग़म की तरंगो में

तेरे बिन फीका फीका है दिल का जहां

छुपी है कहां मैं तड़पता यहां

तू छुपी है कहां

छुपी है कहां

छुपी है कहां

मै छुपि हु पिया तेरी पलकन में

तेरी धड़कन में

तेरी हर सांस में तेरी हर आस में

मै छुपी हो कहां मेरा ये राज़ सुन

दर्द के हाथो ग़म से भरा साज़ सुन

मेरे रोते हुए दिल की आवाज सुन

जब तलक तेरा मेरा ना होगा मिलान

मै जमीन आसमां को हिलाती रहूंगी

आखरी आस तक आखरी सांस तक

खुद तड़पुँगी और तड़पाती रहूँगी

यह कौन घुँघरू छमका

ये कौन चाँद चमका

यह धरती पे आसमान आ गया पूनम का

यह कौन फूल महका ये कौन पंछी चहका

महफ़िल में कैसी खुशबु उड़ी

दिल जो मेरा बहका

लो तन में जान आयी

होठों पे तान आई

मेरी चकोरी चांदनी में करके स्नान आयी

बिछड़ा वह मित आया जीवन का गीत आया

दो आत्माओ के मिलान दिन पुनीत आया

सूरत है मेरे सपनो की तू सोहिनी

जमुना तू ही है तू ही मेरी मोहिनी

तेरे बिन फीका फीका है दिल का जहां

छुपी है कहां मैं तड़पता यहां


तू छुपी है कहां

छुपी है कहां

छुपी है कहां

इसलिए तू छूपी है कहां का टैम जितना आगे बढ़ेगा, उतना ही पोजिशन गड़बड़ा रहा है।

जनता के मिजाज को समझिये और अपने आप में सुधार कीजिए। ढेर सारे नेता लोग इस

कोरोना काल में भी मुंह टेढ़ा करके बतिया रहे हैं। अगला चुनाव आने दीजिए जनता इतनी

नाराज है कि आपका पॉलिटिकल मुंह का जियोग्राफी बदल देगी। भला हो कोरोना का

जिसने हमें राजनीतिक अनुभव भी दे दिया और ढेर सारे ऐसे चेहरों की पहचान भी हो गयी

जो तीस मार खां बने फिरते थे। मौका आया तो विज्ञप्तिवीर लोग गधे के सर से सींग की

तरह गायब हो गया। जमीन से जुड़े लोगों को पता है कि जमीन के अंदर चल क्या रहा है।

इसलिए लुका छिपी का खेल बंद कर सीधा सीधा आये आम चाहे जाए लबेदा का फॉर्मूला

आजमाइये नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि गाड़ी प्लेटफॉर्म से छूट जाए और आप अगले चुनाव

में ट्रेन पकड़ने के लायक ही नहीं रह जाएं। आज कल वैसे भी राजनीतिक प्लॉटफॉर्म में

बहुत धक्कमपेल है। लॉक डाउन के बाद भी वहां कोई सोशल डिस्टेंसिंग नहीं है। जिसे

मौका लगेगा वही सामने वाले को धकियाकर आगे निकल ही जाएगा। यह इंडियन

पॉलिटिक्स है हुजूर।


 

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