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जब तुम चाहो दूर जाते हो जब तुम चाहो पास आते हो

जब तुम चाहो की बात इसलिए याद आ रही है क्योंकि दो अलग अलग इलाकों से अलग अलग संकेत मिल रहे हैं।

इसी वजह से इस गीत को दोहराने का मन कर रहा है।

आप को कोई कंफ्यूजन नहीं हो इसलिए बता देता हूं कि मैं दरअसल महाराष्ट्र और झारखंड की अलग अलग सिचुयेशन की व्याख्या करने की कोशिश कर रहा हूं।

दोनों में कॉमन भारतीय जनता पार्टी है लेकिन उनके सहयोगी अलग अलग हैं।

महाराष्ट्र में 25 साल पुराने मित्र ने ऐसा कुछ बर्ताव किया है मानों दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा।

इधर झारखंड में आजसू को कंधे से झाड़ देने की कोशिशों पर अकेले अमित शाह भारी पड़ रहे हैं।

देख लीजिए कि सुदेश महतो को दिल्ली बुलाया गया।

जबकि पहले सुदेश ने खुद ही भाजपा के अन्य नेताओं के साथ वहां जाने से इंकार कर दिया था।

जाहिर है कि मोटा भाई ने बुलाया ही होगा वरना दूसरे तो चाहते ही नहीं थे कि सुदेश महतो को मौका भी मिले।

कोई बात नहीं, कभी गाड़ी पर नाव तो कभी नाव पर गाड़ी।

ऐसा तो चलता ही रहेगा।

आखिर इंडियन पॉलिटिक्स में यह कोई नईं बात तो नहीं है।

अब देखते हैं अपने पड़ोसी स्टेट पश्चिम बंगाल में पंजे के हाथ में लाल झंडा क्या कुछ कमाल दिखा पाता है।

जिस गान की चर्चा कर रहा हूं, वह अपेक्षाकृत नये दौर की फिल्म है।

सलमान खान की अन्यतम हिट फिल्म थी, प्रेम रतन धन पायो।

वर्ष 2015 में बनी इस फिल्म की गीत को लिखा था इरशाद कामिल ने और संगीत में ढाला था हिमेश रेशमिया ने।

इस गीत तो पलक मुछाल, मोहम्मद इरफान, दर्शन रावल ने। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

जब तुम चाहो, पास आते हो जब तुम चाहो, दूर जाते हो

जब तुम चाहो, पास आते हो जब तुम चाहो, दूर जाते हो
चलती हमेशा मर्जी तुम्हारी कहते हो फिर भी प्यार करते हो

माना मैंने गलतियां की थोड़ी थोड़ी सख्तियाँ की
इश्क़ में थोड़ी सी मस्तियाँ की
जब तुम चाहो, शिकवे गीले हो जब तुम चाहो,

दिल ये मिले हो चलती हमेशा मर्जी तुम्हारी जाओ बड़े आये,
प्यार करते हो दिल की बातें बोलते नहीं
राज़ अपने तुम खोलते नहीं अपने मन की तुम,
करते हो सदा मेरा मन तुम टटोलते नहीं

सच है तेरी ये सब शिकायतें तोड़ दूंगा ये रिवायतें
भूल मेरी मुझको आया ना रिझाना मगर चाहता हूँ
अब मनाना जब तुम चाहो, हंस के बुलाओ

जब तुम चाहो, लड़ते ही जाओ चलती हमेशा मर्जी तुम्हारी
बड़ी बड़ी बातें, प्यार करते हो सीख ली हैं,
प्यार की बारीकियां सभी हो समय अगर तो,
सिखा दीजिये अभी कैसे रिझाते किसी को,

बात बात में दूर कैसे होती किसी की नाराज़गी
भोले बन के करते हो गुस्ताखियाँ छोड़ दो
ये सब चालाकियां बात में बहलाओ ना

यूँ बात को बढ़ाओ ना यूँ मानूंगी ना मैं,
मनाओ ना यूँ जब तुम चाहो शाम हो
जब तुम चाहो, रात ढली हो अब तुम चाहो,
जो भी सजा दो बस थोडा सा, हंस के दिखा दो।

अब नाटक चल रहा है तो नाटक का अंत देखने के लिए तैयार रहिये।

इंडियन पॉलिटिक्स के इस किस्म की फिल्म का क्लाईमैक्स बड़ा जोरदार होता है।

पल में तोला और पल में माशा का जीता जागता नमूना ही है यहां की राजनीति का खेल।

कौन कब पहलवान और कौन कब चित, कहना मुश्किल होता है।

लेकिन इसके लिए नेताओं को जिम्मेदार मत ठहराइये। आप भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है।

पहले थोड़ा बहुत बोल लिया करते थे।

अब तो ऐसी चुप्पी साधे रहते हैं कि नेताओं को भनक तक नहीं मिलती कि आपके दिलों में आखिर चल क्या रहा है।

किसी ने तीन माह पहले सोचा था कि अपने बाबूलाल मरांडी जी अचानक चर्चा के केंद्र में आ जाएंगे।

लेकिन ऐसा हुआ और अंदर ही अंदर ऐसा गुल खिला कि अब भाजपा वालों को झामुमो से कम और झाविमो से अधिक परेशानी हो रही है।

पता नहीं उन सज्जनों का क्या होगा, जो मरांडी जी को छोड़कर दास बाबू के साथ हो लिये थे।

पता नहीं इस बार मोटा भाई इनलोगों को दोबारा टिकट देंगे भी या नहीं।

और अगर टिकट मिल भी गया तो बाबूलाल को छोड़ जाने का क्या कुछ रिजल्ट निकलेगा।

महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव का थकान मिटाने का मौका ही नहीं मिले नये नये झंझट सामने आ गये।

अब महाराष्ट्र की परेशानी दूर हो तो नये सिरे से कुछ नया करने का अवसर मिलेगा।

अभी तो कमल फुल पर शेर झपट्टा मारने को तैयार नजर आ रहा है।

लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं। सिर्फ गाते रहिये कि जब तुम चाहो पास आते हो और जब तुम चाहो दूर जाते हो।

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