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पृथ्वी का मूल भूभाग कब टूटा इस पर फिर से वैज्ञानिक मतभेद

  • डेढ़ अरब पूर्व भी पृथ्वी अलग अलग खंडों में थी

  • उबलते लावा से ठंडा होने में लगा था दस लाख वर्ष

  • लावा के मौजूद होने के दौरान भी मौजूद था पानी

  • यह पानी यहां बना या बाहर से आया इस पर भी बहस

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः पृथ्वी का मूल भूभाग निश्चित तौर पर पहले एक था। बाद में अलग अलग

कारणों से यह टूटकर अलग अलग महाद्वीप में तब्दील होते चले गये। लेकिन यह कब

और कैसे हुआ इस पर नये सिरे से विवाद हो गया है। पहले यह माना गया था कि पृथ्वी का

मूल भूभाग कुछ करोड़ वर्ष पूर्व हो चुका था। बाद में इसमें और भी परिवर्तन हुए। अब नया

शोध यह बता रहा है कि डेढ़ अरब वर्ष पहले भी पृथ्वी का मूल भूभाग एक नहीं ही था।

इससे दो अलग अलग वैज्ञानिक सिद्धांतों के बीच अंतर हो गया है। वैज्ञानिक गणना के

मुताबिक करीब 3.2 खरब वर्ष पूर्व ही पृथ्वी पर जल की उत्पत्ति हो चुकी थी। इस दौरान

पूरे इलाके में सिर्फ पानी ही पानी था। उस वक्त अलग अलग महाद्वीपों के पानी के नीचे

डूबे होने की भी कल्पना नहीं की गयी थी। यानी उस वक्त पानी के अंदर होने के बाद भी

पृथ्वी पूरी एक थी।

बाद में पृथ्वी के अंदर मचे उथल पुथल और उल्कापिंडों की बारिश से माहौल बदलता चला

गया। इससे पृथ्वी के अंदर टेक्टोनिक प्लेटों की रगड़ से जमीन अलग अलग हिस्सों में

बंटती चली गयी। इसी वजह से जमीन के बड़े बड़े भूखंड पानी से ऊपर निकल आये। अब

उत्तर पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में हुए एक शोध से इस बात के प्रमाण मिले हैं कि 1.5 खबर

वर्ष पूर्व ही इन भूखंडों में बिखराव हो चुका था। यानी 3.2 खरब और 1.5 खरब वर्ष के बीच

की अवधि में ही यह बदलाव हुए थे।

पृथ्वी का मूल भूभाग एक से अनेक हुआ है

ऑस्ट्रेलिया के इस इलाके में वैज्ञानिकों ने समुद्र के अंदर से उन शिलाखंडों की खोज की है

जो इस बात के प्रमाण हैं कि तब जमीन के हिस्से बंट चुके थे। इससे नया वैज्ञानिक

सिद्धांत यह बन रहा है कि करीब 4.5 खरब वर्ष पूर्व धूलकणों और अंतरिक्ष में मौजूद

पत्थरों के आपसी रगड़ और मिलने से इस पृथ्वी की रचना हुई थी। उस दौरान यह उबलता

हुआ लावा के जैसा आग का एक गोला था। हजारों मील व्यास का यह गोला अंतरिक्ष में

पूरी तरह जल रहा था। इसी वजह से उसे ठंढा होने में भी करीब दस लाख वर्ष लगे थे। इसी

लावा के स्वरुप के ठंडा होने के दौरान ही हुई रासायनिक प्रतिक्रियाओं की वजह से अलग

अलग इलाके में अलग अलग खनिज पैदा बनते चले गये।

इस शोध के तहत अब अनुमान लगाया जा रहा है कि पृथ्वी पर जल का पहला हिस्सा भी

किसी उल्कापिंड के साथ ही किसी रुप में आया था। यह कहां पैदा हुआ, इस बारे में अभी

कोई पक्की जानकारी नहीं है। लेकिन यहां आने के बाद गर्म लावा और पानी के मिश्रण से

जो भाप पैदा हुआ वह वायुमंडल में फैलता चला गया। तब जाकर बारिश की प्रक्रिया इस

पृथ्वी पर पैदा हुई। इस शोध से जुड़े लोवा राज्य विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक और

सहायक प्रोफसर बेंजामिन जानसन कहते हैं कि इन तथ्यों के आधार पर भी पक्के तौर पर

यह नहीं माना जा सकता कि दरअसल पानी की उत्पत्ति पृथ्वी पर ही हुई है। हां यह

अवश्य माना जा सकता है कि पृथ्वी पर जब लावा उबल रहा था तब यहां पर्याप्त पानी

मौजूद हो चुका था।

लावा में पानी की बौछार से ही बना है वायुमंडल

जॉनसन और कोलाराडो विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफसर बोसवेल विंग ने अपने शोध

प्रबंध में इन तथ्यों का खुलासा करते हुए यह निष्कर्ष निकाला है कि पूरी पृथ्वी पर पानी

होने के दौरान भी अंदर से जमीन अलग अलग खंडों में बंटी हुई थी। इस बात को प्रमाणित

करन के लिए इन वैज्ञानिकों ने वहां अत्याधुनिक हाइड्रोथर्मल डेटिंग की विधि का

इस्तेमाल किया था। जिससे समुद्र के अंदर से लाये गये पत्थरों की जांच की गयी। वहां

पत्थरों पर मौजूद अन्य तमाम रासायनिक प्रतिक्रियाओं के प्रमाण और ऑक्सीजन के

कणों के विश्लेषण से ही ऐसा निष्कर्ष निकाला गया है। शोध दल ने वहां से करीब एक सौ

नमूनों को एकत्रित किया था। इसी शोध का नतीजा निकला था कि प्राचीन पृथ्वी में

ऑक्सीजन 18 की मात्रा बहुत अधिक थी और वर्तमान में यह ऑक्सीजन 16 के स्वरुप में

अधिक है। यानी उस कालखंड के पहले एक ही किस्म के ऑक्सीजन का होने का निष्कर्ष

भी यही है कि तब सारा ऑक्सीजन समुद्र के पानी में मौजूद था। इन दो अलग अलग

वैज्ञानिक निष्कर्षों की वजह से अब इस बात को प्रमाणित करने की कोशिश हो रही है कि

पानी के अंदर से जब जमीन बाहर निकली तो वह कब और कैसे अलग अलग हिस्सों में

विभाजित हुई।


 

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