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दिल के अरमां आंसुओं में बह गये




दिल के अरमां क्या हैं, वह कभी पूरे होते हैं तो कभी टूटते हैं। बेचारे छोटे नवाबों का यही

हाल है। अब बहुवचन में बोल रहा हूं तो कंफ्यूज मत कीजिए। भाई साहब मैं राहुल जी और

तेजस्वी जी की बात कर  रहा हूं। अगर बिहार में सिक्का चल जाता तो कांग्रेस में भी साहब

का सिक्का जम जाता। अब तो पुराने घोड़े भी बिदकने लगे हैं, कह रहे हैं कि नेतृत्व को

विचार करना चाहिए। ऊपर से सारा झंझट को संभाल लिया करते थे, वह अहमद पटेल

साहब भी अब नहीं रहे। बाकी लोग नेतृत्व में कुंडली मारे जो बैठे नजर आते हैं, उनमें से

कितने लोग पार्षद का चुनाव भी जीत पायेंगे, इस पर कांग्रेसियों को भी बहुत संदेह है।

सिर्फ गणेश परिक्रमा की बदौलत उनकी दुकानदारी चल रही है। अब गलती से कहीं

समीकरण उल्टा पड़ गया तो सारे के सारे रातों रात रिटायर कर दिये जाएंगे।

बर्थडे के दिन ही ऐसा हो गया तो तकलीफ हो जियादा होगा

बिहार की बात करें तो अपने जन्मदिन के दिन ही सत्ता का केक तेजस्वी के हाथ से नहीं

मुंह के सामने से फिसल गया। ऐसा मेरे साथ हुआ होता तो मै तो कई दिनों तक शोक में

पगलाया रहता। भला हो तेजस्वी यादव का कि फिर से मैदान में आ डटे हैं। दूसरी तरफ

अपने सुशासन बाबू फिर से कुर्सी पर तो सवार हो गये हैं लेकिन उनका बॉडी लैंग्वेज बुलंद

होने का संकेत नहीं दे रहा है। अब उनके पसंदीदा सुशील मोदी उनके साथ नहीं है। भाजपा

वालों की भी साजिश देखिये कि बिहार से पत्ता साफ करने के लिए छोटे मोदी को

राज्यसभा के लिए नामित कर दिया। यानी समझा जा सकता है कि बड़े मोदी के कार्यकाल

में छोटे मोदी को अब पटना से हटाकर दिल्ली ट्रांसफर किया जा रहा है। लेकिन भाजपा के

अंदर भी प्रेम कुमार और नंद किशोर यादव सरीखे नेताओं को दरकिनार कर भाजपा क्या

करना चाहती है, यह राफ साफ नहीं है। अंदरखाने में कुछ तो खेल चल रहा है, जिसका

नतीजा बाद में समझने में आने वाली बात है। इसलिए चुप रहिये और तेल के साथ साथ

तेल की धार भी देखते रहिए।

इसी बात पर एक चर्चित फिल्म का चर्चित गीत याद आ गया। फिल्म का नाम था

निकाह। जिसमें राज बब्बर हीरो थे और हीरोइन की भूमिका निभाते हुए सलमा आगा ने

ही यह गीत भी गाया था। गीत को लिखा था हसन कमाल ने और संगीत में ढाला था रवि

ने। गीत के बोल इस तरह थे।

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

हम वफ़ा करके भी तनहा रह गए

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

ज़िंदगी एक प्यास बनकर रह गई

ज़िंदगी एक प्यास बनकर रह गई

प्यार के क़िस्से अधूरे रह गए

हम वफ़ा करके भी तनहा रह गए

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

शायद उनका आख़री हो यह सितम

शायद उनका आख़री हो यह सितम

हर सितम यह सोचकर हम सह गए

हम वफ़ा करके भी तनहा रह गए

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मगर

फ़ास्ले जो दरमियाँ थे रह गए

हम वफ़ा करके भी तनहा रह गए

दिल के अरमां आँसुओं में बह गए

अब बंगाल की भी चर्चा कर लें क्योंकि अगला दंगल तो वहीं होना है। इस बार भी चुनाव से

पहले इधर से उधर और उधर से इधर आने जाने का सिलसिला तेज होने लगा है।

दरअसल भाजपा के सिपहसलार मुकुल राय भी कभी तृणमूल के ही सेनापति हुआ करते

थे। लिहाजा अपने संबंधों का फायदा उठाते हुए वे ममता दीदी की कुर्सी को लगातार

हिलाते डुलाते रहते हैं। लेकिन दीदी भी कम नहीं है। पूरी धरती पकड़ है। चुनाव का एलान

होने के पहले से अगले कई माह तक मुफ्त राशन देने का एलान कर गरीबों का दिल पहले

ही जीत लेने की चाल चल दी है। अब तो शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओँ का इधर से उधर

जाने से वोट पर कोई खास असर पड़ेगा, इसकी बहुत कम उम्मीद है। लेकिन इतना तो

तय है कि इस बार का बंगाल का चुनावी मैदान विख्यात पलाशी के युद्ध सरीखा जोरदार

होगा लेकिन यह राजनीतिक युद्ध होगा। भाजपा का बंगाल जीतना इसलिए भी जरूरी है

क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में उसे इस राज्य से काफी अधिक सफलता मिली है। अब

इसकी परख भी हो जाएगी कि भाजपा की टिकट पर जो लोग सांसद बने हैं, उनकी

लोकप्रियता बढ़ी है अथवा घटी है। या फिर लोकसभा चुनाव में भी लोगों ने सिर्फ नरेंद्र

मोदी का चेहरा देखकर ही वोट दिया था।

अमेरिकी में भी पब्लिक ने लंगड़ी मार ही दी

और अंत में दिल के अरमां आंसुओं में बहने का नजारा अमेरिका में भी देख लीजिए। क्या

क्या सपना देखा था बेचारे डोनाल्ड ट्रंप ने। अंततः उनका

सपना भी लगभग टूट गया। अब

तो बेचारे परोक्ष तरीके से इसे मानने भी लगे हैं। कितना मेहनत की थी लेकिन वहां की

पब्लिक भी भारतवर्ष जैसी ही है। पता नहीं क्यों लंगड़ी मार दी।



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