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जो वादा किया है निभाना पड़ेगा इलेक्शन करीब आ गया है भाई




जो वादा किया है उसका एक हिस्सा तो निभा दिया लेकिन इसके साथ ही यह जो इंडियन पब्लिक है वह दूसरे वादों की याद दिलाने लगती है। अरे यार ऑपोजिश में थे तो सरकार को कोसना काम था।




अब सरकार में हैं तो उन्हीं बातों पर हमारी टांग क्यों खींच रहे हैं। अजीब तो यह है कि जो चैनल वाले दिन रात गुणगान किया करते थे, अब वे भी मौका ताड़कर थोड़ा थोड़ा सुर बदलते नजर आने लगे हैं।

जब तब लोग मैडम स्मृति ईरानी और उनके पेट्रोल के दाम बढ़ने के दृश्यों को न सिर्फ याद करते हैं बल्कि दिखा दिखाकर लोगों की याद भी ताजी करने में लगे हैं।

जी हां कहा था कि पेट्रोल के दाम बढ़ रहे हैं तो क्या इस मुद्दे को लेकर अभी हल्ला करना जरूरी था। भइया मोदी जी ने दीपावली गिफ्ट तो दे दिया दाम कम कर दिया।

उनके चेले चपाटे भी मौके की तलाश में बैठे थे। आनन फानन में राज्य का वैट भी कम कर जनता को कितनी राहत दिलायी। इससे भी खुश नहीं हो तो तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता।
इसी बात पर एक बहुत पुरानी फिल्म का गीत याद आने लगा है।

फिल्म ताजमहल अपने जमाने की सुपरहिट फिल्म थी। इस गीत को लिखा था साहिर लुधियानवी ने और संगीत में ढाला था रोशन ने। इस गीत को स्वर दिया था मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर ने। गीत के बोल इस तरह हैं।

जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा

रोके ज़माना चाहे रोके खुदाई तुमको आना पड़ेगा
जो वादा…
तरसती निगाहों ने आवाज़ दी है
मुहब्बत की राहों ने आवाज़ दी है
जान-ए-हया, जान-ए-अदा छोड़ो तरसाना तुमको आना पड़ेगा

जो वादा…
ये माना हमें जाँ से जाना पड़ेगा
पर ये समझ लो तुमने जब भी पुकारा हमको आना पड़ेगा

जो वादा…
हम अपनी वफ़ा पे ना इलज़ाम लेंगे
तुम्हें दिल दिया है तुम्हे जाँ भी देंगे
जब इश्क़ का सौदा किया फिर क्या घबराना तुमको आना पड़ेगा

जो वादा…
चमकते हैं जब तक ये चाँद और तारे
न टूटेंगे अब एहद-ओ-पैमां हमारे
इक दूसरा जब दे सदा होके दीवाना हमको आना पड़ेगा

जो वादा…
हमारी कहानी तुम्हारा फ़साना
हमेशा हमेशा कहेगा ज़माना
कैसे भला कैसी सज़ा देदे ज़माना हमको आना पड़ेगा

जो वादा…
सभी एहल-ए-दुनिया ये कहती है हमसे
कि आता नहीं कोई मुड़के अदम से
आज ज़रा शान-ए-वफ़ा देखे ज़माना तुमको आना पड़ेगा

जो वादा…
बहुत जी लगाया ज़माने से हमने
बहुत वक़्त काटा बहाने से हमने
जब से हुआ तुमसे जुदा ये दिल न माना तुमको आना पड़ेगा




जो वादा किया
हम आते रहे हैं हम आते रहेंगे
मुहब्बत की रसमें निभाते रहेंगे
जान-ए-वफ़ा तुम दो सदा फ़िर क्या ठिकाना हमको,
आना पड़ेगा
जो वादा…
क्या कहा, पहले क्यों नहीं किया। अरे यार कुछ अपनी अकल भी लगाया करो।

पहले तो इलेक्शन का रिजल्ट इतना बुरा तो नहीं आया था। बताओ हिमाचल प्रदेश तक में खाट खड़ी कर दी इसी पब्लिक ने। सभी सीट हरा दिये।

लेकिन असम में तो झंडा बुलंद रहा ना। हां मानता हूं कि असम के रिजल्ट का उत्तरप्रदेश पर ज्यादा असर नहीं पड़ता जबकि हिमाचल का पड़ता है।

लेकिन सब कुछ देखकर चलना पड़ता है। लेकिन मध्यप्रदेश तो ठीक ठाक रहा ना।

इतना के बाद भी दिल है कि मानता नहीं

इससे भी दिल नहीं भरता क्या। माना कि बंगाल में लगातार पिटते जा रहे हैं लेकिन इसमें हमलोगों की क्या गलती है। वहां के सारे सिपाही आपस में ही दंगल करने में जुटे हैं।

अइसे कहीं राजनीति होती है क्या। जिनको जुटा कर लाये थे, उनमें से जो कमजोर दिल वाले थे, सारे छोड़कर ममता की छांव में जा खड़े हो रहे हैं।

इसलिए वहां हार गये तो अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है। बिहार तो ठीक है कि उसमें भी कोई कंफ्यूजन है। माना कि नीतीश बाबू तेज चैनल हैं कब क्या करेंगे पहले से अंदाजा लगाना कठिन है।

आज कल तो उनके लोग भी उन्हें पीएम मैटेरियल बताकर कुछ न कुछ मैसेज दे रहे हैं। लेकिन लगता है पंजाब में कैप्टन साहब का साथ मिल गया तो अकालियों को भाव देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब किसान वाला प्राब्लम सुलझ जाए तब ना।

इसके साथ ही चुनावी दंगल के अखाड़े की मिट्टी को उलटने पुलटने का काम भी भाई लोग चालू कर चुके हैं।

काम दोनों तरफ से चल रहा है क्योंकि दंगल शुरु होगा कि एकाएक तो धोबिया पछाड़ इस बार नहीं लग पायेगा। इसलिए अगर खुद नीचे गिरे तो अखाड़े की जमीन मुलायम रहनी चाहिए वरना चोट लग जाएगी।

वैसे अपना चुनावी चाणक्य फिलहाल तो चुप बैठा है लेकिन वह चुप बैठने वाला आदमी नहीं है। क्या पता पेगासूस का संकट सर पर मंडरा रहा है।

जो बाइडन ने इस कंपनी को काली सूची में डालकर परेशानी और बढ़ा दी है। अब इस माल को जिस किसी ने खरीदने का आदेश दिया होगा, उसका क्या होगा कालिया।



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