fbpx Press "Enter" to skip to content

आम आदमी के लिए दलों की झोली में क्या क्या







आम आदमी सिर्फ खास इसी चुनाव के मौके पर होता है।

वरना शेष पांच वर्षों तक उसे पूछने वाला कोई नहीं होता।

यह नियम सिर्फ नेताओं और राजनीतिक दलों पर लागू नहीं होता।

जिन अफसरों से मिलने के लिए आम जनता की एड़ियां घिस जाती हैं, वे

भी पूरी ताकत के साथ मतदान के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए हर स्तर

पर प्रयास करते रहते हैं। दरअसल जैसे जैसे नोटा का इस्तेमाल इस देश के

चुनाव में बढ़ता जा रहा है, आम आदमी से सत्ता की घबड़ाहट भी बढ़ती जा

रही है।

साफ बात है कि ऐसा नहीं है कि नोटा से राजनीतिक दलों को कोई परेशानी है।

वे तो आम आदमी के इस फैसले के हार जीत के फैसले के कम होने की वजह

से चिंतित हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र में भी इसके प्रभाव देखने को

मिले हैं, जहां आम आदमी ने चुनाव मैदान में खड़े किसी भी प्रत्याशी को मन

मुताबिक नहीं पाने की वजह से नोटा का बटन दबाया है। इस पूरी तैयारी और

ताम-झाम  के संबंध में एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने खास बात कही है।

उनके मुताबिक यही एक मौका है जबकि खर्च के मामले में ज्यादा खोज बीन

नही होती।

चुनाव की बहती गंगा के खर्च की गहन जांच कभी नहीं होती

इसलिए अफसर भी इस बहाने दिल खोलकर खर्च करते हैं। भले ही बाद में

गाड़ियों और होमगार्ड के जवानों का भुगतान वर्षों तक लंबित रह जाए लेकिन

चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता के लागू होने के बीच जनता को

मतदान केंद्रों तक लाने की जिम्मेदारी में अगर कोई पिछड़ गया तो उस

अफसर की भी शामत आ सकती है। जब मतदान ठीक ठाक होता है तो इस

तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है। इसलिए अब तो मतदान केंद्रों पर सबसे

पहले मतदान करने वालों को प्रमाणपत्र देने की प्रथा भी चालू कर दी गयी है।

इसका मकसद प्रारंभ से ही मतदान केंद्रों तक भीड़ को आकर्षित करना है।

ताकि समय समाप्त होने के बाद उसमें कोई खास दिक्कत नहीं आये। दूसरी

तरफ नेताओं की मजबूरी है कि इसी मौके पर अगर वह आम आदमी को खास

न समझें और उस अनुरुप आचरण करें तो उनका डब्बा गुल हो सकता है।

जनता नाराज हुई तो चुपचाप ही गाड़ी पलट देती है

आजकल आम आदमी भी काफी चालाक ही नहीं धूर्त भी हो चुका है। वह पहले

से  ऐसा कोई संकेत ही नहीं देता कि उसके दिमाग के अंदर क्या कुछ चल रहा

है। अब तो परिवार के अंदर भी सदस्यों का वोट एक तरफ जाएगा, इसकी कोई

गारंटी नहीं होती। हाल के कई चुनावों में इसके साक्षात प्रमाण मिल चुके हैं।

इस वजह से यह माना जा सकता है कि लोकतंत्र में असली ताकत आम

आदमी के हाथों ही है, यह सिर्फ और सिर्फ चुनाव के दौरान ही पता चल पाता

है। आम आदमी के नाम पर जो कुछ सरकारी योजनाएं शेष पांच वर्षों तक

आती जाती रहती हैं, उसमें जनता की क्या कुछ भागीदारी रहती है, इसके बारे

में हर किसी को पता है। काफी प्रचार प्रसार के बाद जिस पंचायती राज को

लागू करने की घोषणा की गयी थी, वह किस हद तक लागू हो पाया है, इसे भी

हम अच्छी तरह जानते हैं। आज भी पंचायतों को आर्थिक अधिकार प्रदान

करने में अफसर आना कानी करते हैं। इस आना कानी के दो कारण है। पहला

आरोप तो यह सही है कि आर्थिक अधिकार प्राप्त होने के बाद ग्राम स्तर के

कई निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने इस आर्थिक शक्ति का दुरुपयोग किया है।

अनेक मामलों में भ्रष्टाचार प्रमाणित भी हो चुके हैं। लेकिन दूसरा कारण

ज्यादा रोचक है क्योंकि ग्राम पंचायतों को वित्तीय अधिकार प्रदान करने के

बाद आम आदमी इन पैसों के उपयोग का फैसला करने लगता है। ऐसे में

अफसरों तक जो कमीशन पहले से पहुंचते रहे हैं, उसका रास्ता बंद हो जाता

है।

आम आदमी को ताकत देने में अब भी बाधक है व्यवस्था

आम आदमी को ताकत देने में कितने किस्म की अड़चनें हैं, इसे तो हम पांच

साल तक महसूस करते ही रहते हैं। हर प्रकार की योजनाओं के लिए नेता की

पैरवी अथवा पत्र के बिना आम आदमी का कोई काम नहीं हो सकता। सिर्फ

यह चुनाव ही है जहां आम आदमी बेझिझक अपना फैसला सुना सकता है और

उस आम आदमी को यह फैसला लेने से कोई रोक भी नहीं सकता। इसलिए

विधानसभा चुनाव के दौरान भी झारखंड का आम आदमी फिर से चर्चा के केंद्र

में है। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और नेता अपने आप को श्रेष्ठ बताने के

बाद भी हाथ जोड़कर जनता के आगे इसी वजह से गिड़गिड़ा रहे हैं क्योंकि

उन्हें भरोसा ही नहीं है कि आम आदमी का वह विश्वास पूरी तरह से जीत पाये

हैं। आम आदमी को भी चुनाव में मतदान के अलावा भी सरकार की

गतिविधियों में अब अपनी भूमिका का विस्तार कर लेना चाहिए ताकि सत्ता

और सरकार को हर पग पर यह एहसास हो कि जनता ही सर्वोपरि है।



Spread the love
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

One Comment

Leave a Reply

Mission News Theme by Compete Themes.