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आंदोलनकारियों को छोड़कर गांव जाने का फायदा क्या है

आंदोलनकारियों से मिलने में अब शायद भाजपा नेतृत्व को परहेज है। ऐसा स्वाभाविक

भी है क्योंकि पिछले छह वर्षों में पहली बार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को किसी

प्रवल प्रतिरोध को झेलना पड़ रहा है। दूसरी तरफ गुजरात से लेकर दिल्ली तक के नरेंद्र

मोदी के सफर को देखें तो अब तक उन्होंने इससे पहले कभी ऐसा प्रतिरोध झेला भी नहीं

था। अब इस बात से भी भाजपा का कोई नेता भी इंकार नहीं कर सकता है किसान

आंदोलन के मुद्दे पर भाजपा के दूसरे नेताओ की राय का अब कोई मतलब नहीं रह गया है।

फैसला तो नरेंद्र मोदी का ही है और उसे अमल में लाने का काम केंद्रीय गृह मंत्र अमित

शाह ने किया है। आंदोलन प्रारंभ होने के दौरान ही अमित शाह ने अपने अंदाज में किसानों

से बात की थी। शायद खुद अमित शाह को भी इस किस्म के आंदोलन और उससे जुड़े

किसान नेताओं की जमीनी पकड़ का अनुभव नहीं था। इसलिए वह पहले के जैसा ही

अपना तेवर अपनाते हुए आंदोलन वापसी का फैसला सुना बैठे। जो नतीजा निकलना था,

वही निकला। आंदोलन के तपे तपाये नेताओं ने चुपचाप निकलकर अपने आंदोलन को

तेज कर दिया। अब भाजपा नेता निरर्थक वार्ताओं का दौर से विमुख हो चुके हैं। शायद

किसान नेता राकेश टिकैत के आंसू निकलने के पहले ही भाजपा नेतृत्व या साफ शब्दों में

नरेंद्र मोदी ने यह फैसला कर लिया था कि अब बात नहीं करनी है। लेकिन पांसा इस तरीके

से पलट जाएगा, इसकी कल्पना उनकी राजनीतिक गणना में नहीं थी। दरअसल जाटलैंड

और पंजाब के किसानों के प्रतिरोध को कभी भाजपा ने झेला भी नहीं है। उनके स्थान पर

अगर कांग्रेसी होते तो वे पहले ही नर्म रुख अपना लेते क्योंकि उन्हें किसानों का प्रतिरोध

झेलने का अनुभव है।

आंदोलनकारियों की उपेक्षा का नुकसान कांग्रेस ने झेला है

कांग्रेस ने भी कुछ ऐसी ही गलती बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनकारियों में 

थी। जिसका नतीजा था कि कांग्रेस केंद्र और दिल्ली राज्य से हाथ धो बैठी है। इतने दिन

बीत जाने के बाद भी जनता की नाराजगी कांग्रेस के प्रति कम नहीं हुई है, यह दिल्ली में

दूसरी विधानसभा के चुनाव में फिर से साबित हो चुका है। अब किसानों के चालीस

संगठनों के नेताओ से वार्ता करने के बाद भाजपा इसे कमजोर कर मसल देने की रणनीति

में आंदोलनकारियों के दरकिनार कर अब सीधे किसानों तक पहुंचना चाहती है। इससे

पहले देश भर में भाजपा नेताओं को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी थी कि वे अपने अपने

इलाकों में जाकर कृषि कानूनों का फायदा जनता को समझा दें। नेताओं ने आलाकमान के

आदेश पर ऐसा किया भी लेकिन भाजपा नेतृत्व ने तब भी इस बात की समीक्षा नहीं की

कि उनकी कोशिशों का आखिर नतीजा क्या निकला है। नरेंद्र मोदी को खुद कमसे कम

जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का अनुभव तो रहा है। लेकिन उस वक्त वह विरोधी पक्ष

के थे। सत्ता में रहते हुए गुजरात से लेकर दिल्ली तक के अपने राजनीतिक सफर में श्री

मोदी ने ऐसा कुछ भी नहीं झेला है। जिसका नतीजा है कि उनके पास शायद यह अनुभव

भी नहीं है कि वे किस संकट की तरफ बढ़े चले जा रहे हैं। यह बात तो सार्वजनिक हो चुकी

है कि भाजपा ने अपने दायरे में इस बात का आकलन कर लिया है कि आंदोलनकारियों के

प्रभाव क्षेत्रों में चालीस सीटों का नुकसान उसे हो रहा है।

लेकिन इससे भी बड़ी बात पंजाब के शहरी निकाय के चुनावों से निकल कर आयी है, जहां

भाजपा का सूपड़ा साफ हो चुका है।

क्या मोदी और शाह किसी और को निपटाना चाहते हैं

अगर इन बातों को भी नरेंद्र मोदी नजरअंदाज कर रहे हैं तो नया सवाल स्वाभाविक है कि

वह ऐसे आंदोलन के प्रभाव क्षेत्रों से क्या भाजपा की ताकत को कम करना चाहते हैं। साफ

शब्दों में कहें तो क्या नरेंद्र मोदी को राजनाथ सिंह और नीतीन गडकरी के सक्रिय होने से

किसी तरह का भय है। वैसे यह भय नरेंद्र मोदी को कम और अमित शाह को अधिक होना

चाहिए क्योंकि सरकार में नंबर दो होने के बाद भी राजनीतिक तौर पर वह राजनाथ सिंह

अथवा नीतीन गडकरी के मुकाबले में कहीं नहीं टिकते हैं। भाजपा के अंदर भी कई किस्म

के भंवर बने हुए हैं, ऐसा दिल्ली से रांची तक साफ नजर आता रहता है। ऐसे में किसान

आंदोलन का अंतिम परिणाम भाजपा को कितना नुकसान पहुंचायेगा, इसका भी पता

चलना शेष है। मार्च और अप्रैल में उत्तर प्रदेश में होने वाले पंचायत चुनावों में भी इसका

एक और परीक्षण होगा। उधर राजनीतिक रणनीति के तहत सीधे किसानों और खाप

पंचायतों तक पहुंचने की भाजपा की कोशिशों पर पानी फिर गया है, यह भी सर्वविदित है।

हम यह भी जान चुके हैं कि संजीव वलियान के नेतृत्व में इन नेताओं को जाने का निर्देश

अमित शाह के द्वारा दिया गया था। अब ऊंट किस करवट बैठता है, यह देखने वाली बात

होगी।

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