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तो क्या छापेमारी की चाल यूपी की चुनावी राजनीति में बेकार गयी




चुनावी चकल्लस

  • मलिक ने वह बात कह दी है जो सच्चाई है
  • सपा प्रवक्ता राजीव राय से हुई थी शुरुआत
  • पीयूष जैन के यहां से बरामद हुआ काफी माल
  • अब समाजवादी इत्र से क्या मिला अता पता नहीं
राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः तो क्या हम मान लें कि आयकर की छापामारी से ज्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ है। दरअसल यह सवाल इसलिए प्रासंगिक है कि जब पीयूष जैन के यहां छापा पड़ा तो आनन फानन में वहां छापामारी के अंदर की तस्वीरें बाहर आयी।




भाजपा के लोग भी तुरंत ही बयान देकर समाजवादी पार्टी को कोसने में जुट गये। इसके बीच ही यह खुलासा हो गया कि यह दरअसल गलत निशाना है। उसके बाद से भाजपा की तरफ से पीयूष जैन की छापामारी पर कुछ बोलने से परहेज किया जाने लगा।

पुष्पराज जैन भाया पीयूष जैन अभी छापामारी राजनीति का दौर जारी हैसपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पहले ही कह दिया था कि दरअसल छापामारी पुष्पराज जैन के यहां होनी थी गलती से पीयूष जैन के यहां हो गयी। लेकिन पीयूष जैन के यहां इतना धन कहां से आया, यह प्रश्न यह नया प्रश्न खड़ा कर चुका है कि तो क्या भाजपा और खासकर नरेंद्र मोदी द्वारा काला धन समाप्त करने का दावा और नोटबंदी की कार्रवाई का दरअसल कोई असर ही नहीं पड़ा था।

अब दूसरी तरफ झांकते हैं तो नजर आता है कि सत्यपाल मलिक के बयान से पूरी भाजपा हतप्रभ है। दरअसल उन्हें इस बारे में कुछ कहने को सूझ नहीं रहा है। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के आभामंडल को बनाने वालों के लिए यह एक बड़ी चोट के जैसा ही है।

यह काफी सोच समझकर योजना के तहत किया गया था। इस महिमामंडन ने नरेंद्र मोदी की तस्वीर ही कुछ ऐसी बनायी गयी थी कि कोई उनसे सवाल नहीं कर सकता है। अब सत्यपाल मलिक ने कहा कि वह बहुत घमंड में थे। तो यह सच्चाई सामने आने के बाद वह आभामंडल शीशे की तरह टूटकर बिखरने लगा है, जिसे काफी सोच समझकर बनाया गया था।

तो क्या अब नरेंद्र मोदी का आभामंडल भी बिखर रहा है

वैश्विक लोकप्रियता में भारतीय प्रधानमंत्री अब भी सबसे ऊपर कायम

यह समझ लेना होगा कि फिलहाल नरेंद्र मोदी को जाट राजनीति ने उत्तरप्रदेश में उस पेंच में फंसा दिया है, जिसमें आगे और पीछे दोनों तरफ खतरा है। जाट राजनीति में किसान नेता राकेश टिकैत, उनके बड़े भाई नरेश टिकैत, चौधरी जयंत सिंह तो पहले से ही मोर्चाबंदी कर खड़े थे।




अब नया नाम भाजपा के जाट नेता और मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक का जुट गया है। लोग यह मानते हैं कि अगर सत्यपाल मलिक राज्यपाल के संवैधानिक पद पर नहीं होते तो उनका भी वही हाल होता तो सरकार के खिलाफ लिखने और बोलने वाले पत्रकारों का हुआ था।

बता दें कि आयकर विभाग के निशाने पर पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव और प्रवक्ता राजीव राय समेत चार अन्य लोग आए थे। ये सभी सपा से जुड़े हैं और अखिलेश यादव के करीबी हैं। तब आईटी ने लखनऊ से लेकर मऊ तक छापेमारी की थी। आयकर विभाग की टीम ने लखनऊ के जैनेंद्र यादव और मैनपुरी में मनोज यादव के घर पर भी छापेमारी की थी।

हालांकि तब जानकारी सामने आई थी, कि इनके यहां से इनकम टैक्स विभाग को कुछ खास हाथ लग नहीं पाया था। इसके बाद कानपुर में इत्र व्यापारी पीयूष जैन के यहां छापे पड़े, जहां से 257 करोड़ रुपये की बरामदगी की बात कही गई थी। इसे बीजेपी ने सपा का करीबी बताया था, हालांकि सपा का कहना था कि पीयूष जैन बीजेपी के करीबी हैं, सपा के नहीं। आईटी ने गलत जगह छापेमारी कर दी है। इसके कुछ दिन बाद ही आईटी ने सपा एमएलसी पुष्पराज जैन के यहां छापा मार दिया।

छापामारी भी राजनीति की शिकार हो चुकी है

ये भी अखिलेश यादव के काफी करीब हैं। तब अखिलेश ने खुद इस मामले पर एक प्रेस कांफ्रेंस करके बीजेपी पर निशाना साधा था। अब आईटी की टीम बिल्डर अजय चौधरी के ठिकानों पर पहुंची है। इन्हें अखिलेश यादव का करीबी माना जाता है।

इससे जनता के बीच भाजपा के पक्ष में अथवा खिलाफ संदेश जा रहा है, यह समझने वाली बात है। यह स्पष्ट हो चुका है कि वर्तमान सरकार चुनावी लाभ के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहती है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि ऐसी ही हरकत पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले भी हुई थी। उसका क्या नतीजा निकला है, यह सभी के सामने है।



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