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तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है

तेरी आंखों के सिवा की याद आज तो कमसे कम बीस विधानसभा क्षेत्र के तमाम प्रत्याशियों को आ ही रही होगी।

जिन तेरह सीटों पर खेल सिमट चुका है, उनके प्रत्याशी भी टकटकी लगाये हुए हैं।

अब बाकी तीन चरणों के लोगों की भी धड़कने तेज हो रही है।

वइसे कुल मिलाकर झारखंड विधानसभा की 13 और 20 यानी कुल जमा 33 सीटों का फैसला होने के बाद

ऊंट किस करवट बैठी है, इसका थोड़ा बहुत खुलासा होने के बाद भी असली रिजल्ट तो बाद में ही आना है।

तेरी आंखों के अलावा मेरी आंखों में भी इनदिनों आंसू ही आंसू हैं। यह खुशी और गम के नहीं है।

सिर्फ प्याज की कीमतों के आंसू हैं। पता नहीं पहले इसी मुद्दे पर सरकार उलट गयी थी।

मैं तो फिलहाल प्याज के आंसू रो रहा हूं

अब अपनी बारी है तो हर कोई खुद को शाकाहारी बताकर पीछा छुड़ा रहा है।

अरे भइया मैं भी तो बहुत कुछ पसंद नहीं करता लेकिन क्या मैं तो दुनिया जहान की खबरें रखता हूं।

सब्जी के हालत ऐसे हैं कि कद्दु के अलावा किसी और सब्जी को हाथ लगाने का मतलब है हाथ जल जाना।

यह कौन सा खेल है समझ में नहीं आ रहा है।

ऐसा भी नहीं है कि इस बार प्याज की फसल अच्छी नहीं हुई है।

जब फसल काटने की बारी थी तो हमलोगों ने कई बार छापा था कि मांग के मुकाबले उपज

अधिक होने की वजह से मंडियों में प्याज रखने की जगह नहीं है। यह सारा प्याज आखिर गया कहां।

मौका पाकर छक्का लगाने वाले कहीं महाराष्ट्र की उधेड़बुन का फायदा उठाकर अपनी गोटी लाल तो नहीं कर रहे हैं।

ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा है।

लेकिन शाकाहारी लोग प्याज अगर जमाखोरी कर रहे हैं तो इसे बेचकर होने वाले मुनाफे का फायदा क्या खाने में होगा,

यह समझने वाली बात है। दलील देने वाले भी अजीब किस्म की दलीलें देकर यह समझ बैठते हैं कि यह पब्लिक

एकदम भोंदू है और उसे कोई बात समझ में नहीं आती।

ज्यादा कंफिडेंस भी कई बार खतरनाक हो जाता है, यह बात कितनी बार और कितने लोगों को समझाया जाए।

इसी बात पर फिर से एक फिल्मी गीत याद आ रहा है।

फिल्म चिराग के लिए इस गीत को लिखा था मजरूह सुलतानपुरी ने और उसे संगीत में ढाला था मदन मोहन ने।

इस फिल्म को लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने दिल से गाया था।

गीत के बोल इस तरह हैं

तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

ये उठें सुबह चले, ये झुकें शाम ढले

मेरा जीना मेरा मरना इन्हीं पलकों के तले तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

पलकों की गलियों में चेहरे बहारों के हँसते हुए हैं मेरे ख़ाबों के क्या-क्या नगर इनमें बसते हुए

ये उठें सुबह चले, ये झुकें शाम ढले

इनमें मेरे आनेवाले ज़माने की तस्वीर है

चाहत के काजल से लिखी हुई मेरी तक़दीर है यह उठें सुबह चले, ये झुकें शाम ढले

ठोकर जहाँ मैने खाई इन्होंने पुकारा मुझे ये

हमसफ़र हैं तो काफ़ी है इनका सहारा मुझे ये उठें सुबह चले, ये झुकें शाम ढले

ये हों कहीं इनका साया मेरे दिल से जाता नहीं

इनके सिवा अब तो कुछ भी नज़र मुझको आता नहीं ये उठें सुबह चले, ये झुकें शाम ढले

तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है।

तअब दुनिया जहां का हाल चाल भी जान लीजिए कि डोनाल्ड ट्रंप इनदिनों अपने ही देश में महाभियोग के आरोपों का

सामना कर रहे हैं। उनके साथ संगी साथी उन्हें छोड़कर भाग रहे हैं। यह उस पुरानी कहावत की तरह है जिसमें कहा

गया है कि जब नाव डूबने लगती तो सबसे पहले चूहे भागने लगते हैं।

तेरी आंखों का यह असर वाशिंगटन से लेकर बहरागोड़ा तक नजर आया है

वाशिंगटन से लेकर रांची तक यह कहावत एक जैसा ही असर छोड़ती है, इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है।

अब पांच चरणों का चुनाव होने के बाद पता चलेगा कि किस किसकी नाव डूबने वाली है। वैसे झारखंड को इतना

हल्का भी समझना गलती होगी, यहां से जो गति और दिशा बनेगी वह आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल और

दिल्ली जैसे प्रदेशों का मिजाज भी यहीं से तय हो सकता है।

इसलिए तो यहां से लेकर वाशिंगटन तक सभी को तेरी आंखों की चिंता सताने लगी है।

अब तेरी आंखों से अगर वाकई नजरें फेर ली तो तय है कि अपना तो लुटिया डूब ही जाएगा।

और अगर लुटिया डूब गयी तो अगले पांच साल में क्या कुछ होगा, यह अभी से कह पाना कठिन है।

तो भाई लोग फिर से जोर से सांस लेकर बाबा रामदेव की तर्ज पर अनुलोम विलोम करते हुए तेरी आंखों की

मेहरबानी बनी रहे, इसके लिए प्रयासरत हो जाइये। बस रिजल्ट घोषणा तक की कसरत है।

उसके बाद तो पांच साल आराम ही आराम रहेगा।

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