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बैंक बेचकर क्या हासिल करना चाहती है सरकार




बैंक बेचकर अपनी हिस्सेदारी कम करने की तैयारी केंद्र सरकार की है। इसके पीछे सरकारी तर्क यह




है कि इससे बैंकों के संचालन और बार बार उन्हें आर्थिक मदद करने की जिम्मेदारी कम होगी। यानी

सरकार यह मान रही है कि अब तक बैंकों को जो पैसा दिया गया है, उसके सार्थक और उत्साहवर्धक

परिणाम नहीं निकले हैं। इसके बाद भी सरकार ने किसी भी मंच पर अब तक यह नहीं बताया है कि

सरकार की तरफ से देश के बड़े पूंजीपतियों का कितना कर्ज माफ किया गया है। यूं तो हम जानते हैं

कि कोरोना संकट के बीच भी अनेक ऐसे बड़े बकायेदारों के कर्ज को बट्टा खाता में डाल दिया गया था।

जिसके बारे में सवाल उठने के बाद सरकार की तरफ से यह सफाई आयी थी कि कोई कर्ज माफ नहीं

किया गया है सिर्फ उन्हें बट्टा खाता में डाला गया है। अब बट्टा खाता में डाल देने के बाद क्या उस

कर्ज की वसूली होगी, इस सवाल का उत्तर सरकार की तरफ से नहीं दिया गया था। अब जो नई

जानकारी सामने आयी है, उसके मुताबिक केंद्र सरकार उन बैंकों में कम से कम 26 प्रतिशत

हिस्सेदारी रखेगी, जिनका निजीकरण किया जाएगा। सरकार फिलहाल सार्वजनिक क्षेत्र (पीएसबी)

के दो बैंकों के निजीकरण पर विचार कर रही है। बैंकिंग कंपनी (अधिग्रहण एवं इकाइयों का

स्थानांतरण) अधिनियम, 1970 के प्रावधानों के अनुसार इस समय सरकार के लिए सार्वजनिक क्षेत्र

के किसी बैंक में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी रखना अनिवार्य है। यह कानूनी बाध्यता खत्म करने के लिए

सरकार संसद के आगामी सत्र में बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 पेश करेगी। इससे

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार को अपनी हिस्सेदारी घटाकर 26 प्रतिशत करने की इजाजत

मिल जाएगी।

बैंक बेचकर क्या अपनी करतूत छिपाने की कोशिश

सूत्रों ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार की न्यूनतम हिस्सेदारी घटकर 26 प्रतिशत हो

जाती है तो संस्थागत एवं सार्वजनिक निवेश बढ़ जाएगा, जिससे सरकारी खजाने को बेहतर कमाई

भी होगी। सूत्रों ने यह भी कहा कि इस कदम से सरकार को निजीकरण प्रक्रिया आगे बढ़ाने और

विनिवेश लक्ष्य हासिल करने में अच्छी खासी मदद मिलेगी। इसके अलावा पूंजी के लिए बैंकों की

सरकार पर निर्भरता भी कम हो जाएगी। प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार नए कानूनी प्रावधानों से

सरकार भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ सलाह-मशविरे के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की




निजीकरण योजना तैयार कर सकेगी। इस संशोधन विधेयक में कंपनी कानून, 1956 के प्रावधानों

की जगह कंपनी कानून, 2013 के प्रावधान लाए जाएंगे। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अंकेक्षकों

(ऑडिटर) से जुड़ी शर्तें भी होंगी। विधेयक में निदेशकों को अयोग्य ठहराए जाने संबंधी नए प्रावधान

भी होंगे। इसमें चेयरमैन, पूर्णकालिक निदेशक और निदेशक मंडल की सेवाओं से जुड़े नियम एवं

शर्तें भी शामिल होंगी। इसके अलावा कानून में नई धाराएं शामिल की जएंगी, जिनसे प्रत्येक

निदेशक के लिए कंपनी में अपने हितों का खुलासा करना अनिवार्य हो जाएगा। बैंक अधिकारियों

द्वारा लिए गए निर्णयों को कानूनी सुरक्षा देने के लिए एक नया प्रावधान लाया जाएगा। इसके तहत

अगर किसी अधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र में रहकर अच्छी भावना से कोई निर्णय लिया है तो

उसका प्रतिकूल या अवांछित परिणाम आने पर उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी। सरकार

द्वारा प्रस्तावित संशोधनों से पहले के मुकाबले ज्यादा पेशेवर निदेशक मंडल तैयार करने में मदद

मिलेगी। एक अधिकारी ने कहा कि इससे प्रबंध स्तर पर अधिक विशेषज्ञता वाले लोग आ सकेंगे

और उन्हें बेहतर पारितोषिक भी प्रदान किया जा सकेगा।

बड़े बकायेदारों के कर्ज की वसूली कैसे होगी बड़ा सवाल है

इतनी कागजी कार्रवाई के बाद भी यह सवाल अनुत्तरित ही है कि आखिर इन बैंकों के बीमार होने

की वजह बड़े बकायेदारों को दिये गये कर्ज की वसूली नहीं होने के अलावा भी कुछ और है क्या। यह

स्पष्ट है कि इस किस्म के कर्ज का अंतिम परिणाम क्या होता है वह सारा देश नीरव मोदी और

विजय माल्या के मामले में देख चुका है। इसलिए पुराने पापों पर पर्दा डालने से तो बेहतर है कि

सरकार बैंकों के निजीकरण से पहले यह स्पष्ट करे कि इन बैकों की आर्थिक स्थिति बिगड़ने की

असली वजह क्या है। अगर पूंजीपतियों को दिया गया कर्ज वापस नहीं होना इसकी वजह है तो आम

जनता की जेबों पर डाका डालने वालों से इस कर्ज की वसूली हो। वैसे यह तय है कि जब कर्ज वसूली

की बात आयेगी तो अनेक मामले ऐसे भी सामने आयेंगे, जिनमें पता चलेगा कि कर्ज लेने वालों के

पास इतना पैसा लौटाने की हैसियत ही नहीं है। वहां से जो दूसरा सवाल पैदा होगा, वह यह होगा कि

फिर आखिर यह पैसा गया कहां है। यह भारतीय राजनीति के हाल के दिनों के घटनाक्रमों से जुड़ा

हुआ मसला है, जिसका खामियजा देश की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।



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