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क्या से क्या हो गया बेवफा तेरे प्यार में .. .. ..

क्या से क्या हो गया। कहां तो कई चैनल वाले किसी शिकारी गिद्ध की तरह नजर गड़ाये

बैठे थे कि अब शिकार मरने वाला है लेकिन यह शिकार को दोबारा जिंदा होकर और बड़ा

हो गया। अंग्रेजी कथाओं में एक फीनिक्स पक्षी की बात आती है। जिनलोगों ने जादुई

कारनामों पर आधारित फिल्म हैरी पॉर्टर देखी होगी, उन्हें भी यह पक्षी याद होगा जो आग

में जलकर दोबारा जन्म लेता है। यह तो कुछ वैसी ही बात हो गयी। सरकार, पुलिस, टीवी

चैनल और गुंडे सभी सेट थे। फिर लगा कि बस कुछ मिनटों की बात हैं लेकिन भाई ने आंसू

क्या बहाये, सब कुछ पलक झपकते बदला ही चला गया। जी हां मैं किसान आंदोलन की

बात कर रहा हूं। 26 जनवरी को क्या कुछ हुआ इस पर पहले तो संदेह था कि क्या वाकई

किसान ऐसा कर सकते हैं। लेकिन बाद में सारे घटनाक्रम पानी की तरह साफ होते चले

गये। भला हो सोशल मीडिया में सक्रिय रहने वाले किसानों का जो स्थापित और बड़े टीवी

चैनल का अपने मोबाइल से मुकाबला करते रहे और आज कहा जा सकता है कि मोबाइल

से प्रसारित वीडियो ने टीवी चैनलों द्वारा फैलाये गये झूठ को बेनकाब कर दिया है। लेकिन

मेरी चिंता इससे और बढ़ रही है। चंद टीवी चैनलों की हरकतों की वजह से पत्रकारिता पर

जो विश्वसनीयता का संकट छा गया है, वह कैसे दूर होगी। अर्णव टाइप के लोग क्या यह

मानकर चल रहे हैं कि वे कल भी सरकार के संरक्षण में इसी तरह की हरकतें करते रहेंगे।

अब तो उनका व्हाट्सएप चैट सार्वजनिक होने के बाद भाजपा के अनेक नेता भी यह

समझ चुके हैं कि अर्णव गोस्वामी की नजरों में अन्य भाजपा नेताओं की असली औकात

क्या है।

कल अगर सरकार बदलेगी तो इन मीडिया वालों का क्या होगा

अब कल अगर सरकार बदली या नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह की जोड़ी के बदले कोई और

सत्तारूढ़ हुआ तो क्या होगा। ऐसे चमचो की जगह कहां होगी, यह समझना कठिन नहीं

है। हम भारतीयों की याददाश्त थोड़ी कमजोर है, इसलिए फिर से याद दिला दें कि नरेंद्र

मोदी जब प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में शामिल हो रहे थे तो टीवी चैनलों पर उनके

झंडाबरदार पत्रकारों का वर्तमान हालत देख लीजिए। सभी एक एक कर इतिहास बना दिये

गये हैं। इसी बात पर एक पुरानी हिंदी फिल्म का गीत फिर से याद आने लगा है। फिल्म

गाइड को कोई भूल नहीं सकता क्योंकि यह अपने जमाने की एक सुपर हिट फिल्म थी।

इस गीत को लिखा था शैलेंद्र ने और उसे संगीत में ढाला था सचिन देव वर्मन ने। इस गीत

को स्वर दिया था मोहम्मद रफी ने। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

क्यासे क्या हो गया, बेवफ़ा ऽऽऽ

तेरे प्यार में

चाहा क्या क्या मिला, बेवफ़ा ऽऽऽ

तेरे प्यार में

चलो सुहाना भरम तो टूटा

जाना के हुस्न क्या है, हो ओ ओ

चलो सुहाना भरम तो टूटा

जाना के हुस्न क्या है

कहती है जिसको प्यार दुनिया

क्या चीज़ क्या बला है

दिल ने क्या ना सहा, बेवफ़ा ऽऽऽ

तेरे प्यार में

चाहा क्या …

तेरे मेरे दिल के बीच अब तो

सदियों के फ़ासले हैं, हो ओ ओ

तेरे मेरे दिल के बीच अब तो

सदियों के फ़ासले हैं

यक़ीन होगा किसे कि हम तुम इक राह संग चले हैं

होना है और क्या, बेवफ़ा ऽऽऽ

तेरे प्यार में

चाहा क्या …

अब फिर से जो कुछ जानकारी सोशल मीडिया के जरिए सार्वजनिक हो चुकी है उसकी बात

करें तो स्पष्ट है कि किसान आंदोलन को बदनाम और कमजोर करने के लिए ही 26

जनवरी को रूटों में गड़बड़ी की गयी थी। यह काम स्पष्ट तौर पर दिल्ली पुलिस का था।

क्या से क्या में तो राज खुलते ही चले जा रहे हैं

लाल किला के अंदर किसानों के पहुंचने के पहले ही कई नये ट्रैक्टरों पर सवार लोगों को

वहां प्रवेश करा दिया गया था ताकि दूर से आने वालों को यह नजर आये कि किसानों का

जत्था लाल किला पर चला गया है। कुछ सरकार भक्त चैनलों ने बार बार यह झूठ फैलाने

की कोशिश की कि किसानों ने तिरंगे का अपमान किया और खालिस्तानी झंडा फहरा

दिया। अब सब कुछ पानी की तरह साफ है लेकिन यह सरकार भक्त चैनल अपनी झूठ के

लिए माफी तक नहीं मांग रहे हैं। दिल्ली पुलिस के सब्र की तारीफ करने वाले यह नहीं बता

रहे हैं कि पुलिस की लाठी से कितने लोगों को चोटें आयी हैं। पंजाब के एक सौ से अधिक

लोग अब तक गायब क्यों हैं, उनमें से कितनों को गिरफ्तार किया गया है। लेकिन असली

बात तो यही है कि क्या से क्या हो गया क्योंकि सोचा था कि फिर से जेएनयू, दिल्ली दंगा

और अन्य घटनाओं की तरह झूठ परोसकर जनता को गुमराह करने में कामयाबी मिल

जाएगी। लेकिन इस बार तो सोशल मीडिया के चंद खबरों ने ही सारे ऐसे टीवी चैनलों के

मात दे दिया है। भला हो झूठ की इन फैक्ट्रियों का, जो जनता को अपने झूठ की बदौलत

समझदार बनाते जा रहे हैं।

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