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पहले अपनी जेब तो टटोल ले फिर रईसी दिखाये सरकारें




पहले अपनी जेब पर हाथ डालकर पैसा देख समझ लेने के बाद ही हम बाजार में कुछ

खरीदद्दारी करते हैं। कई लोगों के पास आज के दौर में पैसे नहीं डेविड अथवा क्रेडिट कार्ड

होते हैं। ऐसे लोग नकदी लेकर चलना से बचते हैं। लेकिन वैसी स्थिति में भी वे भी पहले

अपनी स्थिति को समझ लेने के बाद ही इसका उपयोग कर सामान खरीदते हैं। यह

भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रचलित नियम है। यह सवाल इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि

केंद्रीय कर्मचारियों को बोनस देने के बाद अब केंद्र सरकार विदेश से कर्ज लेने का मन बना

रही है। दरअसल यह एक कड़वा सच है कि कोरोना की वजह से सिर्फ भारतवर्ष ही नहीं

बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तबाह हो गयी है। ऐसे में देश के भीतर ढांचागत

विकास के लिए धन कहां से आयेगा, यह बड़ी बात है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस चिंता

से ग्रस्त हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि इस आर्थिक कमी को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार

नामी विदेशी फंडों से बात करने वाली है। प्रधानमंत्री की पहल ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण हो

जाती है जब कोविड महामारी की वजह से देश में पूंजीगत व्यय में खासी कमी आई है।

आर्थिक गतिविधियां सुस्त होने के बाद कंपनियां नई परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ा रही हैं।

सरकार को लगता है कि विदेशी फंडों से मिलने वाली पूंजी देश में आर्थिक गतिविधियों को

तेजी देने में इस्तेमाल की जा सकती है। लेकिन क्या ऐसा कर हम अपनी आने वाली

पीढ़ियों पर अधिक आर्थिक बोझ तो नहीं लादने जा रहे हैं, इस पर पहले ही विचार कर

लिया जाना चाहिए। यह देश का एक ऐसा कड़वा सच है जो कोरोना काल की वजह से

हमारी समझ में आया है।

कोरोना संकट ने हमें कड़वा लेकिन काम का अनुभव दिया

यह सत्य यह है कि सरकारें भी पूरी तरह जनता के पैसों पर आश्रित है। यानी आम जनता

परिश्रम करे, उपार्जन करें और उससे सरकारों को कर भुगतान कर सरकारी मशीनरी को

चालू रखे। जब ऐसी स्थिति है तो जो पैसा लगा रहा है यानी देश की आम जनता, उससे भी

पूछा जाना चाहिए कि किस पूंजीगत व्यय के लिए वह सहमत है। अपने राजनीतिक

फायदे के लिए बार बार जनता के परिश्रम से अर्जित किये हुए धन को उड़ा देना

राजनीतिक और आर्थिक समझदारी के खिलाफ का फैसला है। निश्चित तौर पर बड़े

औद्योगिक और व्यापारिक घराने सरकार का इस फैसले का समर्थन करेंगे, जिसमें विदेश

से धन जुटाने की बात कही जा रही है। लेकिन इन घरानों के समर्थन से ज्यादा जरूरी आम

जनता की राय जानना है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोरोना लॉक डाउन के दौरान जब

जनता ने कर का भुगतान नहीं किया तो सरकारों की हालत क्या हो गयी है, यह खुली

आंखों से दिख रहा है। इससे एक बात और स्पष्ट है कि देश की जनता पर गैर योजना मद

के आर्थिक व्यय का अतिरिक्त बोझ लादा गया है। कोरोना के वैश्विक संकट से सामना

नहीं होता तो सरकारों का काम काज आखिर चलता कैसे है, यह शायद देश की आम

जनता समझ भी नहीं पाती। अब चूंकि बात समझ में आ गयी है तो जिसके पैसे से सारा

कुछ चलता है उसे सरकारें भी मालिक का दर्जा दे और उसकी राय हासिल करे। हम

ग्रामीण विकास के लिए जब ग्राम सभाओं को मजबूत करने की बात करते हैं तो उसकी

पीछे की मानसिकता भी यही होती है।

पहले अपनी जेब का सवाल तो जीएसटी विवाद की वजह से

वरना जीएसटी लेने के बाद भी राज्य सरकारों को उसका हिस्सा देने से इंकार कर केंद्र

सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके पास धन की कमी है। लेकिन इतना धन कैसे और

किस मद में खर्च हो रहा है, उस पर भी नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। जो

कर भुगतान कर सरकार की गाड़ी खींच रहा है, उस पर नये नये तरीके से कर लादने से

बेहतर है कि सरकार अपने नॉन प्रोडक्टिव खर्च को कम करें। वैसे भी कोरोना काल में यह

बात समझ में आ गयी है कि बैठकों के लिए दिल्ली आने जाने का विमान किराया का खर्च

भी आखिर एक बोझ ही है। अब तो सूचना तकनीक की मदद से इसे बिना दिल्ली गये भी

पूरे देश अथवा दुनिया में किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक

सकारात्मक पहल है और मौजूदा समय में इसकी अहमियत और बढ़ जाती है। कागजी

तौर पर देखें तो कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, अमेरिका आदि देशों के पेंशन फंड भारत में

निवेश करने में खासी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। लेकिन पहले अपनी जेब और हैसियत को

आंके बिना अगर हम आगे बढ़े तो चीन की आक्रामक अर्थनीति का हम मुकाबले कैसे कर

पायेंगे, यह भी सरकार को कर्ज लेने से पहले ही बता देना चाहिए

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