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ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में भीषण आग आखिर क्यों

ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में भीषण आग लगी हुई है। इस इलाके के

नजदीक रहने वाले इंसानों को तो भाग निकलने का मौका मिल गया

था। लेकिन जंगलों में रहने वाले करोड़ों जानवर इस आग की भेंट चढ़

गये हैं, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है। वहां का आपदा दल इस दिशा

में बचाव और राहत का कार्य युद्ध स्तर पर चला रहा है। इस मौके पर

प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के अवकाश पर बाहर होने तक की लोगों ने

आलोचना की है। खुद प्रधानमंत्री ने इसके लिए माफी भी मांग ली है।

यह सारे घटनाक्रम इस तरफ इशारा कर रहे हैं कि दुनिया का पर्यावरण

अब तेजी से बिगड़ता जा रहा है। प्रकृति अपने दायरे में जितना कुछ

संभाल सकती थी, उसे पृथ्वी की रचना से लेकर आज तक संभाला ही

है। लेकिन अब प्रदूषण की स्थिति शायद उसकी पकड़ से बाहर जा रही

है। इसी वजह से दुनिया के अनेक इलाकों में बेमौसम बाढ़ से तबाही

का आलम है। इसी क्रम में हमें याद कर लेना चाहिए कि ऐसी आपदा

सिर्फ ऑस्ट्रेलिया में ही नहीं आयी है। एशिया, अफ्रीका और अमेरिकी

महाद्वीप के देशों पर भी ऐसी ही आपदा आयी है। जंगल की आग की

बात करें तो अमेरिका के कैलिफोर्निया इलाके में लगी आग की वजह

से जंगल के पास के अनेक उद्योग स्वाहा हो गये थे। आग से हुए

नुकसान और घुटन की वजह से हजारों उद्योग बंद करने पड़े थे

जबकि जंगल में लगी आग के दायरे में आने वाले इलाकों के लोगों को

हटाना पड़ा था। आखिर ऐसा हो क्यों रहा है। यह सवाल इसलिए भी

जरूरी है क्योंकि पृथ्वी की स्थिति पर्यावरण के मामले में एक टाइम

बम के जैसी हो चुकी है।

ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की आग सबके लिए चेतावनी

यह टाइम बम कभी भी फट सकता है। और अगर यह तबाही आयी तो

दुनिया का बहुत बड़े हिस्से को इसकी चपेट में आना पड़ेगा। ऐसा नहीं

है कि इस पर वैज्ञानिक अभी कोई चेतावनी दे रहे हैं। काफी अरसे से

वैज्ञानिक इसके बारे में बार बार पूरी दुनिया को आगाह करते आये हैं।

ग्रीन लैंड और उत्तरी ध्रुव के साथ साथ हिमालय जैसे इलाकों में

ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना इसके शुरुआती संकेत थे। बर्फ के

पिघलने के कारण को आसानी से इस बात से समझा जा सकता है कि

बर्फ पिघल रहा है यानी तापमान बढ़ रहा है। अब वहां से बर्फ पिघलने

लगे तो समुद्र का संतुलन भी तेजी से बिगड़ता जा रहा है। वहां के

लाखों टन बर्फ का जो पानी समुद्र में आ रहा है, वह कई इलाकों को नये

सिरे से अपनी चपेट में ले रहा है। समुद्री तट पर बसे अनेक शहरों को

इस परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जहां यह प्रभाव अधिक है,

वहां से लोगों के अन्यत्र जाने का सिलसिला भी प्रारंभ हो चुका है। ऐसा

इसलिए हो रहा है कि समुद्री जल के शहरों के अंदर चले आने की वजह

से लोगों को समुद्री जीवों से खतरा है और वे बार बार इस पानी के

बहाव में घिरना पसंद नहीं करते। कई आलीशान शहरों में इसी वजह

से अब संपत्ति कौड़ी के भाव बिक रही है क्योंकि इसके खरीददार नहीं

मिल रहे हैं। इस गर्मी का ही प्रभाव है कि अब हम यह जान चुके हैं कि

पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव भी अपना पूर्व इलाका छोड़कर रुस के साइबेरिया

की तरफ खिसक रहा है। इस बदलाव का भी पूरी दुनिया के मौसम चक्र

पर असर पड़ना एक स्वाभाविक वैज्ञानिक बात है।

बेमौसम बारिश और मौसम चक्र का बदलना भी निशानी है

बेमौसम बारिश की वजह से नववर्ष के बाद से जो तबाही कई देशों में

आयी है, उसे भी इसी मौसम के चक्र के बदलाव का एक नया प्रभाव

समझा जा सकता है। पहले इस मौसम में बारिश को लेकर लोग उतने

सतर्क नहीं रहते थे। लेकिन लगातार वर्षा और बाढ़ ने इन इलाकों में

रहने वालों को नये सिर से स्पष्ट चेतावनी संकेत जारी कर दिया है।

भारत में भी हम अक्सर ही इस बदलाव को महसूस कर रहे हैं। केरल

से लेकर केदारनाथ तक के हादसे हमारे लिए कोई प्राचीन इतिहास की

बातें नहीं हैं। इसलिए अब ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग के

दूरगामी प्रभाव को भी समझ लेना चाहिए। इस गर्मी से पृथ्वी का

ऊपरी सतह पर जो गर्म हवा के झोंके पहुंच रहे हैं, वे अन्य इलाकों

में नये किस्म की परेशानी पैदा कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया के पास के ही

ह्वाइट द्वीप पर ज्वालामुखी विस्फोट भी कोई पुरानी घटना नहीं है।

इस ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान वहां घूमने गये अनेक पर्यटक मारे

गये हैं। ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग से हमें यह समझ लेना

चाहिए कि अब बहुत हो चुका है। अगर अब भी यह क्रम नहीं रुका तो

किसी भी पल कभी न रुकने वाली तबाही का जो दौर प्रारंभ होगा, वह

पूरी दुनिया का नक्शा बदलकर रख देगा।

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