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न्यायपालिका को साहसिक फैसले के लिए धन्यवाद







न्यायपालिका ने अपने एक साहसिक कदम से करीब पांच सौ वर्ष पुराने एक विवाद का समाधान तलाशने का काम किया है।

यह अदालती फैसला ब्रिटिश राज के जमाने से विवाद के जारी रहने के बाद आया है।

इस दौरान कई बार अनेक अदालतों का चक्कर काट चुका यह फैसला इस वजह से लिया जा सका

क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने इसके लिए नियमित सुनवाई की।

इसलिए न्यायपालिका का धन्यवाद किया जाना चाहिए।

अनेक मामलों में न्यायपालिका के फैसले से हम सहमत नहीं होते।

इसकी खास वजह से अपनी निजी सोच का तार्किक गणना पर हावी होना होता है।

वर्तमान में भी अनेक लोग होंगे, जो शायद अदालत के इस फैसले से सहमत नहीं होंगे।

लेकिन लोकतंत्र में इस किस्म की असहमति के पूरी गुंजाइश बनी रहे, यही भारतीय संविधान की विशेषता है।

लेकिन अब फैसला आने के बाद सबसे पहले उनलोगों से सवाल किया जाना चाहिए,

जिन्होंने सबसे पहले अदालत द्वारा त्वरित सुनवाई करने से इंकार करने के बाद कई किस्म के सवाल उठाये थे।

विशेष उल्लेख के दौरान ही सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने

यह साफ कर दिया था कि सर्वोच्च न्यायालय किस की जरूरत को ध्यान में रखते हुए

इस मामले की त्वरित सुनवाई नहीं करेगी।

न्यायपालिका ने पहले ही साफ कर दिया था कि वह किसी दबाव में नहीं आयेगी

उस वक्त अनेक लोगों ने इस कड़ी टिप्पणी की काफी आलोचना भी की थी।

लेकिन अपने कानूनी परिधि में संवैधानिक पीठ का गठन कर जब अदालत ने लगातार सुनवाई करने के फैसला किया तो कई लोगों को हैरानी हुई थी।

यह तथ्य प्रमाणित है कि इस लगातार सुनवाई के दौरान ही कई पक्षकारों ने इस लगातार सुनवाई का विरोध किया था।

उनका तर्क था कि वे इतने कम समय की वजह से मामले की सही तरीके से तैयार नहीं कर पाते हैं।

लेकिन इन तमाम तर्कों को नजरअंदाज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई जारी रखी

और अंततः एक सर्वसम्मत फैसले तक पहुंचे, यही बड़ी बात है।

अगर इस फैसले में सर्वसम्मति नहीं होती तब भी अदालत का सम्मान उतना ही कायम रहता

क्योंकि यह क्या फैसला आया है, उसपर आधारित नहीं था।

यह फैसला तो न्यायिक सक्रियता वाद की वजह से था।

206 साल से जो मामला चलता आया है, उसका निष्पादन पहले भी किया जा सकता था

लेकिन अनेक अदालतों ने इसके दूरगामी परिणामों को भांपते हुए फैसला सुनाने के बदले

उसे टालने की नीति पर अमल किया।

यह पहला मौका है जबकि न्यायमूर्ति रंजन गोगाई की अगुवाई में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने

अपने तमाम कार्यों के बीच से इस मामले के लिए समय निकाला

और अंततः एक निष्कर्ष पर पहुंचने में कामयाब रहे।

अदालत ने संविधान के उल्लंघन की बात भी साफ साफ कही है

इससे तय हो गया है कि यह खंडपीठ न्यायिक परिधि में इस अदालती प्रक्रिया का निष्पादन चाहती थी।

इस एक फैसले से अब अन्य अदालतों को भी साहसिक फैसला लेने का मानसिक संबल प्राप्त होगी,

ऐसा माना जा सकता है।

संवैधानिक खंडपीठ ने पूरे मामले के हर पक्ष के तर्क को अपने फैसले में शामिल करने के बाद वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अपना निष्कर्ष निकाला है।

यह बड़ी बात है। साथ ही इस फैसले में जिन तथ्यों का उल्लेख किया गया है, उस पर भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है।

अदालत ने मसजिद के लिए अलग से जमीन उपलब्ध कराने की बात कही है।

लेकिन असली मुद्दा इस विवादित ढांचा को ध्वस्त करने की कार्रवाई के संबंध में है।

जिस मामले का फैसला अभी आना शेष है।

इस पीठ ने माना है कि अदालती निर्देश के बाद भी वहां ढांचा को ध्वस्त किया जाना एक असंवैधानिक कार्रवाई थी।

इसलिए उस पूरी प्रक्रिया में शामिल लोग संविधान के उल्लंघन को दोषी हैं।

लिहाजा भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी एवं अन्य लोगों को इस फैसले के बाद उस वक्त की कारसेवा के बारे में अपनी राय व्यक्त करना चाहिए।

साथ ही उस दौर के घटनाक्रमों पर सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अभी जो राय जाहिर की है,

उसे भी एक मार्गदर्शक सिद्धांत के तौर पर स्वीकारा जाना चाहिए।

न्यायपालिका के ऐसे ही ऐतिहासिक फैसलों की वजह से भारतीय न्यायपालिका अब भी तमाम विसंगतियों के बाद भी आम जनता की नजरों में भरोसेमंद बनी हुई है।

अनेक लोगों के लिए आत्मविश्लेषण का वक्त है अब

अब न्यायिक सक्रियतावाद के इस दौर में जो लोग आधी रात को अदालत में होने वाली बहस की

आलोचना किया करते थे, उन्हें भी आत्मविश्लेषण कर लेना चाहिए कि

वह तार्किक तौर पर घटनाक्रमों को किस स्तर तक समझ पाते हैं

और न्यायपालिका की कानूनी परिभाषा में इस किस्म की नासमझी को कितना सुधार सकते हैं।

भारतीय लोकतंत्र और संविधान क्यों अच्छा माना जाता है, इसका एक नमूना भर है यह फैसला।

इसलिए न्यायपालिका के इस निर्णय के बाद लोगों को नये सिरे से अपने दिल से

लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए दिमाग साफ कर लेना चाहिए।



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