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हमें अब कोरोना के साथ ही जीने का अभ्यास कर लेना चाहिए

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दी जानकारी

  • अब तकएचआइवी की भी दवा नहीं बनी

  • जीवन शैली में सुधार से आगे बढ़ सकते हैं

  • बचाव की विधि विकसित करने में जुटे हैं वैज्ञानिक

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः हमें अब कोरोना के बीच जीने का अभ्यास करना चाहिए। इसके लिए विश्व

स्वास्थ्य संगठन अनेक परीक्षणों के साथ प्रत्यक्ष तौर पर जुड़ा हुआ है। कई विशेषज्ञ

मानते हैं कि हमें अब कोरोना के ईलाज का रास्ता शायद वैक्सिन के तैयार होने के पहले

ही मिल जाएगा। लेकिन यह धीरे धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि कई अन्य वायरसों की

तरह यह वायरस भी इतनी जल्दी दुनिया से समाप्त नहीं होगा। दरअसल इस वायरस की

संरचना और उसके स्वरुप के बदलने की वजह से उसके बारे में निरंतर शोध की जरूरत

पड़ रही है। चीन में वायरस का पता चलने के बाद से अब तक यह वायरस बहुत बदल चुका

है। इस बदलाव की वजह से शोधकर्ताओं को हर बार अपने शोध में नये आंकड़ों को भी

शामिल करना पड़ रहा है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह संकेत

दिया है कि हमें अब कोरोना के बीच ही जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। डब्ल्यूएचओ के

निदेशक मिशेल रियान ने कहा कि जिस तरीके से हम अब तक एचआइवी को दूर नहीं कर

पाये हैं उसी तरह हमें अब कोरोना को भी झेलना होगा। सिर्फ जीवन शैली में सुधार कर

हम इससे लड़ सकते हैं। इस बीच कोई चिकित्सा पद्धति अथवा वैक्सिन शायद विकसित

हो जाए तो इस वायरस को पोलियो की तरह इलाकों से समूल नष्ट करने में कामयाबी

मिल सकती है। वर्तमान में दुनिया भर के 43 लाख से अधिक लोग इससे पीड़ित हो चुके हैं

और करीब तीन लाख लोगों की इससे मौत भी हो चुकी है। वायरस से होने वाली मौत के

आंकड़े यही दर्शाते हैं कि अधिक उम्र के लोगों पर यह ज्यादा मारक असर डालता है।

हमें अब बचाव के लिए संभलकर चलना होगा

इसलिए अब इसके ईलाज अथवा प्रामाणिक वैक्सिन के तैयार होने तक जीवन शैली में

सुधार से ही बचाव संभव है। अब तक के चिकित्सा अनुसंधान और मरीजों पर इस्तेमाल

की गयी चिकित्सा विधियों से यह पता चलता है कि हम किस तरह इस वायरस से बचाव

कर सकते हैं। लेकिन यह भी कोई ठोस तरीका नहीं है। फिर भी संक्रमण को नियंत्रण में

रखने के लिए वर्तमान में प्रचलित पद्धतियों में कुछ और चीजों को जोड़ना पड़ेगा, जो

अंततः हमारी जीवन शैली का हिस्सा बनने जा रहे हैं। दरअसल ईलाज के दौरान भी अलग

अलग इलाकों में अलग अलग चिकित्सा पद्धति का असर प्रभावकारी नजर आ रहा है।

इसलिए अब तक इसके ईलाज के लिए कोई वैश्विक पैमाना भी तय नहीं हो पाया है। हर

देश अपनी जरूरतों और अपने मरीजों पर होने वाले फायदों के हिसाब से इस पर काम कर

रहा है। दूसरी तरफ दुनिया भर की 120 प्रयोगशालाओं में इससे बचाव के रास्ते तलाशे जा

रहे हैं। इनके बीच अब तक की कड़वा सच यही है कि इस वायरस को समाप्त करने की

कोई विधि विकसित नहीं हो पायी है। डब्ल्यूएचओ के प्रवक्त मार्गेरेट हैरिस ने कहा कि हर

स्तर के आंकड़े मिल रहे हैं, जिनका विश्लेषण भी हो रहा है। लेकिन इसके बीच ही बचाव

वर्तमान में सबसे कारगर रास्ता है। वैज्ञानिक यह भी जांच रहे हैं कि जिन इलाकों में फ्लू

अथवा मलेरिया का प्रभाव है वहां के रोगियों पर कोरोना का क्या प्रभाव पड़ता है क्योंकि

अमेरिका जैसे देश में इन दोनों रोग के रोगी कम हैं। दूसरी तरफ ऐसे रोग के बीच रहने

वालों में प्राकृतिक तौर पर भी शरीर के अंदर जो प्रतिरोधक तैयार रहता है वह कोरोना के

खिलाफ कितना संघर्ष कर पाता है, इसकी भी जांच चल रही हैं।

हमें अब दवाओं के असर को भी समझना होगा

कुछ देशों में रेमडेसिवीर दवा से रोगियों को फायदा मिलने की सूचना है लेकिन यह

वैश्विक मानक पर खरा नहीं उतरता। कुछ इलाकों में कई दवाओं का मिश्रण वायरस की

संख्या कम करने में मददगार रहा है। इसमें हांगकांग में जारी शोध में एचआइवी,

हेपाटाइटिस और सेलोरोसिस की दवाओं का मिश्रण कारगर पाया गया है। दूसरी तरफ

अमेरिका में यह माना जा रहा है कि मलेरिया की दवा से वहां के अनेक रोगियों को फायदा

होने का दावा खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ने किया था। लेकिन जांच में यह दावा भी सफल

साबित नहीं हुआ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्पष्ट किया है कि जारी अनुसंधान के बीच भी सारी प्रक्रियाओं

को पूरा कर किसी वैक्सिन के तैयार होने में करीब एक वर्ष का समय लगता है। बीच में

उसके क्लीनिकल ट्रायल का होना भी जरूरी है। इसलिए जब तक कोई दवा या वैक्सिन

तैयार हो, हमें अब कोरोना से बचाव की पद्धति वाली जीवन शैली को अपनाते हुए आगे

बढ़ने का प्रयास करना चाहिए


 

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