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बिजली की राजनीति को भी झारखंड में समझना होगा




बिजली की राजनीति का इतिहास झारखंड में कोई नई बात नहीं है। इस मुद्दे पर हाल के

दिनों में झारखंड में नये सिरे से परेशानी दिख रही है। अनेक इलाकों में नियमित तौर पर

बिजली कटौती की समयसीमा पहले के मुकाबले बढ़ गयी है।

इस बारे में शिकायत मिलने के बाद खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जनता को इसकी वजह

बतायी थी। यह पहला मौका था जब राज्य के इतिहास ने सीधे जनता को परेशानी की

वजह और समाधान के बारे में जानकारी दी हो। इसके तुरंत बाद अब दामोदर वैली

कारपोरेशन का नया विवाद सामने आ गया है। डीवीसी ने राज्य को बिजली सप्लाई बंद

करने की चेतावनी दी है। जाहिर है कि डीवीसी के इस फैसले से झारखंड में बिजली संकट

पैदा हो सकता है। राज्य को रोजाना 600 मेगावाट रोजाना बिजली की आपूर्ति करने वाले

दामोदर घाटी निगम (डीवीसी) ने सप्लाई से हाथ खड़े करने का निर्णय किया है। झारखंड

बिजली वितरण निगम को इस बाबत डीवीसी ने अल्टीमेटम (पावर रेगुलेशन) दिया है।

अपनी बिजली नहीं होगी तो कोई भी धमकायेगा ही

इसके लिए डीवीसी ने अपने बकाये का हवाला दिया है। इसमें कहा गया है कि बिजली

आपूर्ति मद में नवंबर 2019 तक का बकाया बढ़कर 4995 करोड़ हो चुका है। बकाये का

भुगतान नहीं कर बिजली वितरण निगम ने पावर परचेज एग्रिमेंट (पीपीए) का उल्लंघन

किया है और निगम इसके भुगतान में फेल हुआ है। डीवीसी के चीफ इंजीनियर

(कामर्शियल) की ओर से बिजली वितरण निगम के चीफ इंजीनियर (कॉमर्शियल एंड

रेवेन्यू) को दी गई नोटिस में उल्लेख किया गया है कि बकाये का भुगतान नहीं होने से

काफी परेशानी हो रही है, लिहाजा डीवीसी आपूर्ति चालू रखने में असमर्थ है। पत्र के

मुताबिक डीवीसी रोजाना 600 मेगावाट की आपूर्ति झारखंड को करता है। नोटिस जारी

करने की तिथि 10 फरवरी है और 15 दिन के भीतर बकाये का भुगतान करने की मियाद

तय की गई है।

डीवीसी की मांग और स्थिति को समझने की आवश्यकता

अगर इस दौरान भुगतान हुआ तो आपूर्ति नियमित रहेगी, वरना 25 फरवरी की रात 12

बजे से डीवीसी झारखंड को बिजली की सप्लाई बंद कर देगा। पहले दिन 50 प्रतिशत यानी

300 मेगावाट की आपूर्ति बंद की जाएगी। इसके बाद रोजाना बिजली आपूर्ति में 10

प्रतिशत की कमी की जाएगी। पावर रेगुलेशन का आदेश स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर, डीवीसी,

हावड़ा को भी भेजा गया है, ताकि निर्देश मिलने के साथ ही कटौती सुनिश्चित की जा सके।

डीवीसी ने इस क्रम में अपने बकायेदारों को भुगतान नहीं कर पाने से होने वाली

परेशानियों का उल्लेख किया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस मसले के समाधान का

निर्देश अधिकारियों को दिया है। बिजली वितरण निगम के एक वरीय अधिकारी के

मुताबिक डीवीसी बकाये को लेकर ज्यादा दावे कर रहा है। इसे लेकर समन्वय का प्रयास

किया जा रहा है। राशि आवंटन करने की दिशा में वित्त विभाग के निर्देश के बाद बकाये

का भुगतान किया जा सकेगा। लेकिन झारखंड की बिजली की राजनीति को भी मुख्यमंत्री

को समझना चाहिए। खरीद की बिजली से सारा कुछ संचालित करने का यह कारोबार

अपने आप में भ्रष्टाचार को जन्म देता है। इसलिए इन व्यवस्थाओं के बीच भी अगर

मुख्यमंत्री चाहें तो अपने कार्यकाल में कमसे कम दो बड़ी इकाइयों का निर्माण करा सकते

हैं। बालूमाथ के पास बंद पड़ी इकाइयों को अपने नियंत्रण में लेकर भी यह काम अपेक्षाकृत

कम समय में किया जा सकता है। झारखंड राज्य की सरकार के पास अपने बिजली

उत्पादन संयंत्र का नहीं होना अपने आप में एक बड़ी साजिश है। राज्य के नीति निर्धारकों

ने राज्य के लिए आधारभूत संरचना निर्माण का काम नहीं होने के लिए अनेक किस्म की

दलीलें दी है।

बिजली की राजनीति में बाहर से खरीद पर अधिक पेंच

राज्य बिजली बोर्ड के अनेक प्रभावी लोग बार बार यह दलील देते रहे हैं कि अपने संयंत्र से

बिजली उत्पादित करने से बेहतर है कि इस बिजली को सेंट्रल पुल से खरीदा जाए क्योंकि

यह सस्ती पड़ती है। मुख्यमंत्री को यह समझना होगा कि हमारा राज्य जहां कहीं से भी

बिजली खरीद रहा है, वह निश्चित तौर पर घाटे में हमें इसकी आपूर्ति नहीं करता है।

इसलिए अगर किसी अन्य इकाई में बिजली का उत्पादन सस्ता हो सकता है तो झारखंड

में इसके उत्पादन में घाटा होने का असली कारण क्या है। गलत तरीके से पतरातू की

इकाई एनटीपीसी को सौंपने के पहले पतरातू के बारे में यह शिकायत रहती थी कि वहां

कोयले के बदले पत्थरों की आपूर्ति की गड़बड़ी से इकाई में उत्पादन बार बार बाधित होता

है। इन गड़बड़ियों को दुरुस्त करने की जरूरत है। अपने राज्य के कोयले से उत्पादित

बिजली हम निश्चित तौर पर सस्ते में पैदा कर सकते हैं, वशर्ते कि इसमें भ्रष्टाचार नहीं

हो। इस क्रम में हेमंत सोरेन को अपने कार्यकाल में नये सिरे से पनबिजली और सौर ऊर्जा

के उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में भी काम करना चाहिए। इससे बिजली की राजनीति

निश्चित तौर पर बांह मरोड़ने दी स्थिति से बाहर निकलेगी और कुछ नहीं तो कमसे

कम साल के कुछ महीने निर्बाध बिजली का फायदा राज्य के दूर दराज के इलाकों को

होगा।



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