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आगे भी जाने ना तू, पीछे भी जाने ना तू

आगे भी चुनाव की व्यस्तता रहेगी लेकिन इसका क्या करें कि जाटों की नाराजगी कुछ इस

कदर बढ़ रही है कि दो को छोड़कर शेष भाजपा नेताओं की हंसी गायब हो गयी है। जिन दो

की बात कर रहा हूं, वे नरेंद्र मोदी और अमित शाह है। वरना भाजपा के अन्य कद्दावर

नेताओं ने अब किसान आंदोलन और कृषि बिल के बारे में लगभग चुप्पी साध ली है।

बेचारे कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मजबूरी में बीच बीच में बोल रहे हैं लेकिन वह भी समझ

रहे हैं कि अपने इलाके में उनकी भी जमीन इन बयानों से डगमगाने लगी है। संजीव

बालियान को हिम्मत देकर आगे बढ़ाया था लेकिन दो बार में ही उनकी भी सांस अटक

गयी। अब आगे भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को झेलना है। तय है कि वहां की

स्थिति बिल्कुल महाभारत जैसी है, जहां बिना युद्ध का कोई भी सूई की नोंक के बराबर

जमीन छोड़ने को तैयार नहीं है। ऊपर से जो कुछ बहुत फेवरेबुल लग रहा है, उसके

अंदरखाने की हालत शायद उतनी बेहतर नहीं है। पश्चिम बंगाल का मैदान फतह करने के

चक्कर में अगर उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में बाजी पलट गयी तो आगे भगवान

भरोसे हिंदू होटल जैसी हालत होने जा रही है। अलबत्ता यह याद दिलाते चले कि गुजरात

में भी आने वाले दिनों में मोदी और शाह की जोड़ी को दिल्ली के केजरीवाल परेशान करने

वाले हैं,ऐसा तो स्थानीय निकाय के चुनावों से संकेत मिल चुका है। इनकी बात कर लिये

तो अब कांग्रेस की भी बात कर लें। राहुल गांधी कई बार मुझे कालीदास जैसा आचरण

करते हुए नजर आते हैं। केरल गये और समंदर में छलांग लगा दी। समुद्र से निकले तो

उत्तर भारत पर टिप्पणी कर दी। पता नहीं वह कब और क्या कहते हैं या क्यों कहते हैं।

राहुल गांधी की हरकतों से ही कांग्रेस परेशान

लेकिन इतना तय है कि इससे भाजपा को कम और कांग्रेस को अधिक परेशानी होती है।

आगे भी वह क्या करने वाले हैं, इसका किसी को नहीं पता। इसी बात पर फिर से एक

पुरानी फिल्म का गीत याद आने लगा है। फिल्म वक्त के लिए इस गीत को लिखा था

साहिर लुधियानवी ने और संगीत में ढाला था रवि ने। इसे आशा भोंसले ने अपना स्वर

दिया था। फिल्म का यह दृश्य एक साथ कई भाव प्रकट करता रहता है जिस वजह से भी

यह गीत अपने समय में बहुत लोकप्रिय हुआ था। गीत के बोल कुछ इस तरह है

आगे भी जाने ना तू, पीछे भी जाने ना तू

जो भी है बस यही एक पल है अनजाने सायों का राहों में डेरा है
अनदेखी बाहों ने हम सब को घेरा है ये पल उजाला है, बाकी अँधेरा है
ये पल गँवाना ना, ये पल ही तेरा है जीने वाले सोच ले

यही वक़्त है कर ले पूरी आरज़ू इस पल के जलवों ने महफ़िल सँवारी है 
इस पल की गर्मी ने धड़कन उभारी है इस पल के होने से दुनिया हमारी है
ये पल जो देखो तो सदियों पे भारी है जीने वाले सोच ले

यही वक़्त है कर ले पूरी आरज़ू इस पल के साये में अपना ठिकाना है
इस पल के आगे की हर शय फ़साना है कल किसने देखा है, कल किसने जाना है
इस पल से पाएगा, जो तुझको पाना है जीने वाले सोच ले

यही वक़्त है कर ले पूरी आरज़ू

वइसे इन तमाम झंझटों के बीच जो दो जरूरी मुद्दे भूल रहा था, वह याद आ गया है। दिशा

रवि के मामले में मीडिया ट्रायल हो गया। पुलिस के सूत्रों के हवाले से कई चैनलों ने उसे

राष्ट्रद्रोही करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब अदालत का फैसला आने के बाद इस पर

कोई बात नहीं कर रहा है। लेकिन मेरी चिंता दूसरे मुद्दों पर है। दिशा रवि और अर्णव

गोस्वामी या दिशा रवि और दीप सिद्धू की तुलना करें तो यह दोनों लोग ज्यादा इंपोर्टेंट मुद्दे

हैं। किसी ने अब तक नहीं बताया कि अर्णव गोस्वामी को इतनी गोपनीय रक्षा संबंधी

सूचना किसने दी। जिन कानूनों का डंडा बार बार रविशंकर प्रसाद दिखाते रहते हैं, उसी डंडे

की बात करें तो यह डंडा तो अर्णव की पीठ पर पहले ही पड़ जाना था। पीठ प बेंत पड़ता तो

जुबान से बात बाहर आयी।

आगे भी देखना है कि अर्णव और सिद्धू का क्या होगा

अब दिशा रवि के मामले में दिल्ली पुलिस ने जो कुछ ऑफ द रिकार्ड दावे किये, उसी संदर्भ

में उसी दिल्ली पुलिस को कमसे कम यह बताना चाहिए था कि दीप सिद्धू की वह महिला

मित्र कौन है जो विदेशों में बैठकर उसके वीडियो अपलोड किया करती थी। या फिर वे कौन

लोग हैं, जिनके मोबाइल से दीप सिद्धू ने यह सारे वीडियो विदेश तक भेजे थे। लेकिन इन

दो मुद्दों को बार बार छोड़ दिया जा रहा है। जाहिर है कि आज नहीं तो आगे भी यह पिटारा

खुलेगा और तब पता चलेगा कि कौन कितने पानी में है।

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