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खुद की बर्बादी का इतिहास हम इंसान खुद लिख रहे हैं







  • एक दिन में पिघल गया 12.5 खरब टन बर्फ

  • गत 1 अगस्त 2019 की इस घटना का पता चला 

  • औसतन 250 वर्षों में एक बार वैसे भी पिघलता है बर्फ

  • दुनिया के सारे समुद्रों का जलस्तर सात मीटर तक ऊंचा उठेगा


प्रतिनिधि

नईदिल्लीः खुद की बर्बादी के लिए हम इंसान ही जिम्मेदार हैं।

बार बार चेतावनी दिये जाने का हमलोगों पर कोई असर नहीं हो रहा है।

नतीजा है कि जिस खतरे की आशंका जतायी गयी है, वह अत्यंत तेज गति से हमारे करीब आती जा रही है।

यह खतरा पृथ्वी के पर्यावरण संतुलन के पूरी तरह बिगड़ जाने का है।




ऐसा होने की स्थिति में जो जीवित प्रजातियां समाप्त होंगी, उनमें इंसान का नंबर सबसे पहले हो सकता है।

क्योंकि इस कहानी को उसने खुद अपने हाथों से लिखा है।


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हाल के शोध अध्ययनों से पता चला है कि ग्रीनलैंड जैसे ठंडे प्रदेश में एक दिन में साढ़े 12 खरब टन बर्फ पिघला है।

इस एक दिन का आंकड़ा सामने आने के बाद वैज्ञानिक हैरान और सशंकित हो गये हैं।

यह नतीजा निकाला जा रहा है कि पृथ्वी पर जो बर्फ की चादर है, वह न सिर्फ पिघल रही है बल्कि वह पतली भी होती जा रही है।

इससे एक नहीं कई किस्म के नये खतरे दुनिया पर मंडराने लगे हैं।

बर्फ पिघलने का यह आंकड़ा अब तक का विश्व रिकार्ड भी है।

इससे पहले वर्ष 1950 में भी एक बार तेजी से बर्फ पिघला था।

उस दौरान 10 खरब टन बर्फ पिघलने का अनुमान था।

लेकिन गत 1 अगस्त 2019 को यह नया विश्व रिकार्ड बना है।


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यह पृथ्वी के तबाह होने की तरफ तेज से बढ़ने का संकेत है।

आशंका इस बात की भी है कि इसे नहीं रोका जा सका तो यह गति और तेज होती चली जाएगी।

फिर एक समय ऐसा भी आयेगा जब खुद की बर्बादी को रोक पाना खुद इंसान के वश में भी नहीं होगा।

खुद की बर्बादी पर वैज्ञानिक घर नहीं नाव बनाने को कह रहे हैं




इस खतरे को परिभाषित करने के साथ साथ वैज्ञानिक परिहास के तौर पर यह कह रहे हैं कि अब इंसान को खुद के लिए घर नहीं समुद्र में तैर सकने वाले अच्छे वोट तैयार कर लेना चाहिए।

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि बर्फ पिघलने की वजह से समुद्र इतना ऊंचा उठ जाएगा कि वर्तमान ढांचा बदलेगा और अनेक शहर एवं पृथ्वी का भूभाग पानी में डूब जाएगा।

वैसी स्थिति में लोगों को रहने के लिए जमीन पर नहीं पानी पर तैरने वाले नावों की जरूरत पड़ेगी।

अचानक यह बर्फ क्यो पिघली, इस पर शोध हो रहा है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि मौसम के बदलने की वजह से हर तरफ गड़बड़ी होने लगी है।

इसी वजह से पिछले जुलाई माह में यूरोप के ठंडे इलाकों में भी गर्म हवा का झोंका चला था।

इन संकेतों के अत्यंत स्पष्ट होने के बाद भी पूरी दुनिया में इसे बचाने की कोई समग्र कोशिश प्रारंभ तक नहीं हुई है।

याद रहे कि ग्रीनलैंड का करीब 80 फीसद इलाका बर्फ से ढंका हुआ है।

दूसरी तरफ दुनिया में हर बर्फ पिघलने की वजह से समुद्र का जलस्तर और आंतरिक जीवन संतुलन भी बिगड़ता चला जा रहा है।

एक अनुमान है कि इस साल दुनिया में करीब 197 खरब टन बर्फ का नुकसान हो चुका है।

इस नुकसान की वजह से जितना पानी समुद्र के अंदर गया है वह अलग अलग तरीके से परेशानियां पैदा करता रहेगा।

ग्रीनलैंड के आंकड़ों की पुष्टि सैटेलाइट के चित्रों से भी हुई है

ग्रीनलैंड के बर्फ पिघलने की आंकड़े का विश्लेषण सैटेलाइट से प्राप्त चित्रों और अन्य आधुनिक उपकरणों की मदद से किया गया है।

इससे पता चला है कि समुद्र में बर्फ पिघलने की वजह से जो पानी गया है, उसमें ग्रीन लैंड की सबसे अधिक भूमिका है। यानी सबसे अधिक बर्फ इसी इलाके में पिघला है।

वैसे इस पर जानकारी रखने वाले वैज्ञानिक मानते हैं कि प्रति ढाई सौ वर्ष में एक बार पृथ्वी में बर्फ पिघलने की घटना होती है।

इससे पूर्व का संतुलन कायम हो जाता है।

लेकिन इस बार के हालत खतरे के निशान से ऊपर जा चुके हैं।

ग्रीन लैंड के बारे में जब हम बात करते हैं तो हमें खुद ही यह समझ लेना चाहिए कि

यह इलाका भारतवर्ष के मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात को मिलाकर बनने वाले इलाके से भी बडा भूभाग है।

यहां पूरी दुनिया के साफ जलस्रोत के दस प्रतिशत की हिस्सेदारी है।

यहां के अस्सी फीसद इलाके पर बर्फ पड़ी रहती है।

वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक इनमें से कुछ इलाके ऐसे भी हैं,

जहां मिट्टी के ऊपर करीब दो मील की मोटी बर्फ की पर्त पड़ी हुई है।

सैटेलाइट के आंकड़ों के मुताबिक कुछ ऐसी ही स्थिति वर्ष 1979 में भी नजर आयी थी।

इस बार का खतरा इसलिए ज्यादा दिख रहा है क्योंकि बर्फ की चादर में से

कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जहां से पूरी की पूरी बर्फ ही पिघल चुकी है।

हजारों वर्ष लगातार बर्फवारी की वजह से जिन इलाकों में बर्फ जमी थी,

उनके एक ही झटके में पिघल जाने का खतरा वैज्ञानिकों की समझ में आ चुका है।

वहां से और अधिक बर्फ पिघली तो समुद्र का जल स्तर औसतन सात मीटर ऊपर उठ जाएगा।

समुद्र के इस जलस्तर के ऊंचा उठने का परिणाम क्या होगा, यह हर कोई खुद समझ सकता है।


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