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हम इंसान क्या पृथ्वी की तबाही का इतिहास दोहराने जा रहे हैं




  • तबाही आयी थी करीब 4 करोड़ 20 लाख वर्ष पहले
  • ऑक्सीजन की कमी से आती है तबाही
  • फ्लोरिडा वि. वि. के वैज्ञानिकों का शोध
  • वर्तमान खतरा भी मानव जनित ही है
प्रतिनिधि

नयीदिल्लीः हम इंसान क्या पृथ्वी को फिर से उस तरफ धकेल रहे हैं जिससे पृथ्वी तबाह हो जाए।

वैज्ञानिकों ने इसी किस्म की व्यापक तबाही का नया खोज पूरा कर लिया है।

इस खोज के मुताबिक करीब चार करोड़ बीस लाख वर्ष पहले भी पृथ्वी पर ऐसी तबाही आयी थी।

इससे पृथ्वी का अधिकांश जीवन समाप्त हो गया था।

यहां तक कि समुद्री जीवन का करीब 23 फीसद हिस्सा इसमें खत्म हो गया।

इन प्रजातियों के बारे में अब फसिल और वैज्ञानिकों तथ्यों से ही पता चल पाता है।

क्योंकि यह प्रजातियां पूरी तरह पृथ्वी से विलुप्त ही हो गयीं।

हम इंसान फिर से वही गलती दोहराते जा रहे हैं, जिसकी वजह से प्राचीन धरती पर भी तबाही आयी थी।

वैज्ञानिक परिभाषा में उस दौर पर सिलुरियान काल कहा जाता है, जब यह तबाही आयी थी।

निरंतर खोज के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि वह दौर पृथ्वी का स्वरुप बदलने के दस प्रमुख घटनाक्रमों में से एक है।

इस तबाही को वैज्ञानिक शोध में अब लाउ-कोजलोस्की तबाही का नाम दिया गया है।

वैज्ञानिक स्पष्ट कर चुके हैं कि उस दौरान भी पृथ्वी पर तबाही दरअसल समुद्री जल में ऑक्सीजन की मात्रा अत्यधिक कम हो जाने की वजह से प्रारंभ हुई थी।

यह क्रम प्रारंभ हो जाने के बाद उसे रोकने का कोई उपाय भी उस वक्त मौजूद नहीं था।

इसलिए धीरे धीरे पूरी पृथ्वी ही इसकी चपेट में आती चली गयी।

हम इंसान क्या गलती दोहरा रहे हैं यह पता लगाया है शोध कर्ताओं ने

हम इंसान क्या कुछ गलती कर रहे हैं, इसका पता फ्लोरिया स्टेट विश्वविद्यालय के शोध से चल रहा है।

इस विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने उस प्राचीन काल की तबाही का पता लगाया है।

इस तबाही को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इनके अलावा जो प्रलय लायक

परिस्थितियां पृथ्वी पर बनी थी, उसके दूसरे कारण थे।

इस एक के अलावा अन्य तबाही बड़े उल्कापिंड के गिरने, ज्वालामुखी फटने

अथवा समुद्र के अंदर हुए भूकंप से आयी सूनामी की वजह से आयी थी।

इस एक तबाही को वर्तमान परिस्थिति से इसलिए जोड़कर देखा जा रहा है

क्योंकि हम इंसान की ऐसी परिस्थिति पैदा कर रहे हैं।

पृथ्वी की परिस्थितियां जिस तरीके से बिगड़ती जा रही है उसके लिए हम इंसान ही जिम्मेदार हैं।

मानवजनित प्रदूषण और अन्य कारणों से पृथ्वी पर लगभग वही स्थिति बनती जा रही है जो कभी तबाही का मुख्य कारण बनी थी।

इसके विस्तृत अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों ने माना है कि दरअसल ऑक्सीजन की कमी की वजह से पृथ्वी के कार्बन का चक्र ही बिगड़ गया था।

मौसम और पर्यावरण में बदलाव की वजह से अनेक आर्गेनिक पदार्थ पृथ्वी के अंदर दब गये थे।

इससे कार्बन का जो चक्र पृथ्वी पर चलता रहता था वह पूरी तरह टूट गया था।

इसकी वजह से पृथ्वी का पूरा संतुलन कुछ ऐसा बिगड़ा कि उस दौर की अनेक प्रजातियां ही समाप्त हो गयीं।

इस शोध दल का नेतृत्व करने वाले चेल्सी वाउमैन ने कहा कि ऑक्सीजन की कमी को ही तबाही की शुरुआत समझा जा सकता है।

दुर्भाग्य से पृथ्वी पर फिर से ऐसी परिस्थिति पैदा हो रही है। जिसके लिए हम इंसान जिम्मेदार हैं।

प्राचीन पृथ्वी की तबाही को जांचने में आधुनिक विधि आजमायी




इस शोध को पूरा करने के लिए वैज्ञानिकों ने आधुनिक विधि और उपकरणों का इस्तेमाल किया था।

इनलोगों ने थॉलियम आइसोटोप, मैंगनीज और गंधक के आइसोटोप की मदद से लातिविया और स्वीडेन के इलाकों की जांच की।

इस प्रयोग के जरिए यह समझा जा सका कि उस काल में कैसे कैसे बदलाव होता गया

और ऑक्सीजन की कमी की वजह से कैसे पृथ्वी का कार्बन चक्र टूटता चला गया।

इस शोध के सामने आने के बाद वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि वर्तमान परिस्थितियां भी कुछ इसी दिशा में बढ़ रही हैं।

यह पहले ही पता चल चुका है कि समुद्र के अंदर अब प्रदूषण की वजह से कम ऑक्सीजन बन रहा है।

इससे समुद्री जीवन अस्तव्यस्त हो रहा है। दूसरी तरफ इसी कारण से पृथ्वी पर पड़ी बर्फ की चादरें भी समाप्त हो रही हैं।

ग्लेशियरों का बर्फ पानी बनकर समुद्र में जा रहा है।

इससे समुद्र के गर्म होने की स्थिति में पृथ्वी के अनेक बड़े महानगरों के समुद्र के अंदर समा जाने का खतरा तेज होता जा रहा है।

वैज्ञानिकों ने साफ कर दिया है कि समुद्र की गहराई में हो रहे इस बदलाव का खतरा हम इंसान को तुरंत पता नहीं चलता।

लेकिन जब यह प्रतिक्रिया समुद्र के ऊपरी इलाकों तक पहुंचती है तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

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