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चीन के प्रति असतर्क होना का फिलहाल मौका नहीं है

चीन के प्रति सतर्क होने के बारे में खुफिया एजेंसियों ने दूसरे सूचना भेजी है। इसके तहत

विस्तार से यह बताया गया है कि वह अपने किस तरीके से भारत और खास कर पूर्वोत्तर

भारत को अशांत करने की साजिशें रच रहा है। दरअसल भारतीय सेना की तैयारियों और

विश्व जनमत के तेवर को भांपते हुए चीन भी यह समझ रहा है कि फिलहाल उसकी

विस्तारवादी सोच को अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख तक लाने की उसकी चाल कामयाब

नहीं होने जा रही है। दूसरी तरफ इन हरकतों से वह पाकिस्तान और बांग्लादेश में अपने

पूंजी निवेश को भी सुरक्षित रख पा रहा है। वरना इन दोनो पड़ोसी देशों में भी स्थानीय

स्तर पर चीन का विरोध कोई कम नहीं है। वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों के बीच चीन का

पैसा जहां जहां लगा है, वहां की सुरक्षा करना चीन की आर्थिक जिम्मेदारी बन चुकी है।

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अब इस क्षेत्र में भारत जैसे देश के टक्कर जैसी परिस्थिति पैदा कर वह अन्य छोटे देशों को

निश्चित तौर पर अपने प्रभाव में रख सकता है। इसलिए वह अपनी इस चाल को लगातार

गति देने की साजिशों में जुटा रहेगा। खुफिया एजेंसियों ने भारत सरकार को इस बात के

लिए सतर्क किया है कि भारत चीन सीमा पर सतर्कता होने की वजह से वह दूसरे रास्तों से

भारत के अंदर हथियार भेजकर अशांति फैलाना चाहता है। पूर्वोत्तर को अशांत किये बिना

अरुणाचल प्रदेश के इलाके में अपनी रेल संपत्ति के तेजी से विस्तार के बाद भी चीन को

अपेक्षित लाभ मिलने की उम्मीद नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूरे इलाके में भारतीय

सेना गलवान घाटी की घटना के बाद से ही युद्ध जैसी तैयारियों में है।

चीन के प्रति सतर्कता की वजह से ही सेना डटी हुई है

यह भी स्पष्ट हो गया है कि इस ठंड में भी दोनों देशों की सेना इन इलाको से पीछे हटने

वाली नहीं है। वरना आम तौर पर तापमान में जबर्दस्त गिरावट के वक्त दोनों देशों की

सेनाएं अपनी अपनी सुरक्षा चौकियों को छोड़कर कम तापमान वाले इलाकों में चली जाती

थी। दोबारा ठंड कम होने के बाद सेनाएं फिर से अपने पोस्ट पर वापस आती थी। लगातार

सैन्य अधिकारियों के बीच जारी वार्ता के बीच अब तक सिर्फ सैद्धांतिक विषयों पर ही चर्चा

हो रही है। भारत ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि इस बार वह चीन के प्रति किसी झांसे में

आने वाला नहीं है। जबतक चीन की सेना पीछे नहीं हटती, भारतीय सेना अपनी जगह पर

मौजूद रहेंगी। इस स्थिति के बीच चीन के तरफ से पूर्वोत्तर के आतंकवादी समूहों को

हथियार से मदद करने केलिए दूसरे रास्तों का इस्तेमाल होने की खुफिया सूचना आयी है।

अब थाइलैंड में भी चीन में बने हथियारों का एक बड़ा जखीरा है, जिसे दक्षिण पूर्व एशियाई

देशों के रास्ते म्यांमार में लेकर आए जाने की तैयारी कर रही है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों

से इस साल अब तक एके-47, एम-16एस, चीनी पिस्तौल और लेथोड्स सहित कुल 423

अवैध हथियार बरामद किए गए हैं। खुफिया एजेंसियों ने यह भी कहा है कि चीन म्यांमार

सीमा पर विद्रोही समूहों को हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति कर रहा है, क्योंकि वे

अच्छी कीमत चुकाते हैं। पूर्वोत्तर के प्रमुख विद्रोही समूहों विशेष रूप से असम, मणिपुर,

नागालैंड और मिजोरम के लोग चीनी खुफिया एजेंसियों के साथ नियमित संपर्क बनाए

रखते हैं और ये चीनी उदारता और हथियारों से लाभान्वित हुए हैं।

यह चीन की रणनीतिक साजिश का दूसरा हिस्सा है

एजेंसियों ने बताया है कि उत्तर-पूर्व में विद्रोही समूहों का प्रशिक्षण, हथियारों एवं गोला-

बारूद की पहुंच और निर्वासित आतंकवादियों और नेताओं को शरण देना भारत के

खिलाफ चीन की दूसरी रणनीति का हिस्सा है। हाल ही में एके-47 असॉल्ट राइफलों,

मशीनगन, एंटी टैंक माइंस, ग्रेनेड सहित करीब 10 लाख डॉलर के गोला-बारूद से युक्त

चीन निर्मित हथियारों की एक बड़ी खेप म्यांमार-थाईलैंड की सीमा पर थाईलैंड की तरफ

माई सोट जिले में जब्त की गई है। चीनी हथियारों की यह एकमात्र खेप नहीं है, जो बरामद

हुई है। इस साल की शुरुआत में म्यांमार और बांग्लादेश के तटीय जंक्शन के पास

मोनाखाली बीच पर 500 असॉल्ट राइफल, 30 यूनिवर्सल मशीनगन, 70,000 गोला बारूद,

ग्रेनेड का एक विशाल भंडार और एफ-6 चीनी मैनपैड्स धकेली गई थी। वहां से यह खेप

संडाक में अराकान आर्मी कैंप तक पहुंची और फिर इसे दक्षिण मिजोरम में परवा कॉरिडोर

का इस्तेमाल करते हुए राखाइन में तस्करी कर लाया गया। जब्त किए गए हथियार मूल

चीनी निर्मित थे और म्यांमार सीमा पर विद्रोही समूहों के लिए तस्करी किए जाने के लिए

थे, क्योंकि वे अच्छी कीमत देते हैं। म्यांमार सेना और थाई सेना इस मामले की जांच कर

रही है। भारत सरकार इस जांच में सीधे तौर पर शामिल होकर चीन को बड़ा संदेश भेजने

की कोशिश कर रहा है। इसलिए यह सामान्य समझदारी की बात है कि हम चीन के मोर्चे

पर जरा सी भी कोताही करने की गलती दोबारा नहीं कर सकते। वर्ष 1962 का युद्ध हमें

कमसे कम इतनी सबक तो दे गया है।


 

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